बोकारो में तालाबों पर भू-माफियाओं का कब्जा, 18 में से कई जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में
बोकारो के चास नगर निगम क्षेत्र में पारंपरिक तालाबों का अस्तित्व खतरे में है। 18 तालाबों में से कई पर अतिक्रमण हो गया है और उनकी जमीन का प्रकार बदल दिय ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मानिक सिंह, चास(बोकारो)। चास नगर निगम क्षेत्र में स्थित पारंपरिक तालाबों का अस्तित्व धीरे-धीरे संकट में पड़ता जा रहा है। सरकारी अभिलेखों में दर्ज इन जलस्रोतों के जलक्षेत्र पर अतिक्रमण और जमीन के किस्म में बदलाव के कारण अब इनके पूरी तरह समाप्त होने का खतरा मंडराने लगा है।
जानकारी के अनुसार, नगर निगम क्षेत्र के कुल 18 तालाब जिला मत्स्य विभाग द्वारा नगर निगम को हस्तांतरित किए गए थे, लेकिन रखरखाव और निगरानी के अभाव में इनका बड़ा हिस्सा भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के कब्जे में चला गया है।
कई मामलों में तालाब की जमीन का किस्म बदलकर उसे रैयती भूमि के रूप में दर्ज कर दिया गया, जिससे इन जमीनों की खरीद-फरोख्त तक होने लगी। यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं और कई पर कार्रवाई की गाज गिरना तय माना जा रहा है।
सरकारी नक्शे पर तालाब, जमीन पर मकान
दरअसल, सरकारी नक्शा और खतियान के अनुसार इन तालाबों की जमीन सरकारी श्रेणी में दर्ज है और इन्हें जलस्रोत के रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए था। इसके बावजूद आरोप है कि अंचल कार्यालय के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत से तालाबों की जमीन का नेचर बदलकर पंजी-2 में रैयती दर्ज कर दिया गया। इसके बाद भू-माफियाओं ने इन जमीनों को प्लॉटिंग कर बेचने का खेल शुरू कर दिया।
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स्थानीय लोगों का कहना है कि कई तालाबों के जलक्षेत्र को मिट्टी डालकर समतल कर दिया गया, जिसके कारण अब वहां तालाब का कोई स्पष्ट स्वरूप दिखाई भी नहीं देता।
अतिक्रमण रोकने के लिए समय-समय पर कार्रवाई की बातें जरूर सामने आती हैं, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव के कारण अधिकतर मामलों में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती। यही कारण है कि धीरे-धीरे चास क्षेत्र के दर्जनों तालाबों का अस्तित्व नक्शे से मिटने की कगार पर पहुंच गया है।
सूचना के अधिकार से मिली महत्वपूर्ण जानकारी
सूचना के अधिकार के तहत सामने आए तथ्यों ने भी इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। चास के कृष्णापुरी निवासी रवि कुमार वर्मा द्वारा मांगी गई सूचना में खुलासा हुआ है कि कई तालाबों का मूल स्वरूप ही बदल दिया गया है।
दस्तावेजों में जिन भूखंडों को तालाब के रूप में दर्ज होना चाहिए था, उनमें से कई को अलग श्रेणी में दर्ज कर दिया गया है। इससे न केवल तालाबों का क्षेत्रफल कम हुआ, बल्कि कई जगहों पर पूरी तरह अतिक्रमण भी हो गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि तालाब केवल जलसंचयन का साधन ही नहीं हैं, बल्कि इनका सामाजिक और धार्मिक महत्व भी है। वर्षों से पूजा-पाठ, छठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इन तालाबों का उपयोग होता रहा है। इसके बावजूद इन जलस्रोतों के संरक्षण के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है, जिससे लोगों में नाराजगी भी बढ़ रही है।
नगर निगम को मत्स्य विभाग ने दिया था 18 तालाब
जिला मत्स्य विभाग द्वारा नगर निगम को जिन प्रमुख तालाबों को हस्तांतरित किया गया था, उनमें सोलागीडीह का बड़ा बांध तालाब, पुराना बांध, सुढ़ी गोडिया (भर्रा), डंगर गोडिया, जामगोडिया बांध, भोलूर बांध, मैरा बांध और नूतन बांध सहित अन्य तालाब शामिल हैं। इन सभी तालाबों का कुल रकबा लगभग 62.32 एकड़ बताया जाता है।
इनमें से सोलागीडीह स्थित बड़ा बांध तालाब करीब 18.36 एकड़ क्षेत्र में फैला है, लेकिन इसके आधे से अधिक हिस्से पर अब अतिक्रमण हो चुका है। इसी तरह 6.64 एकड़ में फैले पुराना बांध तालाब के भी लगभग एक चौथाई हिस्से पर कब्जा हो चुका है।
छोटे तालाबों में भी कई जगहों पर मिट्टी भरकर जमीन को समतल कर दिया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इन जलस्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त नहीं कराया गया तो आने वाले वर्षों में ये तालाब पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे और शहर को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
दस तालाब का नहीं चल रहा पता
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि नगर निगम क्षेत्र के 18 तालाबों में से करीब दस तालाबों की जमीन कथित तौर पर अंचल कार्यालय की मिलीभगत से भू-माफियाओं के हाथों बेच दी गई।
जब भी प्रशासन की ओर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू होती है, तब स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दबाव आ जाता है और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है, जबकि उच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर जलस्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त कराने और उनके संरक्षण के लिए सख्त निर्देश दिए हैं।
इसके बावजूद चास में इन निर्देशों का पालन नहीं हो पा रहा है। सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही गंभीरता नहीं दिखाई तो चास के ऐतिहासिक तालाब सिर्फ सरकारी कागजों में ही बचकर रह जाएंगे।
ऐसे में जरूरत है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए और तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कर उनके संरक्षण के लिए ठोस योजना बनाई जाए।