फांसी से 19 घंटे पहले लिखा आखिरी खत, मौत का नहीं था कोई डर; आज अपने ही गांव में गुमनाम हैं वीर सेनानी नित्यानंद
पलामू के पाटन प्रखंड के सूठा गांव के स्वतंत्रता सेनानी नित्यानंद स्वामी उर्फ बेनी चौधरी को अंग्रेजों ने 25 मई ...और पढ़ें

नित्यानंद स्वामी की फाइल फोटो। जागरण
HighLights
नित्यानंद स्वामी को अंग्रेजों ने 1934 में बनारस में फांसी दी।
नित्यानंद स्वामी ने अविवाहित रहकर अपना जीवन देश को समर्पित किया।
राजू रंजन सोनी, पाटन (पलामू)। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर जब देश आजादी के नायकों को याद कर रहा है, तब पलामू जिले के पाटन प्रखंड का सूठा गांव अपने एक ऐसे शहीद की कहानी समेटे हुए है, जिनका नाम इतिहास में दर्ज होने के बावजूद अपने ही गांव में धीरे-धीरे गुमनामी के अंधेरे में खोता जा रहा है।
यह गांव स्वतंत्रता सेनानी नित्यानंद स्वामी उर्फ बेनी चौधरी का है, जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने 25 मई 1934 को फांसी पर चढ़ा दिया था। गांव के बुजुर्गों और स्वजनों के अनुसार नित्यानंद स्वामी ने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था।
उन्होंने बनारस और गोरखपुर को अपने संघर्ष का केंद्र बनाया और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कमलापति त्रिपाठी तथा संपूर्णानंद जैसे नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर बनारस के चौका घाट स्थित फांसीघर में मौत की सजा दी।
अविवाहित रहकर देश सेवा को समर्पित किया जीवन
नित्यानंद स्वामी पांच भाइयों में चौथे थे। उन्होंने विवाह नहीं किया और संन्यास का मार्ग अपनाकर खुद को पूरी तरह राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहने के दौरान उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। स्वजनों के अनुसार उनके साथ गांव के सोमेश्वर द्विवेदी और रामाधार द्विवेदी भी आंदोलन से जुड़े थे। बाद में रामाधार गांव लौट आए, जबकि सोमेश्वर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय बने रहे।
फांसी से 19 घंटे पहले लिखा था अंतिम पत्र
फांसी से लगभग 19 घंटे पहले नित्यानंद स्वामी ने गांव के भागेश्वर द्विवेदी और स्वतंत्रता सेनानी नारायण दास के नाम अंतिम पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने लिखा कि फांसी में अब कुछ ही घंटे शेष हैं, लेकिन वे तनिक भी विचलित नहीं हैं।
पत्र में उन्होंने कहा था कि फांसी पर लटकने में कुछ घंटे से रह गए हैं। लेकिन मैं इससे तनिक भी विचलित नहीं हूं। पत्र में उन्होंने सभी सेनानियों को याद किया। साथ ही साथ सभी को नमस्कार, वंदे मातरम से अभिवादन किया था। सोमेश्वर द्विवेदी, रामाधार द्विवेदी के अभिभावक भागेश्वर दिवेदी को लिखा कि अंग्रेजों का कड़ा पहरा है। इसीलिए पत्राचार न करें।
बनारस से शुरू हुआ आजादी का संघर्ष
ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1926 में नित्यानंद स्वामी गांव के साथी सोमेश्वर और रामाधार द्विवेदी के साथ बनारस गए थे। वहां वे राष्ट्रीय आंदोलनों और कांग्रेस के अधिवेशनों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे। बनारस और गोरखपुर क्षेत्र में उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण और आंदोलन का नेतृत्व किया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें बनारस के डिस्ट्रिक्ट चौक स्थित चौका घाट पर फांसी दे दी गई।
गांव ने खुद बनाया शहीद का स्मारक
स्वजनों का कहना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी जिला या प्रखंड प्रशासन की ओर से शहीद नित्यानंद स्वामी की स्मृति में कोई स्मारक या प्रतिमा स्थापित नहीं कराई गई। आखिरकार गांव के लोगों ने स्वयं चंदा एकत्र कर इस वर्ष सूठा गांव में उनकी प्रतिमा स्थापित की, ताकि नई पीढ़ी उनके त्याग और बलिदान से प्रेरणा ले सके।
शहीद की प्रोफाइल

