झारखंड की राजनीति के संत थे माधवलाल सिंह, गरीबों को देने के लिए मांगते थे दवाएं
गोमिया के पूर्व विधायक माधवलाल सिंह का निधन हो गया है। वे झारखंड की राजनीति में अपनी संत प्रवृत्ति, सादगी और गरीबों के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते थ ...और पढ़ें
-1778747582913_m.webp)
पूर्व विधायक माधवलाल सिंह। (जागरण)
HighLights
गोमिया के पूर्व विधायक माधवलाल सिंह का निधन।
गरीबों के लिए दवाइयां मांगते थे, नहीं निजी लाभ।
झारखंड की राजनीति में संत प्रवृत्ति वाले नेता।
प्रदीप सिंह, रांची। बुधवार की दोपहर जैसे ही गोमिया के पूर्व विधायक माधवलाल सिंह के निधन की खबर मिली, दिल-दिमाग में उनकी स्मृतियां उभरने लगी।
याद आया, एक इंजीनियर का उन्हें लेकर बताया गया स्वयं का अनुभव, जो वर्षों पहले उन्होंने मुझे बताया था। एक ऐसा किस्सा, जो आज की राजनीतिक शोरगुल और बनावटी अपनेपन में किसी लोककथा के जैसा लगता है।
वह बता रहे थे - मैं हैरान था कि आखिर यह कैसा नेता है। मैंने सोचा था कि पोस्टिंग के लिए फोन करने के बदले कुछ मांगेंगे। लेकिन उन्होंने जेब से एक लंबा सा पुर्जा निकाला। उसमें सर्दी, खांसी और बुखार समेत साधारण बीमारियों की दवाइयों के नाम लिखे थे। बोले, इंजीनियर साहब अगर कुछ करना ही चाहते हो तो ये दवाइयां ला दो।
गांव के गरीबों के काम आ जाएंगी। बकौल इंजीनियर, मैं स्तब्ध रह गया। जितनी दवाओं के नाम पुर्जे पर लिखे थे, उससे दोगुनी मात्रा में खरीदकर उनके पास पहुंचाईं।
राजनीतिक छलकपट से दूर
माधव बाबू ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। दरअसल, यही माधव बाबू की सबसे बड़ी पहचान थी। वे राजनीति में थे, लेकिन राजनीति छलकपट उनके भीतर नहीं थी। चार बार गोमिया से विधायक बनने वाले इस नेता की छवि सत्ता के गलियारों में एक संत प्रवृत्ति वाले जनप्रतिनिधि की रही।
झक सफेद कुर्ता-पैंट, माथे पर बड़ा सा लाल गोल टीका और चेहरे पर स्थायी शांति। वे माता के भक्त थे और भीड़ में अलग दिखाई देते थे।
शब्दों में शोर नहीं, बातें वजनदारविधानसभा की कार्यवाही के दौरान वे कम बोलते, मगर जब बोलते तो अपने क्षेत्र की पीड़ा लेकर तनकर खड़े होते। क्षेत्र की सड़कें, विस्थापन, सिंचाई, मंदिरों की व्यवस्था या गरीबों की दिक्कत, उनके सवालों में जमीन की सुगंध होती थी।
उनमें आरोपों की तीखी राजनीति नहीं थी, बल्कि समाधान की बेचैनी थी। झारखंड राज्य धार्मिक न्यास परिषद के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को व्यवस्थित करने की कोशिश की।
वे मानते थे कि धार्मिक संस्थाएं केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम भी बन सकती हैं। शायद यही वजह थी कि उनके पास आने वाला हर व्यक्ति सिर्फ मतदाता नहीं, बल्कि एक जरूरतमंद इंसान होता था।
खबरें और भी
पुरानी विधानसभा के गलियारों में उनसे मुलाकात अक्सर सहज होती थी। पत्रकारों को देखते ही हालचाल पूछना, ठहरकर बातचीत करना और फिर किसी राजनीतिक मुद्दे पर अपनी साफ राय रखना उनका स्वभाव था। वे कटु आलोचना भी बिना कड़वाहट के करते थे। उनके शब्दों में शोर नहीं होता था, लेकिन वजन जरूर होता था।
कम नहीं हुई सक्रियता
पिछले दो चुनावों से वे सक्रिय राजनीति की मुख्यधारा से लगभग दूर हो गए थे। स्वास्थ्य लगातार कमजोर पड़ रहा था। सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी कम होने लगी थी, लेकिन गोमिया से उनका रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा।
क्षेत्र के लोग बताते हैं कि तबीयत खराब रहने के बावजूद वे लोगों की समस्याएं सुनते थे। किसी के इलाज की चिंता, किसी गरीब परिवार की मदद या किसी छात्र की पढ़ाई, छोटी-छोटी बातों में उनकी दिलचस्पी बनी रही।
कुछ महीने पहले उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ने की खबर आई थी। तब भी लोगों को भरोसा था कि माधव बाबू फिर लौट आएंगे। शायद इसलिए क्योंकि ऐसे लोग राजनीति में कम और समाज की स्मृतियों में ज्यादा जीवित रहते हैं। लेकिन बुधवार की सुबह वह भरोसा टूट गया।
उनके जाने के साथ झारखंड की राजनीति का एक शांत अध्याय भी जैसे बंद हो गया है। आज जब राजनीति पर अविश्वास की धूल लगातार गहराती जा रही है, तब माधव बाबू जैसे लोग याद दिलाते हैं कि सार्वजनिक जीवन की असली ताकत पद या प्रचार नहीं, बल्कि संवेदना होती है।
शायद इसी कारण उनका जाना सिर्फ एक पूर्व विधायक का निधन नहीं, बल्कि राजनीति में बची-खुची सादगी के एक चमकदार चेहरे का खो जाना है।