हौसले के आगे हिमालय पस्त: बिना आंख के झारखंड के शेखर ने फतह किया जो-जोंगो चोटी, 16000 फीट बेस कैंप तक पहुंचे धीरोज
पश्चिमी सिंहभूम के दृष्टिबाधित पर्वतारोही शेखर और धीरोज ने लद्दाख में हिमालय की चोटियों को फतह कर असाधारण उपलब्धि हासिल की है।
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शेखर ने जो-जोंगो चोटी पर फहराया तिरंगा। (जागरण)
HighLights
शेखर ने 20,000 फीट से अधिक ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराया।
धीरोज स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद 16,732 फीट बेस कैंप तक पहुंचे।
यह उपलब्धि समावेशन और दृढ़ संकल्प का मजबूत संदेश देती है।
जागरण संवाददाता, रांची। कहते हैं हौसले बुलंद हो तो हर ऊंचाई आसान हो जाती हैं...जब समावेशन के साथ अवसर और दृढ़ संकल्प जुड़ते हैं, तो असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
कुछ इसी तर्ज पर पश्चिमी सिंहभूम के एक दूरदराज गांव से हिमालय की चोटी तक का सफर केवल किलोमीटर और ऊंचाई का सफर नहीं है।
यह उस आत्मविश्वास की कहानी है, जो कदम-दर-कदम बढ़ा, उन अवसरों की कहानी है, जिन्होंने नई राहें खोलीं, उन डर की कहानी है, जिन्हें पीछे छोड़ा गया और उन अनगिनत संभावनाओं की कहानी है, जिन्हें हौसले और सही अवसर ने हकीकत में बदल दिया।
शेखर और धीरोज के लिए दृष्टिबाधित पर्वतारोही बनना कभी सिर्फ पहाड़ की चोटी तक पहुंचने की बात नहीं थी। यह साबित करने का सफर था कि परिस्थितियां, भौगोलिक सीमाएं या लोगों की सोच किसी व्यक्ति की क्षमता तय नहीं कर सकती।
उनकी उपलब्धि पूरे देश के समुदायों के लिए एक मजबूत संदेश है, जब समावेशन के साथ अवसर और दृढ़ संकल्प जुड़ते हैं, तो असाधारण उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।
जहां बुनियादी सुविधाओं और आने-जाने में मदद करने वाले साधनों तक पहुंच भी एक चुनौती थी, वहीं से लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों तक का उनका सफर पहुंचा।
शेखर ने समुद्र तल से 20,000 फीट से अधिक ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराया जबकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद धीरोज 16,732 फीट की ऊंचाई तक स्थित बेस कैंप तक पहुंचे।
उन्होंने साबित कर दिया कि बड़ी से बड़ी यात्रा भी आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए एक छोटे से कदम से शुरू होती है। उन्होंने 25 अगस्त को अपना सफर शुरू किया और 31 अगस्त को इसे पूरा किया।
इस सफर में इन दोनों दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों ने न केवल परिस्थितियों और लोगों की सोच से बनी सीमाओं को चुनौती दी, बल्कि यह भी दिखाया कि इंसान की क्षमता की कोई तय सीमा नहीं होती।
पहाड़ों पर चढ़ाई के लिए अनुशासन आवश्यक
पहाड़ों पर चढ़ाई के लिए अनुशासन आवश्यक था। हर चढ़ाई, हर ट्रैक और हर मुश्किल आगे आने वाली चुनौती के लिए उनकी तैयारी का हिस्सा बन गया। जब वे आखिरकार लद्दाख पहुंचे, तो उन्हें अपने जीवन की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक का सामना करना पड़ा।

कम आक्सीजन वाली हवा, जमा देने वाली ठंड और ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने हर कदम पर उनकी सहनशक्ति की परीक्षा ली। लेकिन न तो ऊंचाई और न ही मुश्किलें उनके हौसले को रोक सकीं।
वर्षों की मेहनत और हर पड़ाव पर मिले आत्मविश्वास से ताकत लेते हुए, उन्होंने कठिन रास्तों और ऊंचाई वाले चुनौतीपूर्ण हालात में भी आगे बढ़ना जारी रखा।
अभियान आगे बढ़ने के साथ धीरोज की तबीयत बिगड़ने लगी, जिस कारण उन्हें 16,732 फीट की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रुकना पड़ा।
वहीं, शेखर ने पूरे दृढ़ संकल्प के साथ अपनी चढ़ाई जारी रखी और जो-जोंगो चोटी के शिखर तक सफलतापूर्वक पहुंच गए। चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हासिल की गई उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां उनके अद्भुत साहस, हौसले और दृढ़ संकल्प को दर्शाती हैं।
पर्वतारोहण से परे एक बड़ी उपलब्धि
चोटी तक पहुंचना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन उनकी कहानी की असली अहमियत पर्वतारोहण से कहीं आगे है। उनकी असली उपलब्धि उन बाधाओं को पार करने में है, जिन्हें उन्होंने पहाड़ पर कदम रखने से बहुत पहले ही पीछे छोड़ दिया था।
उनके सफर में ब्रेल सीखना, अपने दम पर आना-जाना सीखना, तकनीक का इस्तेमाल करना, ट्रेनर बनना, खेलों में बेहतर प्रदर्शन करना और दूसरों का नेतृत्व करने का आत्मविश्वास हासिल करना शामिल रहा। कई मायनों में, पहाड़ तक पहुंचना उनकी उस लंबी कहानी का सिर्फ आखिरी पड़ाव था, जो इससे बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।
यह सबल की उस सोच को भी दर्शाता है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के समावेशन को अलग-अलग प्रयासों तक सीमित रखने के बजाय ऐसा सामुदायिक तंत्र तैयार करना है, जहां दिव्यांगजन अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें, अवसरों तक पहुंच बना सकें और सम्मान व आत्मनिर्भरता के साथ समाज में पूरी तरह भागीदारी कर सकें।
सबल, दिव्यांगजनों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की दिव्यांगताओं के लिए काम करता है। इसके तहत देशभर में विभिन्न साझेदारियों का एक बढ़ता नेटवर्क तैयार किया गया है।
प्रशिक्षण, जागरूकता, सरकारी सुविधाओं और अधिकारों तक पहुंच तथा क्षमता विकास के माध्यम से यह नेटवर्क दिव्यांगजनों के समावेशन को मजबूत करने का काम करता है।
