मनोज सिंह, जमशेदपुर । झारखंड के जंगलों में प्रचुर मात्रा में मिलने वाले महुआ के फूल अब केवल पारंपरिक पहचान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक समृद्धि और स्वावलंबन का एक नया आधार बनने जा रहे हैं।
इसी कड़ी में जमशेदपुर के प्रसिद्ध दलमा वन्यजीव अभयारण्य में जल्द ही 'महुआ कैफे' खोलने की पुख्ता तैयारी की जा रही है।
इस अभिनव पहल का मुख्य उद्देश्य वन संपदा का बेहतर और वैज्ञानिक उपयोग करने के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं और युवतियों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जोड़ना है।
राज्य का वन विभाग चरणबद्ध तरीके से झारखंड के सभी 11 वन्यजीव अभयारण्यों में महुआ कैफे खोलने की महत्वाकांक्षी योजना पर तेजी से काम कर रहा है।
झारखंड के मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी), रांची, एसआर नटेस ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य के जंगलों में महुआ के विशाल पेड़ बहुतायत में मौजूद हैं।
हर साल यहां महुआ का बंपर उत्पादन होता है, लेकिन जागरूकता और संसाधनों के अभाव में इसका व्यावसायिक उपयोग अब तक काफी सीमित रहा है।
इसी कमी को दूर करने के लिए वन विभाग ने महुआ को ग्रामीण रोजगार और स्वरोजगार का एक सशक्त माध्यम बनाने का बीड़ा उठाया है।
बेतला की सफलता के बाद अब दलमा की बारी
मुख्य वन संरक्षक ने बताया कि इस अनूठी पहल की सफल शुरुआत बेतला स्थित पलामू टाइगर रिजर्व से हो चुकी है। वहां स्थानीय युवतियों और महिलाओं को महुआ से स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद तैयार करने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
प्रशिक्षण के उपरांत वन विभाग द्वारा उन्हें आकर्षक बांस से बने कैफे (स्टॉल) उपलब्ध कराए गए हैं। वर्तमान में वहां महिलाओं के स्व-सहायता समूह इन कैफे के माध्यम से अपने उत्पाद बेचकर रोजाना चार हजार रुपये से अधिक की शानदार कमाई कर रहे हैं।
बेतला की इस शानदार सफलता से मिले अनुभव को आधार बनाते हुए अब दलमा समेत राज्य के अन्य सभी अभयारण्यों में भी इसी मॉडल को धरातल पर उतारने की तैयारी है।
कैफे में पर्यटकों को मिलेगा पारंपरिक और आधुनिक स्वाद का मेल
इन महुआ कैफे में पर्यटकों को पारंपरिक स्वाद के साथ-साथ कई आधुनिक और नए खाद्य उत्पाद भी चखने को मिलेंगे।
कैफे के मेनू में मुख्य रूप से महुआ के लड्डू, टॉफी, हलवा, महुआ की कुकीज, बिस्कुट, केक, महुआ की स्पेशल चाय, मीठा सिरप, ताजगी भरा शरबत, महुआ का जैम, एनर्जी पाचक और पौष्टिक रागी-महुआ की रोटी शामिल होगी।
वन विभाग का मानना है कि इन विविध उत्पादों के जरिए महुआ को पारंपरिक वन उपज की श्रेणी से बाहर निकाल कर मुख्यधारा के कमर्शियल बाजार में एक नई पहचान दिलाई जा सकेगी।
रोजगार के नए अवसरों का होगा सृजन
महुआ कैफे के खुलने से स्थानीय स्तर पर आजीविका के नए द्वार खुलेंगे। महिलाओं को महुआ संग्रहण से लेकर उत्पाद तैयार करने, उनकी आधुनिक पैकेजिंग करने और बिक्री के कार्यों से जोड़ा जाएगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
इन 11 अभयारण्यों में स्थापित होंगे महुआ कैफे
- दलमा वन्यजीव अभयारण्य (जमशेदपुर)
- हजारीबाग वन्यजीव अभयारण्य (हजारीबाग)
- कोडरमा वन्यजीव अभयारण्य (कोडरमा)
- लावालौंग वन्यजीव अभयारण्य (चतरा)
- महुआडांड़ भेड़िया अभयारण्य (लातेहार)
- पलामू वन्यजीव अभयारण्य (पलामू क्षेत्र)
- पालकोट वन्यजीव अभयारण्य (गुमला)
- पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य (गिरिडीह)
- टोपचांची वन्यजीव अभयारण्य (धनबाद)
- उधवा झील पक्षी अभयारण्य (साहिबगंज)
- गौतम बुद्ध वन्यजीव अभयारण्य (कोडरमा-गया क्षेत्र)