पारसनाथ पहाड़ पर फिर गरमाया विवाद, जैन संगठन के दावे के विरोध में उतरा आदिवासी समाज
Parasnath Hill Dispute: गिरिडीह के पारसनाथ पहाड़ पर जैन समाज और आदिवासियों के बीच विवाद फिर गहरा गया है, जहां ...और पढ़ें

गिरिडीह परिसदन में मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा के पदाधिकारी। (फोटो जागरण)
HighLights
पारसनाथ पहाड़ पर जैन-आदिवासी समुदायों में धार्मिक विवाद गहराया।
जैन इसे सम्मेद शिखरजी, आदिवासी मरांग बुरु मानते हैं।
आदिवासी समुदाय ने आंदोलन की चेतावनी दी, अधिकार मांगे।
संवाद सहयोगी, गिरिडीह। Parasnath Hill Dispute पारसनाथ पहाड़ को लेकर जैन समाज और आदिवासियों के बीच एक बार फिर से विवाद सतह पर आ गया है। पारसनाथ पहाड़ को जैन समाज ‘सम्मेद शिखरजी’ और संताल आदिवासी ‘मरांग बुरु’ मानते हैं।
जैन धर्मावलंबियों के लिए यह अत्यंत पवित्र तीर्थ है, जहां मान्यता है कि 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया। वहीं संताल समाज इसे अपने सर्वोच्च देवता मरांग बुरु का निवास और प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल मानता है।
विवाद मुख्यतः धार्मिक अधिकार, पारंपरिक पूजा-पद्धति और Sendra (पारंपरिक शिकार पर्व) को लेकर है। आदिवासियों की शिकार व बलि जैसी परंपराएं जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत से टकराती हैं। इसी कारण मांस-मदिरा पर रोक और पहाड़ की धार्मिक पहचान को लेकर दोनों पक्षों में लंबे समय से मतभेद हैं।
विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष संजय जैन ने पारसनाथ पहाड़ पर अपना दावा पेश किया है। इसके साथ ही अल्पसंख्यक आयोग से केंद्र व राज्य सरकार से आदेश का पालन और संरक्षण की मांग की है। इसका मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा ने विरोध किया है।
सोमवार को गिरिडीह के नया परिसदन में प्रेसवार्ता आयोजित कर मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा के पदाधिकारियों ने विश्व जैन संगठन के दावे को खारिज किया। मारांग बुरू बचाओ संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष महावीर मुर्मू, सचिव विष्णु किस्कु, प्रवक्ता सुधीर बास्के ने कहा कि आदिवासी समुदाय जैन समुदाय के संपूर्ण मारांग बुरू पारसनाथ पहाड़ पर दावे को खारिज करते हुए इसका विरोध करता है।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि पारसनाथ पहाड़ संथाल आदिवासियों का मारांग बुरू है और संपूर्ण मारांग बुरू की पूजा-अर्चना की जाती है, जो उनका पवित्र व सर्वश्रेष्ठ धार्मिक स्थल है। संपूर्ण मारांग बुरू पारसनाथ में 24 से अधिक टोले हैं, जिसमें मांझी (प्रधान) हैं।
मोर्चा ने कहा कि न्यायालय ने आदिवासी संथालों के प्रथागत पुरखौती अधिकार को मान्यता दी है। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से जैन समुदाय के लिए विशेष व्यवस्था हेतु आदेश जारी करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।
इतिहास में सम्मेद शिखर के नाम से कहीं भी दर्ज नहीं है, जबकि मारांग बुरू सरकारी दस्तावेज और इतिहास में दर्ज किया गया है। मोर्चा के पदाधिकारियों ने कहा कि पारसनाथ पर्वत मारांग बुरू हम आदिवासियों का है और रहेगा।
जैन समुदाय के लोग धन-बल से राज्य, केंद्र सरकार व न्यायालय को गुमराह कर भोले-भाले आदिवासियों को अपने मौलिक अधिकार से वंचित करना चाहते हैं, जो गलत और अपराध है।
आदिवासी संथाल समुदाय ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि जैन समुदाय के पक्ष में एकतरफा आदेश को निरस्त करें और न्यायालय के आदेश से संरक्षित मारांग बुरू पारसनाथ को आदिवासियों का अति प्राचीन व सर्वश्रेष्ठ धार्मिक स्थल घोषित किया जाए, ताकि परंपरागत प्रथागत अधिकार का संरक्षण किया जा सके।
साथ ही चेतावनी दी गई है कि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से सकारात्मक पहल नहीं करने पर आदिवासी समुदाय बड़ा आंदोलन करेगा।
