35% प्रोटीन, ओमेगा-3 से भरपूर: देसी मांगुर को झारखंड में राजकीय दर्जा, पांच मछलियों में टक्कर
Jharkhand सरकार ने देसी मांगुर को राजकीय मछली घोषित किया है, जो विलुप्त होने की कगार पर है। मत्स्य विभाग इसके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए हैचरी निर्मा ...और पढ़ें

झारखंड की राजकीय मछली देसी मांगुर का संरक्षण।
HighLights
पोषक तत्वों से भरपूर, विलुप्त होने की ओर कई मछली।
मछलियों की जैव विविधता पर राष्ट्रीय टीम का अध्ययन।
मनोज सिंह, रांची। राज्य सरकार ने देसी मांगुर को राजकीय मछली घोषित किया है। अब मत्स्य विभाग की ओर से इसके संरक्षण और संवर्द्धन का प्रयास किया जा रहा है।
पोषक तत्व से भरपूर देसी मांगुर मछली विलुप्त होने की कगार पर है। ऐसे में राज्य सरकार ने इसे राजकीय मछली घोषित कर संरक्षण करने की योजनाएं बनाई है।
पड़ोसी राज्य बिहार सहित देश के 21 राज्य और दो केंद्रीय शासित प्रदेश पहले ही इसे राजकीय मछली घोषित कर चुके हैं। मत्स्य निदेशक अमरेंद्र कुमार ने बताया कि देसी मांगुर राज्य में प्राकृतिक रूप से पाया जाता था।
राज्य के गुमला के पालकोट में भरपूर मात्रा में पाई जाती थी। लेकिन अब खेतों में रासायनिक खाद के प्रयोग बढ़ने और तालाबों में प्रदूषण से इनकी ब्रीडिंग नहीं हो पा रही है।
गुमला के अलावा सिमडेगा, साहिबगंज और लातेहार में देसी मांगुर पाई जाती थी। अब इनकी ब्रीडिंग और पालन के लिए किसानों को ट्रेनिंग देने की योजना बनाई जा रही है। साथ ही हैचरी भी बनाया जाना है।
पांच मछलियों पर हुई थी चर्चा, देसी मांगुर की जीत
राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ ने राज्य सरकार को राजकीय मछली घोषित करने के लिए पत्र भेजा था। उसमें कहा गया था कि कई राज्यों ने अपनी राजकीय मछली घोषित कर दी है। ऐसे में सरकार को भी ऐसा करना चाहिए।
इसके बाद बाद मत्स्य विभाग की एक कमेटी बनाई गई, जिसने कतला, बाटा रोहू, गैंचा, गेतू और देसी मांगुर पर चर्चा की। देसी मांगुर के पोषक तत्व और बाजार में मांग को देखते हुए इसे राजकीय मछली घोषित करने की अनुशंसा की गई।
फिर कैबिनेट ने नवंबर में इसे राजकीय मछली घोषित कर दिया। देसी मांगुर में 35 प्रतिशत प्रोटिन और वसा बहुत कम और आयरन व अन्य खनिज अच्छी मात्रा में होते हैं।
इसमें मौजूद ओमेगा-3 फैटी एसिड कैंसर से बचाव और हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। यह एनीमिया (खून की कमी) को दूर करने में तथा बुजुर्गों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
देश में मछली की 20 हजार प्रजातियां
देश में मछली की करीब 20 हजार प्रजातियां हैं, जिसमें से 250 प्रजातियों का प्रजनन कर बीज उत्पादन किया जाता है। इसमें रंगीन मछली के अलावे खाने की भी मछलियां हैं।
देसी मांगुर राज्य के डोभा और धान के खेत में प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं, जहां ब्रीडिंग भी करती हैं। एक मछली में करीब एक लाख अंडे होते हैं। प्राकृतिक रूप से 75 प्रतिशत बच्चों के बचने की संभावना है, लेकिन कृत्रिम रूप से ब्रीडिंग में यह दर घटकर 35 से 45 प्रतिशत हो जाती है।
इसके जैसे दिखने वाली थाई मांगुर के पालन पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसका मुख्य कारण उसका ज्यादा मांसाहारी होना है। यह मछली कुछ भी खा सकती है।
झारखंड की मछलियों की जैव विविधता पर अध्ययन
राष्ट्रीय मात्सिकी आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ की एक टीम ने 16 से 27 जनवरी तक झारखंड का दौरा कर प्राकृतिक रूप से उपलब्ध मछलियों का एक डाटा बैंक तथा उसके जर्म प्लाज्मा को संरक्षित करने के उद्देश्य से अध्ययन किया।
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टीम का नेतृत्व डॉ. डायमंड राजकुमार तेनाली और शुभ्रा सिंह ने किया। इस कार्य का मुख्य उद्देश्य स्थानीय रूप से पाई जा रही मछलियों का अध्ययन करना, उनका आनुवंशिक रूप से जांच करना, मछलियों की उपलब्धता को सुनिश्चित करना था।
प्रारंभिक जांच में इस टीम ने रांची जिले के दशम फाल, जोन्हा फाल, हुंडरू फाल खूंटी जिले के पंचघाघ झरने के उपरी तथा निचले क्षेत्रों का भ्रमण किया और मछलियों की प्राकृतिक आवास में सैंपलिंग किया गया।
इनमें प्रमुख रूप से लोच (गैंची), टेंगरा, गारा, डेनियो, गिलिप्टोथोरैक्स, बरेलियस, रसवोरा, मांगुर, एम्लिसेप्स, छोटे झींगे तथा कुछ केकड़े पाए गए।
आने वाले समय में वर्ष में तीन बार अलग-अलग ॠतुओं में सर्वे कर सैंपल इकठ्ठा किया जाएगा तथा उनकी आनुवंशिक जांच की जाएगी ताकि झारखंड में मछलियों की जैव विविधता का आंकड़ा उपलब्ध हो सके।