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    Biodiversity day: खतरे में जमशेदपुर की जीवनरेखा; स्वर्णरेखा और खरकाई नदी में बढ़ा प्रदूषण, घटने लगा ऑक्सीजन लेवल

    Updated: Thu, 21 May 2026 09:51 PM (IST)

    जमशेदपुर की स्वर्णरेखा और खरकाई नदियाँ गंभीर प्रदूषण से जूझ रही हैं, जिससे उनका पारिस्थितिक तंत्र और जलीय जीवन खतरे में है। विशेषज्ञों ने समय रहते ठोस ...और पढ़ें

    Condition Of Jharkhand Rivers: अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही स्वर्णरेखा और खरकई नदी।

    Condition Of Jharkhand Rivers: अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही स्वर्णरेखा और खरकई नदी।

    HighLights

    1. सीवेज और औद्योगिक कचरा पानी को जहरीला बना रहा है।

    2. जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों का अस्तित्व खतरे में।

    जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। लौहनगरी की जीवनरेखा मानी जाने वाली स्वर्णरेखा और खरकाई नदियां आज अपने सबसे गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर पर्यावरण विशेषज्ञों और जैव वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है।
     
    इनका कहना है कि यदि समय रहते इन नदियों को बचाने के लिए कड़े और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में इनका पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) पूरी तरह नष्ट हो सकता है। Condition Of Jharkhand Rivers
     

    सीवेज और इंडस्ट्रियल वेस्ट ने पानी को बनाया विषैला 

    जैव विज्ञानी सह पर्यावरणविद प्रसेन्नजीत सरकार के अनुसार, गर्मी के मौसम में बढ़ता तापमान और नदियों में घटता जल प्रवाह पानी की गुणवत्ता को तेजी से खराब कर रहा है। एक समय में जो नदियां अनगिनत प्रजातियों की मछलियों, घोंघों, सीपों, उभयचरों और सरीसृपों के लिए जीवनदायिनी हुआ करती थीं। 
     
    वे आज प्रदूषण की मार झेल रही हैं। आदित्यपुर और जमशेदपुर शहरी क्षेत्र से निकलने वाला अनट्रीटेड घरेलू सीवेज (नालों का गंदा पानी) और औद्योगिक अपशिष्ट (इंडस्ट्रियल वेस्ट) सीधे इन नदियों में मिलकर इसके पानी को जहरीला बना रहा है।  
     

    जानें क्या होता है पानी कम होने से  

    गर्मियों में जब नदियों का जलस्तर प्राकृतिक रूप से कम होता है, तो पानी में मौजूद प्रदूषकों का गाढ़ापन (Concentration) अत्यधिक बढ़ जाता है। इस कारण पानी में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर तेजी से नीचे गिरने लगता है, जिससे मछलियां और अन्य जलीय जीव घुट-घुट कर मरने लगते हैं। 
     

    बायो-इंडिकेटर दे रहे हैं खतरे का संकेत, पनप रहा है 'एल्गी ब्लूम' 

    विशेषज्ञ प्रसेन्नजीत सरकार ने बताया कि नदी के कई हिस्सों में अब संवेदनशील और अच्छे जलीय जीवों की जगह ट्यूबिफिसिड्स और चिरोनोमस जैसे कीड़ों के लार्वा पाए जा रहे हैं। विज्ञान की भाषा में इन्हें प्रदूषण का बायो-इंडिकेटर माना जाता है। 
     
    इनका पाया जाना इस बात का सीधा प्रमाण है कि पानी में ऑक्सीजन की भारी कमी हो चुकी है और पानी अत्यधिक प्रदूषित है। इसके अलावा, भीषण गर्मी में खरकाई नदी के ऊपर हरे रंग की काई की एक मोटी परत साफ देखी जा सकती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'एल्गीब्लूम'(AlgaeBloom) कहा जाता है। 
     
    यह परत इतनी घनी होती है कि सूर्य की रोशनी पानी के भीतर तक नहीं पहुंच पाती। रोशनी न मिलने से जलीय पौधों का प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) रुक जाता है, जिससे पानी अंदर ही अंदर सड़ने लगता है और चारों तरफ दुर्गंध फैल जाती है।
     

    संकट में प्रवासी और स्थानीय पक्षियों का आशियाना 

    स्वर्णरेखा और खरकाई नदियां केवल इंसानों और जलीय जीवों के लिए ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ स्थानीय और विदेशी प्रवासी पक्षियों का भी प्रमुख आश्रय स्थल रही हैं। हर साल सर्दियों के मौसम में दूर देशों से आने वाले शीतकालीन प्रवासी पक्षी यहाँ डेरा जमाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: 

    •     यूरेशियन हूपो (Eurasian Hoopoe)
    •     सिट्रिन वैगटेल (Citrine Wagtail)
    •     ब्लू थ्रोट (Blue Throat)
    •     रड्डी शेल्डक (Ruddy Shelduck)

     

    इनके अलावा, 'रेड नेप्ड आइबिस' जैसे स्थानीय पक्षी भी इसी नदी तंत्र पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नदियों में जल प्रवाह बनाए रखने और प्रदूषण रोकने के प्रयास नहीं हुए, तो जल्द ही इन खूबसूरत पक्षियों की चहचहाहट जमशेदपुर के नदी तटों से हमेशा के लिए गायब हो जाएगी।
     

    जैव विविधता संरक्षण को लेकर सरकार सक्रिय 

    दूसरी ओर, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच सरकारी स्तर पर भी कोशिशें तेज की जा रही हैं। झारखंड जैव विविधता पर्षद के चेयरमैन विश्वनाथ शाह ने बताया कि राज्य में वन संरक्षण, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और जल स्रोतों के संवर्धन के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं चलाई जा रही हैं। 

     

    सरकार द्वारा उठाए जा रहे कुछ प्रमुख कदम: 

    •     कैनरी पहाड़ बना पहला हेरिटेज साइट: हजारीबाग के प्रसिद्ध कैनरी पहाड़ को झारखंड का पहला 'जैव विविधता विरासत स्थल' (Biodiversity Heritage Site) घोषित किया गया है। 
    •     जागरूकता अभियान: विभिन्न पंचायतों, विद्यालयों और पर्यावरण संस्थानों के माध्यम से लुप्तप्राय पौधों के रोपण और उनके संरक्षण को लेकर सघन जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।


    पर्यावरणविदों का मानना है कि सरकारी योजनाओं के साथ-साथ जब तक जमशेदपुर के नागरिक और स्थानीय उद्योग नदियों को स्वच्छ रखने में अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक स्वर्णरेखा और खरकाई को इस महासंकट से निकालना नामुमकिन होगा।