यहां उल्लू नहीं, हाथी की पीठ पर विराजती हैं मां लक्ष्मी; फसलों को बचाने के लिए 100 साल पहले शुरू हुई परंपरा
पश्चिम मेदिनीपुर के रामकनाली गांव में हाथियों के हमले से फसलों को बचाने के लिए सौ साल से भी पहले गजलक्ष्मी पूजा की शुरुआत हुई थी।

गजलक्ष्मी। फोटो जागरण
HighLights
हाथियों के उत्पात से फसलों को बचाने की पूजा।
देवी लक्ष्मी हाथी पर विराजती हैं, अनोखी परंपरा।
सौ साल से अधिक पुरानी यह पूजा आज भी कायम।
दुर्गेश चंद्र शुक्ला, खड़गपुर (पश्चिम मेदिनीपुर)। एक तरफ घना जंगल है, तो दूसरी तरफ फसलों के खेत। जब खेत में पके धान की कटाई हो रही होती थी, तो जंगल से हाथियों का झुंड अक्सर हमला कर देता था।
गांव वालों ने खेत में पकी फसलों को उन जंगली हाथियों के उत्पात से बचाने के लिए एक नया तरीका चुना। सौ साल से भी पहले जंगल महल अंतर्गत बांकुड़ा जिले के गंगाजलघाटी में जंगल से घिरे रामकनाली गांव में ' गजलक्ष्मी' पूजा शुरू की गई थी।
यह पूजा इस विश्वास के साथ शुरू की गई थी कि अगर देवी की पूजा हाथी की पीठ पर की जाए, तो हाथियों का झुंड फिर से खेतों में हमला नहीं करेगा। कोजागरी लक्ष्मी पूजा के मौके पर सदियों बाद भी पुरानी परंपरा कायम है। इस गांव में देवी लक्ष्मी का रूप बिल्कुल अलग है।
हाथी की सवारी
आमतौर पर देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू होता है। इस गांव में भले ही पारंपरिक उल्लू मौजूद है, लेकिन मां लक्ष्मी गजराज यानी हाथी की पीठ पर विराजती हैं। गांव निवासी दिलीप शीट कहते है कि इलाके के लोगों की मुख्य रोजी-रोटी खेती है।
खासकर धान पकने के मौसम में इलाके में हाथियों का उत्पात बहुत बढ़ जाता था। इसीलिए फसलों को हाथियों के गुस्से से बचाने के लिए हाथी को देवी का वाहन चुना गया।
स्थानीय निवासी शिउली शीट के मुताबिक इस पूजा का मुख्य मकसद जंगली हाथियों से फसलों की रक्षा करना था। इसी मान्यता पर भरोसा करते हुए यह पूजा पीढ़ियों से उसी श्रद्धा के साथ मनाई जाती आ रही है।
इस गांव में नहीं होती है दुर्गा पूजा
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस गांव में कभी दुर्गा पूजा आयोजित नहीं की जाती है। यहां की सारी खुशी और उत्साह कोजागरी की गज लक्ष्मी पूजा के इर्द-गिर्द घूमता है, न कि आश्विन के शरदोत्सव के इर्द-गिर्द।
रामकनाली के लोग इस खास दिन का पूरे साल चातक की तरह इंतजार करते हैं। बच्चे और बूढ़े त्योहार की खुशी में एक हो जाते हैं। पूजा खत्म होने के बाद विसर्जन के दिन इलाके की महिलाएं उत्साह के साथ सिंदूर-खेला की रस्म पूरी करती हैं।
लोक मान्यताएं और खेती-बाड़ी करने वाले लोगों के जीने का संघर्ष एक साथ हैं और आज भी इस गज लक्ष्मी वंदना में जिंदा हैं।
यह भी पढ़ें- कुड़मी समाज को ST दर्जे के विरोध में 2 नवंबर को पुरुलिया में महाजुटान, 20 आदिवासी संगठन होंगे शामिल
