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    झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: नौ अपर समाहर्ताओं की प्रोन्नति पर पुनर्विचार करे राज्य सरकार

    Updated: Sat, 02 May 2026 09:51 PM (IST)

    झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नौ अपर समाहर्ताओं को संयुक्त सचिव पद पर प्रोन्नति के मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि ...और पढ़ें

    प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।

    प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।

    HighLights

    1. अदालत ने प्रशासनिक त्रुटियों से मौलिक अधिकारों के हनन को माना।

    2. कनिष्ठों को प्रोन्नति मिलने के बाद वरिष्ठों का मामला सीलबंद लिफाफे में।

    राज्‍य ब्‍यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार को नौ अपर समाहर्ताओं (Additional Collectors) की संयुक्त सचिव के पद पर प्रोन्नति के मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। 
     
    अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पद पर प्रोन्नति के लिए विचार किया जाना अनुच्छेद 14 और 16 के तहत एक संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार की त्रुटि और प्रक्रियात्मक देरी के कारण प्रार्थियों के मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हैं और उनके साथ अन्याय हुआ है।  
     

    क्या है पूरा विवाद?

    ये नौ अधिकारी झारखंड सिविल सेवा परीक्षा 2006 बैच के माध्यम से नियुक्त हुए थे। मामला तब उलझा जब दिसंबर 2023 की विभागीय प्रोन्नति समिति (डीपीसी) में सरकार ने मात्र 14 रिक्तियां दिखाईं, जबकि प्रार्थियों के अनुसार 30 से अधिक पद खाली थे।  

    अदालत ने कहा कि यदि 2023 में ही रिक्तियों का सही आकलन कर डीपीसी की बैठक होती, तो इन अधिकारियों को सीबीआइ चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही प्रोन्नति मिल जाती।  

    सीबीआइ ने 20 अप्रैल 2024 को चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद मार्च 2025 की डीपीसी में इन अधिकारियों का मामला सीलबंद लिफाफे में डाल दिया गया, जबकि उनके कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों को प्रोन्नति दे दी गई।  

    अदालत का कड़ा रुख 

    अदालत ने प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रशासनिक त्रुटियों का खामियाजा अधिकारियों को नहीं भुगतना चाहिए। अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है। 
     
    राज्य सरकार ने इनकी प्रोन्नति पर इसलिए विचार नहीं किया था क्योंकि सीबीआइ चार्जशीट में इन्हें लाभार्थी के रूप में दर्शाया गया है, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को प्रशासनिक देरी की पृष्ठभूमि में खारिज कर दिया और पुनर्विचार का आदेश दिया।  


    हाई कोर्ट के इस निर्णय से राज्य के उन अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है जो लंबे समय से प्रोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे थे और तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से उनके पदोन्नति के अधिकार को रोका गया था।