जम्मू-कश्मीर में 1999 के कानून की विदाई, को-ऑपरेटिव सोसाइटीज के लिए क्या-क्या बदला? जानें नए सिस्टम की पूरी डिटेल
जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिससे 1999 के स्वावलंबी सहकारी कानून को निरस्त कर सभी समितियों को 1989 के अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में अब 1989 के अधिनियम के दायरे में आएंगी समितियां।
HighLights
1999 का स्वावलंबी सहकारी कानून अब निरस्त, 1989 अधिनियम लागू।
सहकारी समितियों के पंजीकरण, प्रबंधन और वित्तीय निगरानी सख्त होगी।
नियम उल्लंघन पर जुर्माने की राशि में भारी बढ़ोतरी प्रस्तावित है।
नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में सहकारी क्षेत्र के नियामकीय ढांचे में बड़े बदलाव का रास्ता साफ हो गया है। विधानसभा ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। विधेयक के लागू होने के बाद जम्मू-कश्मीर स्वावलंबी सहकारी समितियां अधिनियम, 1999 को निरस्त करने और उसके तहत पंजीकृत समितियों को जम्मू-कश्मीर सहकारी समितियां अधिनियम, 1989 के दायरे में लाने का प्रावधान है।
विधेयक को सहकारिता मंत्री जावेद अहमद डार ने विधानसभा के जारी शरदकालीन सत्र में विचार और पारित करने के लिए पेश किया। प्रस्तावित बदलाव केवल 1999 के कानून को खत्म करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सहकारी समितियों के पंजीकरण, सदस्यता, प्रबंधन, लेखा परीक्षण, वित्तीय निगरानी और नियामकीय अनुपालन की व्यवस्था को भी अधिक स्पष्ट और सख्त बनाने का प्रयास करते हैं।
1999 के स्वावलंबी कानून के तहत पंजीकृत समितियों के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 1999 के स्वावलंबी सहकारी कानून को निरस्त करने के बाद उससे जुड़ी समितियों के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था है।
पुराने आदेश और नियम फिलहाल रहेंगे प्रभावी
प्रस्ताव के अनुसार, कानून लागू होने से ठीक पहले 1999 के अधिनियम के तहत पंजीकृत स्वावलंबी सहकारी समितियों को 1989 के सहकारी समितियां अधिनियम के तहत पंजीकृत माना जाएगा। हालांकि, इसके बाद इन समितियों को संशोधित अधिनियम और उसके तहत बनाए जाने वाले नियमों का पालन करना होगा।
साथ ही, 1999 के कानून के तहत पहले किए गए कार्य, जारी आदेश तथा बनाए गए नियम और उप-नियम तब तक प्रभावी रहेंगे, जब तक वे संशोधित कानून के प्रावधानों के विपरीत नहीं हैं। इससे मौजूदा समितियों के कामकाज में तत्काल कानूनी शून्य पैदा होने से बचाने की कोशिश की गई है।
पंजीकरण के लिए उप-नियम और संबंधित दस्तावेज जरूरी
विधेयक में सहकारी समितियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को भी अधिक दस्तावेज-आधारित बनाने का प्रस्ताव है। किसी नई सहकारी समिति के पंजीकरण के आवेदन के साथ उसके प्रस्तावित उप-नियम की प्रति देना अनिवार्य होगा।
प्राथमिक कृषि और गैर-कृषि सहकारी समितियों के लिए न्यूनतम 25 सदस्य रखने का प्रस्ताव है।
सहकारी बैंकों के मामले में स्थायी पंजीकरण से पहले भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की लिखित सहमति आवश्यक किए जाने का प्रस्ताव है।
आवासीय सहकारी समितियों के लिए भूमि का प्रमाण अनिवार्य
सहकारी आवासीय समिति के पंजीकरण में जमीन से जुड़े दस्तावेजों पर भी जोर दिया गया है। रजिस्ट्रार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समिति के पास प्रस्तावित गतिविधि के लिए भूमि उपलब्ध है और उस पर उसका वैध कब्जा है।
