देवघर जेल के कैदियों के हाथों सजता है बाबा बैद्यनाथ का दरबार, 115 साल पुरानी है मुकुट बनाने की अनूठी परंपरा
Baba Baidyanath Temple: देवघर मंडल कारा के कैदी 115 साल से बाबा बैद्यनाथ के लिए नाग मुकुट बनाते हैं, जिससे ...और पढ़ें

देवघर स्थित प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर। (फोटो जागरण)
आरसी सिन्हा, देवघर। धर्म और आध्यात्म की प्रसिद्ध नगरी देवघर। एक नहीं, कई-कई परंपराएं विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर से जुड़ी हैं।
मनोकामना लिंग के रूप में इस दरबार की ऐसी ख्याति है कि दुनिया के किसी दरबार से निराश सनातनी जब द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ के दरबार में एक बार अपना शीश नवाता है तो उसकी हर मुराद पूरी होती है।
तभी तो भोलेनाथ की पूजा विद्वान लंकापति रावण ने की। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कांवर यात्रा की कथा भी कही जाती है। बाबा मंदिर में प्रातःकालीन पूजा, कांचा जल की परंपरा और श्रृंगार की परंपरा है।
इनमें एक विशेष परंपरा यह भी है कि देवघर मंडल कारा के कैदी प्रतिदिन नाग मुकुट तैयार करते हैं और वही नाग मुकुट शाम की श्रृंगार पूजा के बाद बाबा को अर्पित किया जाता है। आज से 114 साल पहले देवघर में एक जेलर हुआ करता था, जिसने इसकी शुरुआत की थी। महाशिवरात्रि पर चार पहर की पूजा होती है और उस दिन शाम में श्रृंगार पूजा नहीं होती है।
चूंकि साल भर नाग मुकुट बनाने की परंपरा चली आ रही है, इसलिए एक विशेष परंपरा यह भी बनी कि सावन पूर्णिमा के अवसर पर देवघर मंडल कारा में दो विशेष नाग-मोर मुकुट बनाए जाएंगे।
इनमें एक बाबा बैद्यनाथ के दरबार में जाएगा, जबकि दूसरा नाग-मोर मुकुट बाबा बासुकीनाथ की श्रृंगार पूजा में अर्पित किया जाएगा। शुक्रवार को देवघर मंडल कारा में दोनों नाग-मोर मुकुट तैयार होंगे। इस परंपरा के अब 115 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
अंग्रेज जेलर ने शुरू की थी परंपरा
नाग मुकुट बनाने की कथा यह है कि अंग्रेज जेलर ने शुरू कराया था। जिसका निर्माण जेल के लगभग दस कैदी दिनभर उपवास रखकर करते हैं। संध्या काल में यह मुकुट सुरक्षा प्रहरियों के द्वारा नगर भ्रमण करते हुए बम भोले के जय घोष के साथ मंदिर पहुंचते हैं।
शृंगार के समय मुख्य पुजारी भोलेनाथ को अर्पित करते हैं। बाबा बैद्यनाथ की प्रात:कालीन पूजा करने वाले पुजारी निर्जला रहकर शृंगार पूजा करते हैं। बाबा बैद्यनाथ का शृंगार विधि को देखने से अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। ऐसा लगता है की भक्ति के सागर में गोते लगा रहे हैं।
शृंगार के समय मलमल के नव वस्त्र के साथ शिवलिंग को साफ किया जाता है । जिसके बाद सवा किलो पीसा हुआ चंदन शिवलिंग के ऊपर रखा जाता है और विभिन्न प्रकार के पुष्प, इत्र व अन्य पूजन सामग्री से पूजन किया जाता है। अंत में पुष्प मुकुट अर्पित किया जाता है।
असाध्य रोग से मुक्ति
बाबा पर अर्पित फुलेल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की होड़ लग जाती है। कहते हैं कि फुलेल असाध्य रोग के स्थान पर लगाने से रोगों से मुक्ति मिलती है । शृंगार के उपरांत भोलेनाथ को भोग भी लगाया जाता है। जो समसामयिक उपलब्ध सामग्रियों से निर्मित होता है।
सुबह कांचा पूजा के पहले शृंगार के आवरण को हटाया जाता है और माना जाता है कि चंदन घाम चंदन को नित्य दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से अकाल मृत्यु नहीं होती है।
देवघर मंडल कारा में 1911 से कैदी द्वारा नाग मुकुट बनाया जा रहा है। लगभग दस कैदी उपवास रखकर यह तैयार करते हैं और शाम में बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पूरे सम्मान के साथ ले जाया जाता है। सावन पूर्णिमा को दो विशेष नाग मोर मुकुट तैयार होता है। एक बाबा बैद्यनाथ के नाम और दूसरा बाबा बासुकीनाथ के नाम तैयार होता है। जिला प्रशासन से मिले विशेष व्यवस्था के तहत बासुकीनाथ दरबार ले जाया जाता है।
