ट्रेन की एक यात्रा ने बदली धनबाद के अंकित की सोच, परिवार के साथ 12 लोगों के जीवन को दी नई दृष्टि
ट्रेन में नेत्रहीन बच्ची को देखकर अंकित राजगढ़िया ने नेत्रदान का संकल्प लिया।

नानी कमला अग्रवाल के मरणोपरांत नेत्रदान के बाद कार्निया के साथ आई-बैंक की टीम व अंकित।(जागरण)
HighLights
अंकित राजगढ़िया ने नेत्रहीन बच्ची से प्रेरित होकर नेत्रदान संकल्प लिया।
उनके परिवार के छह सदस्यों ने नेत्रदान कर 12 जीवन रोशन किए।
धनबाद में 42 लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण से नई दृष्टि मिली।
डॉ. मोहन गोप, धनबाद। साल 2010 में 10वीं कक्षा के छात्र रहे अंकित राजगढ़िया कतरास से धनबाद तक प्रतिदिन ट्रेन से आते-जाते थे। एक दिन ट्रेन में नेत्रहीन बच्ची दिखी।
बातचीत शुरू हुई तो अंकित को पहली बार अनुभव हुआ कि बिना आंखों के जीवन कितना कठिन है। बच्ची की बातों ने अंकित को भावुक कर दिया।
इसके बाद उन्होंने लोगों की जिंदगी रोशन करने का जो सिलसिला शुरू किया, उसमें परिवार, रिश्तेदार के साथ समाज के लोग जुड़ते गए। उनके परिवार और रिश्तेदारों की वजह से ही 12 लोगों की जिंदगी रोशन हो चुकी है।
इसके बाद ही अन्य की आंखों में उजाला भरने की उनकी मुहिम जारी है। अंकित बताते हैं कि जब उस बच्ची की जिंदगी की कठिनाई के बारे में जाना तो वह ट्रेन से उतरकर सीधे शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आई-बैंक पहुंच गए।

मामा सुरेश अग्रवाल की मृत्यु के बाद अंकित के प्रयास से नेत्रदान कराया गया।
वहां डॉक्टर से जीते-जी नेत्रदान की इच्छा जताई। आई-बैंक के डॉक्टर ने समझाया कि यह काम मरणोपरांत ही संभव है। डॉक्टर की बात से वह निराश नहीं हुए, बल्कि उन्होंने बड़ा संकल्प लिया।
ठान लिया कि वह न सिर्फ खुद नेत्रदान करेंगे, बल्कि परिवार व समाज को भी प्रेरित करेंगे। अंकित ने घर के सदस्यों को जब नेक इरादे के बारे में बताया, तो मां सरोज राजगढ़िया सबसे पहले तैयार हुईं। भाई सनोज भी आगे आया।
सभी ने नेत्रदान की शपथ लेकर अंकित का साथ देने का भरोसा दिया। अंकित ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए देहदान का शपथ-पत्र भरा, फिर अपनी मां से अंगदान का संकल्प-पत्र भी भरवाया।
छह जोड़ी आंखों से 12 लोगों को नई जिंदगी
अंकित राजगढ़िया के संकल्प से परिवार के अलावा उनके दोस्त व समाज के अन्य लोग भी जुड़े। परिवार से पहला नेत्रदान साल 2012 में हुआ।
अंकित के बड़े पापा 80 वर्षीय देवीप्रसाद राजगढ़िया ने रांची में अंतिम सांसें लीं और वहीं कश्यप मेमोरियल अस्पताल में नेत्रदान कराया गया। इसके बाद 2014 में किडनी रोग से पीड़ित पिता प्रकाशचंद्र राजगढ़िया की मृत्यु के बाद उनका भी नेत्रदान कराया गया।

19 नवंबर 2025 को मरणोपरांत आलोक राजगढ़िया का नेत्र दान कराते अंकित राजगढ़िया। (काली शर्ट में)
साल-दर-साल अंकित की मुहिम में परिवार से कई नाम जुड़े। 2019 में बड़ी मां बिमला राजगढ़िया, 2021 में मामा सुरेश अग्रवाल, 2022 में कमला अग्रवाल और 2025 में चचेरे भाई आलोक की ब्रेन हैमरेज से मृत्यु के बाद नेत्रदान कराया गया।
अंकित का दावा है कि एक ही परिवार से छह लोगों का नेत्रदान का उदाहरण रिकार्ड है। इसके लिए उन्हें दिल्ली समेत देश के कई शहरों में सम्मानित किया जा चुका है।
डॉक्टरों के मुताबिक एक व्यक्ति के नेत्रदान करने से दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटाई जा सकती है। अंकित के परिवार से हुए छह नेत्रदान से 12 लोग आज दुनिया देख रहे हैं।
धनबाद में 42 लोगों को मिली रोशनी
एसएनएमएमसीएच के आई-बैंक में ये सभी प्रत्यारोपण संपन्न हुए। मेडिकल कालेज में साल 2018 से नेत्रदान कराया जा रहा है। अब तक 42 लोगों को कार्निया ट्रांसप्लांट से जिंदगी मिली है।
इनमें से कुछ जन्मजात तो, किसी ने बीमारी के कारण आंखें खो दी थीं। अस्पताल के अनुसार मेडिकल कालेज में अभी तक 90 लोगों ने नेत्रदान किया है। हालांकि पिछले दो वर्षों से चिकित्सकों की कमी के कारण आई-बैंक बंद है।
