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गाय-बैलों को पहनाते हैं धान का मुकुट, रातभर गूंजते हैं अहिरा गीत; अनोखा है मानभूम का बंदना पर्व

Published: Fri, 06 Nov 2026 01:05 PM (IST)

झारखंड और पुरुलिया के मानभूम अंचल में मनाया जाने वाला बंदना पर्व पशुधन के प्रति कृतज्ञता जताने का एक अनूठा ...और पढ़ें

बंदना पर्व मानभूम में पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक।

बंदना पर्व मानभूम में पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक।

HighLights

  1. बंदना पर्व मानभूम में पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक।

  2. पशुपति शिव की लोकगाथा से जुड़ी है यह प्राचीन परंपरा।

शेफाली महतो, पुरुलिया। नई फसल की खुशबू, हेमंत की सुनहरी धूप और मादल-धमसा की गूंज। मानभूम की धरती पर बंदना पर्व का रंग चढ़ते ही गांव-गांव उत्सवमय हो उठता है।

झारखंड और पुरुलिया के मानभूम अंचल में मनाया जाने वाला बंदना पर्व महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, लोकआस्था और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का अनूठा प्रतीक है। इसे गो-वंदना के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व में किसान अपने जीवन और आजीविका के आधार गोधन की पूजा कर उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

पशुपति शिव से जुड़ी है लोकगाथा

लोकमान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में मनुष्य खेती के लिए गाय-बैल और भैंसों पर निर्भर था, लेकिन उनसे दिनभर कठिन परिश्रम कराने के बावजूद उनके भोजन और देखभाल पर ध्यान नहीं देता था। इससे नाराज होकर सभी पशु भगवान शिव के दरबार में पहुंचे और अपनी पीड़ा सुनाई। पशुपति शिव ने उनकी शिकायत सुनकर स्वयं धरती पर आकर स्थिति देखने और दोषी मनुष्यों को दंड देने का संकल्प लिया।

महादेव के क्रोध से चिंतित मां दुर्गा ने मनुष्यों को इसकी सूचना दे दी। इसके बाद लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ। जिन पशुओं के श्रम से उनके घरों में अन्न पहुंचता था, उन्हीं की उपेक्षा करने का उन्हें पश्चाताप हुआ। इसी लोकगाथा से बंदना पर्व की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

जिहुड़ से शुरू होती है तैयारी

आश्विन संक्रांति के अवसर पर मनाए जाने वाले जिहुड़ पर्व से बंदना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस दिन खामार बांधने की परंपरा है। इसके बाद घरों और गोहालों की साफ-सफाई तथा मिट्टी और गोबर से लिपाई की जाती है। पर्व से कुछ दिन पहले ही गाय-बैलों को नदी और तालाब में स्नान कराया जाता है। उनके सींगों पर तेल लगाया जाता है और उन्हें सजाने की तैयारी होती है।

बंदना से एक दिन पहले गांव के लाया (पारंपरिक पुजारी) द्वारा गट पूजा की जाती है। इसके बाद आती है बंदना की रात, जिसे 'गाय जागा' भी कहा जाता है। इस रात गांवों में मादल, ढाक, ढोल, धमसा और चेंड़पेटी की थाप गूंजने लगती है। झांगरों की टोली घर-घर पहुंचती है और कपीला मंगल तथा अहिरा गीतों के माध्यम से पशुपति शिव की लोकगाथा का गुणगान करती है।

सिंदूर, धान के मुकुट और अल्पना से सजता है उत्सव

बंदना के अवसर पर महिलाएं घर-आंगन को मिट्टी और गोबर से लीपकर आकर्षक अल्पना बनाती हैं। कांसे की थाली में दीपक, आतप चावल, गुड़, पीठा और लड्डू सजाकर गायों का स्वागत किया जाता है। उनके माथे और सींगों पर सिंदूर लगाया जाता है तथा सिर पर धान से बने मुकुट सजाए जाते हैं। तेल-सिंदूर से पूजा करने के बाद धान और दूर्वा अर्पित कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है।

अगली सुबह गोहाल पूजा अथवा गरया पूजा होती है। इस दिन भी गाय-बैलों को विभिन्न रंगों से सजाया जाता है। उनके गले में विशेष मोड़ पहनाया जाता है और बड़े स्नेह से उनकी पूजा की जाती है। कुछ लोग इसे गिरि गोवर्धन पूजा के रूप में भी मानते हैं।

चख पुरा से लेकर गोरुखुटा तक उत्सव

बंदना के अगले दिन घरों के आंगन में चावल के आटे और पान की लताओं से विशेष अल्पना बनाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में 'चख पुरा' कहते हैं। इस अल्पना पर सिंदूर और दूर्वा रखकर गायों को उसे पार कराया जाता है। इसके बाद गोरुखुटा की परंपरा निभाई जाती है। अंत में बूढ़ी बंदना और कांचा काड़ा जैसे पारंपरिक आयोजनों के साथ कई दिनों तक चलने वाले इस महापर्व का समापन होता है।

बंदना मानभूम की लोकसंस्कृति की ऐसी विरासत है, जिसमें प्रकृति, कृषि, पशुधन और मनुष्य के बीच गहरे संबंध की झलक मिलती है। आधुनिकता के दौर में भी यह पर्व ग्रामीण समाज को याद दिलाता है कि खेती-किसानी की समृद्धि में पशुधन का योगदान कितना महत्वपूर्ण है। 

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