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    रोगन जोश से वाज़वान तक... कश्मीर की वादियों में कैसे घुली मुगलई महक? दिलचस्प है इन ज़ायकों की कहानी

    Updated: Wed, 25 Mar 2026 03:36 PM (IST)

    जम्मू-कश्मीर में वाज़वान से लेकर रोगन जोश कुछ ऐसे शाही पकवान हैं, जिनका स्वाद सैकड़ों वर्ष पुराना है। जब भी जम्मू-कश्मीर के इतिहास या फिर विरासत की बा ...और पढ़ें

    कैप्शन: जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों साल पुराना है मुगलई व्यंजनों का स्वाद (जागरण ग्राफिक्स)

    कैप्शन: जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों साल पुराना है मुगलई व्यंजनों का स्वाद (जागरण ग्राफिक्स)

    HighLights

    1. रोगन जोश फारसी मूल की धीमी आंच पर पकाई जाने वाली एक मटन डिश है

    2. वाज़वान में 24 तरह के व्यंजन शामिल होते हैं

    3. कहवा को कश्मीर में शाही चाय के रूप में पीया जाता है

    प्रिंस शर्मा, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर… भारत के मस्तिष्क पर जड़ा एक चमकता हुआ ताज...
    ऐसा ताज, जिसकी चमक बर्फ से ढकी चोटियों में दिखती है, जिसकी ठंडक बहती नदियों में महसूस होती है और जिसकी खूबसूरती हर उस इंसान को अपनी ओर खींचती है, जो इसे एक बार देख ले, तो ज़हन से इसकी यादें कभी न भुला पाए। हसीन शांत वादियां, क्षितिज तक दिखते नीले पहाड़ और धूप में चमकती सुनहली चोटियों से रिसती सरिताओं के बीच बसती है यहां की कश्मीरियत।

    वह कश्मीरियत जिसमें शुमार हैं पश्मीना के शॉल बुनते कारीगर, लकड़ियों पर नक्काशी करते कलाकार, कई तरह के सेब बेचते बागवान और दस्तरखान पर शाही पकवान परोसते हुए कश्मीरी बावर्ची।

    और कहना गलत भी नहीं, कश्मीर के पकवान, पूरे उत्तर भारत के व्यंजनों से न केवल अलहदा हैं बल्कि अपने स्वाद और अंदाज़ के लिए देशभर में विख्यात भी हैं। तभी तो इसका ज़ायका दूर-दराज के पर्यटकों को अपनी और ख़ुद-ब-ख़ुद खींच लेता है।

    घाटी में झोपड़ीनुमा घरों से उठती धुएं की लपटों के बीच महकती खाने की महक और डल लेक के किनारे कहवा के शाही गिलासों से उठती भाप... जम्मू-कश्मीर की संस्कृति और धरोहर को मुकम्मल करती है।

    फिर बात लकड़ियों की जलती आंच पर पकते रोगन जोश की हो, वाज़वान हो या फिर अनार दाने की चटनी के साथ सर्व किए जम्मू के मशहूर राजमा चावल हो। ये सब जम्मू-कश्मीर की विरासत का ही तो हिस्सा हैं।

    वह विरासत जहां खाने के लिए मेज़ नहीं बल्कि ज़मीन पर बिछा दस्तरखान होता है। जहां व्यंजन परोसे तो जाते हैं, लेकिन उनमें स्वाद के साथ तहज़ीब और अदब की झलक भी होती है।

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    कैप्शन: कश्मीर के झोपड़ीनुमा घर में खाना बनाती महिला (फोटो एआई द्वारा जेनरेटिड की गई है)

    कश्मीर और इसकी मिली-जुली संस्कृति

    ये बहुत समय पहले की बात है, कहते हैं यह कश्मीर आज जैसा नहीं था। यहां एक विशाल झील हुआ करती थी, जिसमें एक भयानक राक्षस रहता था। आसपास के लोग इससे बहुत परेशान थे। तभी इस धरती पर आए एक तपस्वी, नाम था- ऋषि कश्यप।

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    यहां के स्थानीय लोगों ने जब उन्हें तपस्या करते हुए देखा तो उन्होंने ऋषि कश्यप से मदद मांगी, जिसके बाद ऋषि ने उस राक्षस को मार गिराया और फिर यह जगह कहलाई- कश्यप मर, जो बाद में हुआ कश्मीर।

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    फोटो: एआई द्वारा जेनरेट की गई इमेज

    कश्मीर की इसी कहानी के साथ यहां के व्यंजनों ने भी इसकी विरासत को संजोने में काम किया। मैदानी इलाकों में शाकाहारी तो पहाड़ी इलाकों में मांसाहारी खाने के साथ-साथ यहां की आपसी मिली-जुली संस्कृति और रिवाज ने कश्मीरियत को जन्म दिया। ईद से लेकर रामनवमी जैसे बड़े त्यौहार यहां सब लोग मिल-जुलकर ही मनाते हैं।

