हिमालयी जोखिम के घेरे में जम्मू-कश्मीर, बाढ़-भूस्खलन और ग्लोफ का मंडरा रहा बड़ा खतरा; संसदीय समिति ने दी चेतावनी
संसदीय समिति ने जम्मू-कश्मीर को बहु-आपदा संवेदनशील क्षेत्र बताते हुए आपदा प्रबंधन को प्रभावी बनाने और विकास योजनाओं में जोखिम न्यूनीकरण को अनिवार्य करने पर जोर दिया है।

जम्मू-कश्मीर में आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर संसदीय समिति का जोर।
HighLights
जम्मू-कश्मीर बहु-आपदा संवेदनशील क्षेत्र, आपदा से पहले तैयारी जरूरी
प्रत्येक विकास परियोजना में जोखिम न्यूनीकरण को अनिवार्य किया जाए
दूरदराज क्षेत्रों तक चेतावनी प्रणाली पहुंचाना अभी भी चुनौती
नवीन नवाज, श्रीनगर। हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जम्मू-कश्मीर कई प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम में है। बाढ़, भूस्खलन, भूकंप और हिमस्खलन के साथ ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) का खतरा भी प्रदेश के सामने बना हुआ है।
गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर को बहु-आपदा संवेदनशील क्षेत्र बताते हुए आपदा प्रबंधन को और प्रभावी बनाने तथा विकास योजनाओं में जोखिम न्यूनीकरण को अनिवार्य रूप से शामिल करने पर जोर दिया है।
समिति के अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों में आपदा का स्वरूप भी भिन्न है। कश्मीर घाटी में बाढ़, चिनाब घाटी में भूस्खलन और जम्मू क्षेत्र में भूकंपीय जोखिम प्रमुख चिंता हैं। ऐसे में क्षेत्र की संवेदनशीलता के अनुरूप तैयारी और संसाधनों की तैनाती जरूरी है।
20 जिलों में आपदा प्रबंधन योजना
जम्मू-कश्मीर में आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढांचा मजबूत किया गया है। वर्ष 2017 में अधिसूचित आपदा प्रबंधन योजना को 2023 में संशोधित कर केंद्र शासित प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के अनुरूप बनाया गया।
सभी 20 जिलों के लिए जिला आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार हैं। हालांकि, पुनर्गठन के बाद विभागों के बीच जिम्मेदारियों की स्पष्टता और समन्वय को लेकर चुनौतियां सामने आईं।
हर विकास परियोजना में जोखिम न्यूनीकरण की जरूरत
सड़क, पर्यटन और जलविद्युत परियोजनाओं में ढलान स्थिरीकरण, बेहतर जल निकासी और बाढ़ सुरक्षा जैसे उपाय किए जा रहे हैं। समिति ने कहा कि इन्हें परियोजना-विशेष तक सीमित रखने के बजाय प्रत्येक विकास परियोजना की योजना, डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि विकास स्वयं आपदा जोखिम न बढ़ाए।
चेतावनी तंत्र मजबूत, ‘लास्ट माइल’ कमजोर कड़ी
कामन अलर्टिंग प्रोटोकाल (सीएपी) के जरिए भारत मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी), केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और डीजीआरई की चेतावनियों को एकीकृत किया गया है। इसके बावजूद किश्तवाड़, कुपवाड़ा और बांदीपोरा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में समय पर चेतावनी पहुंचाना चुनौती है। समिति ने तकनीकी प्रणालियों के साथ स्थानीय और वैकल्पिक संचार माध्यमों को मजबूत करने की जरूरत बताई है।
एसडीआरएफ-एनडीआरएफ और सेना के साथ समन्वय
आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया के लिए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की व्यवस्था के साथ सेना से समन्वय किया जा रहा है। संवेदनशील इलाकों में संसाधनों की अग्रिम तैनाती और मौसमी तैयारियों पर जोर है। ‘आपदा मित्र’ और ‘आपदा सखी’ के माध्यम से स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करने तथा पंचायत और ब्लॉक स्तर पर आपदा प्रबंधन समितियों को मजबूत करने के प्रयास भी जारी हैं।
रांमबन, बारामुला और उड़ीमें ढलान स्थिरीकरण, बाढ़ सुरक्षा और तटबंध निर्माण जैसे कार्य किए गए हैं। ग्लेशियल झीलों की निगरानी से ग्लोफ के संभावित खतरे का समय रहते आकलन करने का प्रयास किया जा रहा है।
शहरी बाढ़ और अनियोजित निर्माण पर चिंता
श्रीनगर और जम्मू में शहरी बाढ़ का खतरा भी समिति की चिंता में है। अतिक्रमण, अपर्याप्त ड्रेनेज और नियमों के कमजोर क्रियान्वयन से समस्या बढ़ रही है। भूकंपरोधी निर्माण और बाढ़ क्षेत्र नियमन के प्रावधान मौजूद होने के बावजूद शहरी परिधि और ग्रामीण क्षेत्रों में उनका पालन असमान है।
समिति ने स्पष्ट किया है कि जम्मू-कश्मीर में आपदा प्रबंधन का लक्ष्य केवल आपदा के बाद राहत और बचाव नहीं, बल्कि आपदा से पहले जोखिम कम करना होना चाहिए। इसके लिए बेहतर पूर्व चेतावनी, सुरक्षित निर्माण, वैज्ञानिक निगरानी, सख्त भूमि उपयोग नियमन और मजबूत स्थानीय भागीदारी को विकास की मुख्यधारा में लाना जरूरी है।