इसके लिए स्वामित्व विलेख, आवंटन पत्र या सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाणित भूमि रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
इसी तरह पेशेवर या तकनीकी संस्थानों से संबंधित सहकारी समितियों के लिए संबंधित नियामक या लाइसेंसिंग प्राधिकरण की पूर्व लिखित मंजूरी या लाइसेंस जरूरी होगा।
दवाइयों, उर्वरकों, मुर्गीपालन और अन्य विनियमित क्षेत्रों में काम करने वाली समितियों के लिए संबंधित सरकारी विभाग या एजेंसी से वैध अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) या लाइसेंस पंजीकरण की पूर्व शर्त होगी।
लेखा परीक्षण और वित्तीय निगरानी होगी ज्यादा सख्त
विधेयक में सहकारी समितियों की वित्तीय निगरानी को मजबूत करने पर खास जोर दिया गया है। कुछ प्रावधानों के तहत निर्धारित समयसीमा को तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करने का प्रस्ताव है। लगातार निर्धारित अवधि तक खातों का लेखा परीक्षण नहीं कराने को भी कार्रवाई का आधार बनाए जाने का प्रस्ताव है।
सहकारी बैंकों के लेखा परीक्षण के लिए भी व्यवस्था बदली जा रही है। शहरी सहकारी बैंक, केंद्रीय सहकारी बैंक और शीर्ष सहकारी बैंक के खातों का लेखा परीक्षण ऐसे चार्टर्ड अकाउंटेंट से कराने का प्रस्ताव है, जो भारतीय रिजर्व बैंक या नाबार्ड के अनुमोदित पैनल में शामिल हों और संबंधित बोर्ड द्वारा नियुक्त किए जाएं।
इसके अलावा रजिस्ट्रार को शीर्ष, केंद्रीय, शहरी या ग्रामीण सहकारी बैंक तथा सहकारी ऋण समिति का विशेष लेखा परीक्षण कराने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है।
जुर्माने की राशि में भारी बढ़ोतरी
विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की राशि में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। कुछ मामलों में मौजूदा 200 रुपये के जुर्माने को बढ़ाकर दो लाख रुपये करने का प्रस्ताव है, जबकि एक अन्य प्रावधान में 500 रुपये के जुर्माने को बढ़ाकर एक लाख रुपये करने की बात कही गई है।
सदस्यता और प्रबंधन के नियमों में बदलाव
विधेयक में सदस्यता और प्रबंधन से जुड़े प्रावधानों में भी संशोधन प्रस्तावित हैं। कुछ परिस्थितियों में कंपनियों, फर्मों और अन्य संस्थाओं को केंद्रीय या शीर्ष स्तर की सहकारी समितियों में नाममात्र सदस्य के रूप में शामिल करने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।
एक समान कानूनी ढांचे में लाने की कोशिश
कुल मिलाकर, जम्मू-कश्मीर सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक, 2026 का सबसे बड़ा बदलाव 1999 के स्वावलंबी सहकारी समितियां अधिनियम को समाप्त कर उसके तहत काम कर रही समितियों को 1989 के व्यापक सहकारी कानून के ढांचे में लाना है।
इसके साथ पंजीकरण से लेकर लेखा परीक्षण, बैंकिंग गतिविधियों, भूमि दस्तावेजों, विशेष लाइसेंस, सदस्यता और वित्तीय अनुपालन तक कई स्तरों पर नियमों को अधिक स्पष्ट और कठोर बनाने का प्रस्ताव है।
इस बदलाव का व्यावहारिक असर यह होगा कि 1999 के स्वावलंबी कानून के तहत काम कर रही मौजूदा समितियों को संक्रमणकालीन व्यवस्था के बाद 1989 के संशोधित अधिनियम और उसके तहत बनने वाले नियमों के अनुरूप काम करना होगा। यानी बदलाव सिर्फ कानून की किताब में नहीं, बल्कि सहकारी समितियों के दैनिक प्रशासन, वित्तीय जवाबदेही और नियामकीय निगरानी में भी दिखाई देगा।