    त्योहारों के अलावा दोनों समुदायों (हिंदू मुसलमान) के लोग एक-दूसरे के पारिवारिक समारोह में भी हिस्सा लेते हैं। इस दौरान वे पारंपरिक व्यंजनों को मिलकर बनाते हैं। यही कारण है कि कश्मीरी पंडित और यहां के मुसलमानों के व्यंजनों में ज्यादा फर्क नजर नहीं आता।

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    कैप्शन: कश्मीर की डल लेक का दृश्य (एआई द्वारा जेनरेट की गई इमेज)

    कश्मीरी पंडितों की मशहूर डिश: रोगन जोश

    घाटी के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कश्मीरी पंडित यूं तो ब्राह्मण हैं, लेकिन पहाड़ी इलाकों में मछली और मांस खाना एक रिवाज़ है, और एक मटन डिश: रोगन जोश इनकी पसंदीदा डिशेज़ में से एक मानी जाती है। इसकी खासियत है कि यह कम तरी वाली होती है और इसे धीमी आंच में पारंपरिक मसालों के साथ घंटों तक पकाया जाता है।

    16वीं शताब्दी में जब मुगल शासक जहांगीर ने कश्मीर का भ्रमण किया तब उसे यहां यही डिश सर्व गई थी। यह डिश फारसी है, जिसमें रोगन का मतलब होता है घी और जोश का मतलब- धीमी आंच पर पकाना।

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    कश्मीर में चिल्ला-ए-कलां के दौरान इस डिश को शौक से खाया जाता है। कश्मीरी क्यूज़ीन में जहां नॉन वेज डिशेज़ का बोलबाला है। वहीं, वेज डिशेज़ ने भी अपनी जगह बरकरार रखी है। इसी फेहरिस्त में शामिल है- कमल ककड़ी, जिसे कश्मीर में नदरू कहा जाता है।

    पांच साल पुरानी कश्मीर की कमल ककड़ी

    नदरू या कमल ककड़ी कश्मीरी पंडितों की वेज डिशेज़ में सबसे ज्यादा पंसद की जाने वाली डिश है। पालक में या किसी भी हरी सब्जी में डालकर इसे खाया जाता है। कमल ककड़ी भारत में पांच हजार साल से खाए जा रहे हैं।

    कश्मीर में यह डल लेक में उगती है, जिसे सरसों के तेल में तलकर चावल के साथ या फिर मीट के साथ पकाकर खाया जाता है। कश्मीरी नदरू को पकाते समय इसके कुरकुरेपन का खास ध्यान रखा जाता है। कश्मीरी नदरू के साथ-साथ पालक या साक भी कश्मीर में खूब पसंद किया जाता है।

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    फोटो: डल लेक में कमल ककड़ी तोड़ते हुए कश्मीरी बुजुर्ग (फाइल)

    पालक या हाक की पहचान बड़े अनोखे तरीके से की जाती है। इसके पत्ते के किनारे चिनार के पत्ते की तरह होते हैं और ये पत्ते बेहद नरम और गाढ़े हरे रंग में होते हैं। कश्मीर के लोग साक को लकड़ी की आंच पर हांडी में पकाकर बड़े चाव से खाते हैं।

    तीन हजार साल पुराना कश्मीरी हाक

    हाक का जिक्र ऋग्वेद में मिलता है। इस तरह इसका इतिहास तीन हजार साल पहले का है। कश्मीर में हाक साल भर उगता है और इसे चावल के साथ बड़े चाव से खाया जाता है। कश्मीरियों के लिए यह एक स्टेबल फूड है, जिसे रोजाना भी खाया जा सकता है।

    हाक और कमली ककड़ी के अलावा कश्मीर में लाल मिर्च भी बड़े चाव से खाई जाती है। खास बात है कि कश्मीर की ये लाल मिर्च तीखी नहीं होती, लेकिन हां... सुर्ख लाल जरूर होती है, जो सब्जी को स्वादिष्ट और रंग देती है।

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    जामुनी फूलों में पाया जाने वाला: केसर

    केसर का दूध हो, कुल्फी हो या फिर मिठाई...ऐसे मीठे व्यंजनों में कश्मीरी केसर का इस्तेमाल जरूर किया जाता है। जामुनी रंग के फूलों के बीच पाई जाने वाली डंठल ही केसर होती है, जो न केवल कीमती है बल्कि इसकी मांग भी पूरे भारत में खूब है।

    केसर कश्मीर से देश भर में निर्यात किया जाता है, लेकिन यह केसर कश्मीर का अपना नहीं है। छठी शताब्दी में रेशम के व्यापारी के साथ यह सिल्क रूट से कश्मीर पहुंचा। जिसके बाद पूरे भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसका निर्यात हुआ। कश्मीर में महाराजा रणजीत सिंह ने इसकी खेती को बढ़ावा दिया।

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    सूखे अनार के दानों की चटनी और राजमा चावल

    जब बात कश्मीर के व्यंजनों की होती है तो जम्मू का खान-पीन भी पीछे नहीं रहता। इसी क्रम में जम्मू में सबसे ज्यादा मशहूर है- राजमा चावल। अनार के सूखे दानों से तैयार की गई चटनी राजमा चावल के साथ खूब खाई जाती है।

