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नोएल टाटा से बिगड़ता रहा रिश्ता, रतन टाटा के निधन के बाद अकेले पड़े चंद्रशेखरन; नए निवेश और लिस्टिंग के मुद्दे पर रार

Published: Wed, 12 Aug 2026 12:42 PM (IST)Updated: Wed, 12 Aug 2026 02:17 PM (IST)

रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में शक्ति संतुलन बदल गया, जिससे चंद्रशेखरन संस्थागत रूप से अकेले पड़ ...और पढ़ें

रतन टाटा के बाद चंद्रशेखरन का टाटा समूह से अलगाव: नेतृत्व परिवर्तन का परिणाम। (फोटो: फाइल)

रतन टाटा के बाद चंद्रशेखरन का टाटा समूह से अलगाव: नेतृत्व परिवर्तन का परिणाम। (फोटो: फाइल)

HighLights

  1. रतन टाटा के निधन से टाटा समूह में शक्ति संतुलन बदला।

  2. नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार पर आपत्ति जताई।

  3. चंद्रशेखरन ने कार्यकाल समाप्ति पर पुनर्नियुक्ति न मांगने का निर्णय लिया।

जागरण संवादाता, जमशेदपुर। रतन टाटा केवल टाटा समूह के प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे चंद्रशेखरन के सबसे बड़े मार्गदर्शक और ढाल थे। जब तक रतन टाटा जीवित रहे, चंद्रशेखरन को हर बड़े फैसले में उनका पूर्ण और खुला समर्थन मिला। लेकिन, नौ अक्टूबर 2024 को रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह के भीतर शक्ति संतुलन की पूरी तस्वीर बदल गई।

रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का पद संभाला। टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो समूह की रणनीति और शासन व्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव रखती है।

रतन टाटा के बाद परिवार के प्रभाव और पेशेवर नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया। बिना किसी व्यक्तिगत संरक्षण या सर्वमान्य मध्यस्थ के, चंद्रशेखरन संस्थागत रूप से अकेले पड़ गए और उन पर ट्रस्ट की निगरानी का दबाव बढ़ गया।

स्थिति तब बिगड़ गई जब फरवरी 2026 में टाटा संस के बोर्ड में चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल (पांच साल) के विस्तार का प्रस्ताव आया। नोएल टाटा ने इस पर गहरी आपत्ति जताई। उन्होंने एयर इंडिया के बढ़ते घाटे, बिग बास्केट जैसे नए डिजिटल कारोबारों के प्रदर्शन, पूंजी आवंटन के तरीके और टाटा संस के लिस्टिंग न होने जैसे गंभीर मुद्दों पर सवाल खड़े किए।

छह महीने तक इन आंतरिक मतभेदों का कोई समाधान नहीं निकल सका। आखिरकार, सर्वसम्मति न बन पाने पर चंद्रशेखरन ने बुधवार को बयान जारी कर साफ कर दिया कि वे कार्यकाल खत्म होने पर पुनः नियुक्ति नहीं मांगेंगे। उनका इस्तीफा रतन टाटा के बाद बदलती नेतृत्व व्यवस्था का सीधा परिणाम है।

नए निवेश और लिस्टिंग के मुद्दे पर ठनी रार

टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के बीच विवाद केवल वर्चस्व का नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से समूह की कारोबारी रणनीतियों और भविष्य की दिशा से जुड़ा था। नोएल टाटा की मुख्य चिंताएं नए कारोबार में हो रहे भारी घाटे और टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग को लेकर थीं।

टाटा स्टील कारपोरेट कम्युनिकेशंस के पूर्व हेड प्रभात शर्मा ने बताया कि नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के सामने सबसे बड़ी शर्त यह रखी थी कि टाटा संस को शेयर बाजार में कभी लिस्ट नहीं किया जाएगा।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नियमों के तहत अपर लेयर एनबीएफसी होने के कारण टाटा संस को एक तय समयसीमा के भीतर लिस्ट होना अनिवार्य है, लेकिन ट्रस्ट्स इसके सख्त खिलाफ था। नोएल चाहते थे कि इसके लिए लिखित आश्वासन दिया जाए।

चंद्रशेखरन इस तरह की स्थायी प्रतिबद्धता देने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे इसे व्यावहारिक नहीं मानते थे। इसके अलावा, चंद्रशेखरन ने एयर इंडिया, टाटा डिजिटल, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी निर्माण जैसे नए क्षेत्रों में भारी निवेश किया था।

इन व्यवसायों में लगातार नुकसान हो रहा था और बड़ी पूंजी फंस रही थी। नोएल टाटा ने कर्ज न बढ़ाने और सख्त पूंजी अनुशासन बनाए रखने की शर्त रखी थी। वे चाहते थे कि समूह त्वरित लाभ और पूंजी संरक्षण पर ध्यान दे, जबकि चंद्रशेखरन लंबे समय के भारी निवेश को समूह के भविष्य और तकनीक में दबदबे के लिए अनिवार्य मानते थे।

उन्होंने बताया कि एक अन्य बड़ा विवाद शापूरजी पल्लोनजी (एसपी) समूह के टाटा संस से बाहर निकलने की प्रक्रिया को लेकर था। नोएल टाटा इस मुद्दे पर पूरी स्पष्टता चाहते थे।

दोनों दिग्गजों के बीच छह महीने तक इन मुद्दों पर गहन मंथन हुआ, लेकिन वैचारिक और रणनीतिक खाई इतनी चौड़ी हो चुकी थी कि कोई समाधान नहीं निकल सका। आखिरकार, चंद्रशेखरन ने अपनी आक्रामक निवेश रणनीति से समझौता करने के बजाय पद छोड़ना बेहतर समझा।

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