और बताइए, क्या खबर चल रही.. अब लातेहार में नहीं गूंजेगी ये आवाज, अधूरा रह गया सुदिव्य कुमार का टूरिज्म का सपना
झारखंड के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन से बेतला में शोक की लहर है। उनका बेतला को ...और पढ़ें

दैनिक जागरण अखबार के साथ मंत्री सुदिव्य। फोटो जागरण
HighLights
पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का आकस्मिक निधन।
बेतला को इको-टूरिज्म केंद्र बनाने का सपना अधूरा।
स्थानीय लोगों और जंगल से गहरा जुड़ाव था।
जागरण संवाददाता, लातेहार। बेतला की वादियां अब भी वैसी ही हैं साल के घने जंगल, पत्तों से छनकर आती धूप, दूर तक पसरी हरियाली और जंगल की खामोशी। बदल गया है तो बस एक चेहरा। झारखंड सरकार के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू अब बेतला की इन वादियों में लौटकर नहीं आएंगे।
उनके आकस्मिक निधन की खबर ने बेतला के उन लोगों की आंखें नम कर दी हैं, जिनके बीच वे कभी विकास की बातें करते, कभी जंगल बचाने का संदेश देते और कभी स्थानीय लोगों के भविष्य की चिंता करते दिखाई दिए थे।
बेतला से उनका लगाव औपचारिक सरकारी दौरे तक सीमित नहीं था। वर्ष 2025 में भी वे बेतला पहुंचे थे और यहां की प्राकृतिक संपदा तथा पर्यटन की संभावनाओं को करीब से देखा था।
इको-टूरिज्म बनाने का सपना
इसके बाद विश्व बाघ दिवस के अवसर पर बेतला में आयोजित भव्य कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी ने इस रिश्ते को और गहरा कर दिया।
मंच से उन्होंने बेतला को इको-टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनाने का सपना साझा किया था। उनका कहना था कि जंगल और वन्यजीवों की रक्षा के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जाएंगे।
उन्होंने बेतला को केवल जंगल और बाघों की धरती के रूप में नहीं, ग्रामीणों के सपनों और संभावनाओं की धरती के रूप में देखा था। यही वजह थी कि कूजरूम और जयरागी के विस्थापित ग्रामीणों को पोलपोल में बसाने की चर्चा के दौरान भी उनकी चिंता सुविधाओं तक पहुंचाने की थी।
उन्होंने पोलपोल को विकसित गांव बनाने और विस्थापित परिवारों को बेहतर सुविधाएं दिलाने के प्रयास का भरोसा दिया था। उसी कार्यक्रम में स्मार्ट कक्षा, औषधि केंद्र, वन्यप्राणी चिकित्सालय, जैव-बाड़ और घास विकास जैसी योजनाओं का उद्घाटन हुआ था। स्थानीय कलाकारों के गीत-संगीत के बीच जब वन संरक्षण का संदेश गूंजा, तो सोनू उसमें पूरी तरह रमे नजर आए थे।
ग्रामीणों के सम्मान से जानवरों की सुरक्षा
उन्होंने कहा था कि जंगल में रहने वाले लोगों को सम्मान मिलेगा तो जंगल के जानवर भी सुरक्षित रहेंगे। उनकी यह बात आज बेतला की स्मृतियों में सबसे अधिक जीवंत है।
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भी विस्थापित गांव में सड़क के लिए 1.60 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। मनिका विधायक रामचंद्र सिंह ने जंगल और गांवों के बीच विकास की राह खोलने की मांग रखी थी।
उस दिन बेतला में विकास, प्रकृति और जनजीवन को साथ लेकर चलने की तस्वीर खींची गई थी। आज वही तस्वीर एक भावुक स्मृति बन गई है। बेतला ने एक ऐसे अतिथि को खो दिया, जो यहां आया तो था मंत्री बनकर, मगर लौटकर अपनेपन की छाप छोड़ गया।
जंगल की पगडंडियां शायद उनका इंतजार करती रहेंगी और बेतला की हवा हर बार यह याद दिलाएगी कि एक दिन यहां कोई आया था, जिसने इस जंगल को केवल देखा नहीं, इसके भविष्य का सपना भी देखा था।
मंत्री नहीं, आम आदमी की तरह मिलते थे सुदिव्य सोनू
बेतला की वादियों में सुदिव्य कुमार सोनू का आना किसी मंत्री के सरकारी दौरे जैसा नहीं लगता था। उनका अंदाज ऐसा होता था, जैसे कोई अपना लंबे समय बाद मिलने आया हो। पद की गरिमा और प्रोटोकाल अपनी जगह थे, मगर व्यवहार में आत्मीयता सबसे आगे रहती थी।
दैनिक जागरण से उनका खास लगाव भी बेतला की उनकी यात्राओं की यादों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां पहुंचते ही वे दैनिक जागरण के जिला प्रभारी से लेकर स्थानीय संवाद सूत्र और अखबार के वितरक तक से बड़े अपनत्व के साथ मिलते थे।
कुशलक्षेम पूछते, परिवार का हाल जानते और फिर बातचीत का सिलसिला खबरों तक पहुंच जाता था। क्षेत्र में क्या चल रहा है, कौन-सी खबर लोगों के बीच चर्चा का विषय है, कहां कोई समस्या है और किस मुद्दे पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए इन सब पर वे खुलकर चर्चा करते थे।
खबरों को लेकर उनकी दिलचस्पी केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहती थी। वे खबर का आधार, उसका असर और लोगों की प्रतिक्रिया तक जानने की कोशिश करते थे। कई बार बातचीत का अंदाज इतना सहज और चुटीला होता कि गंभीर विषय पर चर्चा के बीच भी माहौल में मुस्कान तैर जाती थी।
वर्ष 2025 में बेतला आने के दौरान भी उनका यही अपनापन देखने को मिला था। इसके बाद पर्यटन मंत्री के रूप में बेतला पहुंचे तो जंगल, पर्यटन और स्थानीय लोगों के भविष्य को लेकर उनके मन में कई सपने थे।
जागरण से साथ आत्मीय नाता
बेतला को इको-टूरिज्म का प्रमुख केंद्र बनाने की बात हो या स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने की चिंता, उनकी बातचीत में बेतला के लिए एक खास जुड़ाव साफ दिखाई देता था।
आज उनके आकस्मिक निधन की खबर के बाद बेतला में उनकी वही आत्मीय मुलाकातें याद की जा रही हैं। जिन लोगों से वे सहजता से पूछते थे और बताइए, क्या खबर चल रही है..?
आज उन्हीं के पास उनके जाने की खबर है। फर्क इतना है कि इस बार सामने बैठकर पूछने वाला वह अपना चेहरा नहीं होगा। बेतला की हरियाली, जंगल की पगडंडियां और दैनिक जागरण के लोगों के साथ उनकी वे आत्मीय मुलाकातें अब स्मृतियों में रहेंगी।
कुछ रिश्ते पद से नहीं, व्यवहार से बनते हैं। सुदिव्य कुमार सोनू ने बेतला में ऐसा ही रिश्ता बनाया था, जिसकी गर्माहट उनके जाने के बाद भी लंबे समय तक महसूस होती रहेगी।
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