सिर्फ धक्का-मुक्की दुष्कर्म का प्रयास नहीं, झारखंड हाई कोर्ट ने माना महिला की गरिमा भंग करने का दोषी
Jharkhand High Court ने फैसला सुनाया कि केवल मारपीट या धक्का-मुक्की दुष्कर्म का प्रयास नहीं है, बल्कि इसके लिए आरोपित का स्पष्ट कृत्य होना जरूरी है।

झारखंड उच्च न्यायालय। (फाइल फोटो)
HighLights
केवल धक्का-मुक्की दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं।
दुष्कर्म के प्रयास के लिए स्पष्ट ठोस कृत्य आवश्यक।
आरोपित महिला की गरिमा भंग करने का दोषी पाया गया।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस पीके श्रीवास्तव की अदालत ने दुष्कर्म के प्रयास से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी महिला के साथ केवल मारपीट या धक्का-मुक्की करना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं माना जा सकता। इसके लिए आरोपित की ओर से दुष्कर्म करने की दिशा में कोई स्पष्ट और ठोस कृत्य होना जरूरी है।
एकल पीठ ने शंकर राम के आरोपित की दोषसिद्धि को बदल दिया। अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत दुष्कर्म के प्रयास के बजाय धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने के अपराध का दोषी माना। मामला पलामू के वर्ष 2005 का है।
अभियोजन के अनुसार, महिला खेत में चारा काट रही थी। इसी दौरान आरोपित वहां पहुंचा और उसे जमीन पर गिरा दिया। महिला किसी तरह वहां से भागी, लेकिन आरोपित ने दोबारा उसे पकड़कर धान के खेत में धक्का दे दिया। महिला के शोर मचाने पर आरोपित वहां से भाग गया।
बाद में महिला ने घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी और पंचायत के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। हाई कोर्ट ने मामले के साक्ष्य की समीक्षा करते हुए कहा कि महिला के बयान से आरोपित द्वारा उसे पकड़कर जमीन पर गिराने की बात तो साबित होती है, लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट कृत्य सामने नहीं आया, जिससे यह माना जा सके कि आरोपित ने दुष्कर्म करने का प्रयास किया था।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर आरोपित का कृत्य महिला की गरिमा भंग करने की श्रेणी में आता है। अदालत ने पलामू कोर्ट के दुष्कर्म के प्रयास की सजा को बदलते हुए धारा 354 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी।
