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    कश्मीर में ग्लोबल वार्मिंग का असर, बर्फबारी की कमी से गर्मियों में गहरा सकता है पेयजल संकट

    Updated: Fri, 16 Jan 2026 02:14 PM (GMT+05:30)

    कश्मीर घाटी ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि घाटी के मौसम में बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां ...और पढ़ें

    बर्फबारी की कमी से गर्मियों में गहरा सकता है पेयजल संकट (फाइल फोटो)

    बर्फबारी की कमी से गर्मियों में गहरा सकता है पेयजल संकट (फाइल फोटो)

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    रजिया नूर, श्रीनगर। लोग माने न माने, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन ने धरती का स्वर्ग कहलाने वाली कश्मीर घाटी को भी प्रभावित किया है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि घाटी के मौसम में परिवर्तन के मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग है। घाटी जो न केवल सुंदरता बल्कि विशेष और संवेदलनशील पर्यावरण के लिए भी पूरे विश्व में जानी जाती रही है।

    यहां हर मौसम लुभावना होता था। देश व दुनिया के शेष भागों से लोग गर्मियों में झुलसती गर्मी से राहत पाने के लिए घाटी का रुख कर सुहावने मौसम का लुत्फ उठाते थे। वहीं, सर्दियों में बर्फ की मोटी चादर से ढकी घाटी भी पर्यटकों को सुकून देती थी। पर्यटक यहां इस मौसम का भी लुत्फ उठाते थे। अब गर्मियों में घाटी भी देश के अन्य हिस्सों की तरह तपती रहती है।

    बर्फबारी के लिए तरसे लोग

    गत वर्षों में घाटी ने गर्मियों के दशकों पुराने रिकार्ड तोड़ दिए, 2025 में भी घाटी गर्मियों के मौसम में तपते रेगिस्तान का मंजर पेश करती रही।

    मौजूदा सर्दियों में भी अगर यह कहें कि घाटी सूखी बंजर जमीन की तरह हो गई है तो गलत नहीं होगा, क्योंकि अभी आधी सर्दी तक कि बर्फबारी के लिए जाना जाने वाला सर्दियों का सबसे कठिन दौर 40 दिवसीय चिलेकलां की आधी पारी बीत जाने के बाद भी घाटी विशेषकर निचले क्षेत्र वर्षा व बर्फबारी के लिए तरस गए हैं।

    90 फीसदी लोग पानी के लिए बर्फबारी पर निर्भर

    मौजूदा सर्दियों में गुलमर्ग समेत घाटी के उच्च पर्वतीय इलाकों में कई बार बर्फबारी हुई है लेकिन निचले इलाके अभी भी प्रकृति की बड़ी नेमत के इंतजार में है। घाटी में बर्फबारी सिर्फ एक पर्यटन आकर्षण से कहीं ज़्यादा है।

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    यह स्थानीय जलवायु, सर्दियों की फसलों और बागवानी, झरनों और नदियों में पानी की उपलब्धता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।प्रदेश विशेषकर घाटी पानी के लिए 90 प्रतिशत बर्फबारी पर निर्भर हैं।