Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    कोडरमा के युवा वैज्ञानिक का कमाल: अब दिमाग से चलेगी व्हीलचेयर, काया-न्यूरोसिंक से दिव्यांगों को मिली नई उम्मीद

    Updated: Sat, 09 May 2026 04:02 PM (GMT+05:30)

    कोडरमा के युवा वैज्ञानिक कुणाल अम्बष्ट ने "काया-न्यूरोसिंक" नामक एक अभिनव उपकरण विकसित किया है, जो सामान्य व्हीलचेयर को मस्तिष्क और आंखों की गतिविधियो ...और पढ़ें

    कुणाल अम्बष्ट 16 राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित। फोटो जागरण

    कुणाल अम्बष्ट 16 राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित। फोटो जागरण

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें
    संवाद सहयोगी, कोडरमा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच कोडरमा के झुमरीतिलैया के युवा वैज्ञानिक कुणाल अम्बष्ट ने ऐसा अभिनव उपकरण विकसित किया है, जो शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए नई उम्मीद बन सकता है।

    कुणाल द्वारा तैयार किया गया “काया-न्यूरोसिंक” सामान्य व्हीलचेयर को स्मार्ट व्हीलचेयर में बदल देगा, जिसे इंसानी मस्तिष्क और आंखों की गतिविधियों से संचालित किया जा सकेगा।

    गत मार्च महीने में नई दिल्ली में आयोजित एआई इंपैक्ट समिट में जहां दुनिया भर के विशेषज्ञ एआई के प्रभाव और चुनौतियों पर चर्चा कर रहे थे, वहीं कोडरमा के इस युवा वैज्ञानिक का नवाचार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहा है।

    AI और HI का संगम 

    कुणाल के “काया-न्यूरोसिंक” को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित स्वदेशी उद्यमी एवं इनोवेटर्स महोत्सव में देशभर से चयनित 16 राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    सम्मेलन में इसका प्रदर्शन किया गया था। यह उपलब्धि न केवल कुणाल, बल्कि पूरे झारखंड और कोडरमा जिले के लिए गर्व की बात मानी जा रही है।कुणाल अम्बष्ट ने बताया कि “काया-न्यूरोसिंक” मानवीय इंटेलिजेंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मिश्रण है, जिसमें एआई केवल सहायक की भूमिका निभाएगा।

    कुणाल ने बताया कि यह उपकरण शरीर के बायो-पोटेंशियल सिग्नल्स, जैसे मस्तिष्क की तरंगों और आंखों की गतिविधियों को पढ़कर काम करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति बिना बोले और बिना किसी शारीरिक स्पर्श के व्हीलचेयर, रोबोटिक आर्म और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नियंत्रित कर सकेगा।

    विदेशों में करोड़ों की कीमत

    उन्होंने बताया कि यह तकनीक विशेष रूप से लकवाग्रस्त और गंभीर रूप से दिव्यांग लोगों के लिए तैयार की गई है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। कुणाल के अनुसार, विदेशों में उपलब्ध ऐसे मेडिकल उपकरणों की कीमत करोड़ों रुपये तक होती है, जबकि उनका यह स्वदेशी नवाचार कम लागत में अत्याधुनिक सुविधा उपलब्ध कराएगा।

    कुणाल ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की नींव नीति आयोग की कम्युनिटी इनोवेटर फेलोशिप के दौरान आईएसएम धनबाद के मार्गदर्शन में रखी गई थी।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारत सरकार युवा वैज्ञानिकों और नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए लगातार सहयोग कर रही है। इसी समर्थन के कारण उन्हें देश-विदेश के वैज्ञानिकों के साथ काम करने का अवसर मिला।