'संसद में लोगों का उचित प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन जरूरी', जागरण विमर्श में प्रोफेसर धीरेंद्र त्रिपाठी ने रखे विचार
प्रोफेसर धीरेंद्र त्रिपाठी ने जागरण विमर्श में कहा कि संसद में लोगों के उचित प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन आवश्यक है। ...और पढ़ें

HighLights
परिसीमन आयोग संसद में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है।
यह सभी नागरिकों के बराबर प्रतिनिधित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।
प्रोफेसर त्रिपाठी ने 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का समर्थन किया।
संजय कुमार, रांची। लोकतंत्र का मूल आधार परिसीमन आयोग है। संसद में देश की जनता के बराबर प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन जरूरी है। यह लोकसभा और विधानसभाओं में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने और जरूरत के अनुसार उनका पुनर्गठन करने वाला वैधानिक आयोग है। इसका गठन केंद्र सरकार करती है। इनके आदेशों को चुनौती नहीं दी जा सकती है।
इसके अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश वहीं सदस्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं। साथ ही आयोग अपने काम में सहयोगी सदस्यों को भी शामिल करता है। इनमें संबंधित राज्य के लोकसभा और विधानसभा के पांच-पांच सदस्य होते हैं। इन सहयोगी सदस्यों को वोटिंग का अधिकार नहीं होता है।
आयोग का मुख्य काम आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व को व्यवस्थित करना है। रांची विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के सहायक प्रोफेसर धीरेंद्र त्रिपाठी ने यह बातें सोमवार को जागरण विमर्श के दौरान कही ।
कार्यक्रम के दौरान रांची के दैनिक जागरण कार्यालय में अपनी बात रखते हुए धीरेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि संविधान के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाना था, लेकिन 1971 में इसे समाप्त कर 2002 तक के लिए बढ़ा दिया गया। इसके बाद 2002 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया और उसमें राज्यों में ही सीटों का परिसीमन किया गया, सीटों की संख्या नहीं बढाई गई। उस समय अगला परिसीमन 2026 में करने की बात कही गई।
अब सरकार इसे करना चाहती है तो वि्रोध शुरू है। इसका मुख्य कारण दक्षिण व पूर्वोत्तर के राज्यों में जनसंख्या में कमी होना है। उन राज्यों का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने के कारण उनकी लोकसभा में सीटों की संख्या घट जाएगी। त्रिपाठी ने परिसीमन को जरूरी बताते हुए कहा कि संसद में सभी नागरिकों का बराबर का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अभी किसी राज्य का कोई लोकसभा सदस्य 20 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है तो कोई 10 लाख का। लोकसभा का क्षेत्र बड़ा होने के कारण सांसद अपने क्षेत्र के सभी इलाकों में पहुंच भी नहीं पाते हैं। विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार का कहना है कि किसी का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा। इसके साथ ही केंद्र सरकार 2011 की जनगणना के अनुसार परिसीमन कराना चाहती है क्योंकि अभी जनगणना की प्रक्रिया चल ही रही है।
जबकि कुछ लोग वर्तमान जनगणना पर इसे कराना चाहते हैं। ऐसा होने पर 2026 में परिसीमन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 2002 में 1971 की जनगणना के अनुसार परिसीमन हो सकता है तो भी 2011 के अनुसार क्यों नहीं हो सकता। झारखंड में भी कुछ संगठन इसका विरोध इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें भी लगता है कि संसद में उनका प्रतिनिधित्व ही घट नहीं जाए। विरोध अपनी जगह है परंतु परिसीमन जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर यहां के लोगों का बराबर प्रतिनिधित्व संसद में नहीं हो पाएगा।