    जम्मू का यह राजमा गाढ़े लाल रंग का होता है। इसे सौंफ और सौंठ जैसे मसालों में पकाकर तैयार किया जाता है। राजमा की तरी गाढ़ी और सूर्ख लाल होती है। राजमा को बासमती चावल के ऊपर डालकर और फिर उसके ऊपर से घी डालकर सर्व किया जाता है।

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    कैप्शन: जम्मू-कश्मीर में राजमा खूब बेचे और खाए जाने वाला व्यंजन है (फोटो एआई द्वारा जेनरेटिड किया गया है)

    कश्मीरी कहवा का 2000 साल पुराना इतिहास

    चिल्ला-ए-कलां के दौरान कश्मीर में सबसे ज्यादा काहवा पीया जाता है। यह एक खास किस्म की पत्ती से बना होता है, जो असम में पाई जाती हैं। काहवा एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब कॉफी की एक किस्म माना जाता है। कश्मीर में यह काहवा पेय पदार्श 2000 साल पहले कुषाण साम्राज्य द्वारा सिल्क रूट के जरिए आया था। पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच यह खूब मशहूर हैं।

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    कश्मीर वाज़वान: सलीके से खाए जाने वाला शाही पकवान

    वाज़वान कश्मीर में दस्तरखान पर खाने के साथ बड़े ही सलीके से परोसा जाता है। वाज़वान एक कश्मीरी शब्द है, जिसका अर्थ दो टुकड़ों में है। वाज़- यानी कुक और वान यानी शो। यानी कि व्यंजन को अच्छी तरह पकाना और बेहतर स्वाद देने के साथ-साथ उसकी पेशकश भी अच्छे से करना।

    कश्मीरी वाज़वान में कम से कम 24 डिशेज़ होती हैं। कश्मीर में शादी-ब्याह के दौरान वाज़वान ही सर्व किया जाता है, जो बड़े ही तरतीब और तहजीब के साथ मेहमानों को परोसा जाता है।

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    कश्मीरी वाज़वान को पकाने के लिए कॉपर की डेग इस्तेमाल की जाती हैं, इसके मीट को लकड़ियों की आंच से पकाया जाता है। शादी में आ रहे लोगों की संख्या के अनुसार चूल्हे लगाए जाते हैं।

    वस्ता (हेड कुक) के सुपरविजन में वाज़वान तैयार किया जाता है। वस्ता ही गोश्त (भेड़) और मसालों का चुनाव करता है और अन्य बावर्चियों को बताता है कि कौन सी चीज कितनी क्वान्टिटी में रखनी है।

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    कश्मीर में 800 साल पहले आया वाज़वान

    वाज़वान की शैली कश्मीर में करीब 800 साल पहले रेशम राजमार्ग के जरिए फारसी व्यापारी द्वारा आई। सफर के दौरान ये व्यापारी अपने साथ बावर्ची भी रखते थे, जो समय-समय पर खाना तैयार करते थे और उसे बड़े ही सलीके से सर्व करते थे।

    कई इतिहासकार मानते हैं कि चौदहवीं सदी में जब तैमूर लंग ने हिंदुस्तान पर कूच किया तब उसके साथ आए कुछ लोग कश्मीर में ही बस गए। उन्होंने यहां रहते हुए समरकंद के खानपान की परंपरा को जारी रखा, जिसमें वाज़वान भी शामिल था।

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    कैप्शन: वाज़वान कुछ इस तरह सर्व किया जाता है (फोट एआई द्वारा जेनरेटिड की गई है)

    वाज़वान में पहले सात डिशेज़ होती थीं, फिर 23 हुईं और फिर 27 और अब 37। शादी समारोह में परिवार अपनी हैसियत के अनुसार, वाज़वान तैयार करवाते हैं। वाज़वान को परोसने का तरीका भी बहुत नायाब होता है। सबसे पहले मेहमानों के हाथ धुलवाए जाते हैं फिर एक ही प्लेट में चार-चार लोगों के समूहों के अनुसार सभी को एक ही तश्तरी में मुगलई डिशेज़ परोसी जाती हैं।

    एक साथ एक ही तश्तरी में खाना, जातिगत भेदभाव को मिटता है और आपसी भाईचारे को मजबूत करता है। इसके साथ ही खास बात है कि कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुसलमान के वाज़वान बनाने का तरीका भी थोड़ा अलग होता है,

    जहां मुसलमान डिशेज़ में प्याज और लहसुन का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। वहीं, कश्मीरी पंडित अपने पकवानों में प्याज़ और लहसून के बजाय हींग का इस्तेमाल करते हैं। उनके वाज़वान में सिर्फ मीट नहीं होता, बल्कि इसमेंऔर भी शाकाहारी व्यंजन शामिल होते हैं। जैसे- दमालू, कश्मीरी पनीर, केसर, कश्मीरी कोफ्ते इत्यादि। वाज़वान की इसी तहज़ीब और तरीके के सांस्कृतिक तौर पर बहुत मायने हैं।

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