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'आत्महत्या का विचार आ रहा है, क्या करें?' रांची के रिनपास हेल्पलाइन पर सालभर में आए 950 मदद के कॉल

Published: Wed, 09 Sep 2026 02:44 PM (IST)

रिनपास की प्रोजेक्ट तरंग हेल्पलाइन पर एक साल में मानसिक तनाव और आत्महत्या के विचारों से जूझ रहे 950 लोगों ...और पढ़ें

रिनपास की फाइल फोटो। जागरण

रिनपास की फाइल फोटो। जागरण

HighLights

  1. रिनपास हेल्पलाइन पर एक साल में 950 मानसिक स्वास्थ्य कॉल।

  2. झारखंड में 2022 में 2,181 आत्महत्याएं, प्रतिदिन 6 मौतें।

अनुज तिवारी, रांची। आत्महत्या का विचार आ रहा है, क्या करें हम..., गलती से ज्यादा दवा खा ली है, अब समझ नहीं आ रहा क्या करें..., बहुत तनाव में हूं, किसी से बात नहीं कर पा रहा। ये केवल फोन पर पूछे गए सवाल नहीं हैं, बल्कि उन लोगों की मदद की पुकार हैं जो किसी न किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहे हैं।

रिनपास में स्ट्रेस मैनेजमेंट के तहत संचालित प्रोजेक्ट तरंग की हेल्पलाइन पर पिछले एक वर्ष में करीब 950 काल ऐसे लोगों की पहुंची हैं, जिन्होंने मानसिक तनाव या स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी में मदद मांगी। प्रोजेक्ट तरंग के प्रभारी मनोवैज्ञानिक राहुल शर्मा के अनुसार, हेल्पलाइन पर हर माह कई तरह की समस्याओं को लेकर फोन आते हैं। इनमें मानसिक तनाव और डिस्ट्रेस से जुड़े काल सबसे अधिक होते हैं।

कुछ लोग दवा अधिक खा लेने के बाद घबराकर संपर्क करते हैं तो कुछ आत्महत्या का विचार आने पर पूछते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। मारपीट या पारिवारिक विवाद के बाद समाधान तलाशने के लिए भी लोग फोन करते हैं। हर माह करीब दो-तीन काल ऐसे होते हैं, जिनमें व्यक्ति सीधे आत्महत्या के विचार की बात करता है।

नशे से लेकर बच्चों के व्यवहार तक की चिंता

हेल्पलाइन पर केवल गंभीर मानसिक संकट से जूझ रहे लोग ही संपर्क नहीं करते। कई लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं और इलाज की जानकारी लेते हैं। नशे की लत से परेशान लोग और उनके परिजन मदद मांगते हैं।

अवसाद को लेकर भी बड़ी संख्या में सवाल आते हैं। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में मन नहीं लगना या अन्य व्यवहार संबंधी समस्याओं को लेकर अभिभावक भी फोन कर सलाह लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक राहुल शर्मा के अनुसार, ऐसे मामलों में समय पर बातचीत और सही मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार आना एक गंभीर संकेत है। ऐसे व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी बात सुनना, उसे भावनात्मक सहयोग देना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ तक पहुंचाना जरूरी है।

परिवार को पहचानने होंगे बदलाव के संकेत

रिनपास के पूर्व निदेशक सह वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. अमूल रंजन ने कहा कि आत्महत्या से जुड़े विचारों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। परिवार की भूमिका इसमें बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार, बातचीत, नींद, खानपान या सामाजिक गतिविधियों में अचानक बदलाव दिखे तो परिवार के सदस्यों को सतर्क होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सुसाइडल सोच को सही काउंसलिंग और उपचार से कम किया जा सकता है। मानसिक परेशानी को छिपाने या उसे केवल कमजोरी मानने के बजाय विशेषज्ञ से मदद लेना जरूरी है। परिवार को ऐसे व्यक्ति के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए और उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क कर उपचार शुरू कराया जाना चाहिए।

पुरुषों में ज्यादा, सामाजिक दबाव भी बड़ी वजह

डॉ. अमूल रंजन के अनुसार, आत्महत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक है। वैवाहिक जीवन में तनाव, प्रेम संबंधी विवाद, रोजगार और सामाजिक दबाव जैसे कारण कई मामलों में सामने आते हैं।

हालांकि किसी एक कारण को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कई सामाजिक, व्यक्तिगत और मानसिक परिस्थितियां मिलकर व्यक्ति को गंभीर संकट की स्थिति में पहुंचा सकती हैं।

वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में 2,181 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2021 में यह संख्या 1,825 थी। यानी एक वर्ष में मामलों में करीब 19.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। राज्य में यह समस्या मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों, रोजगार और सामाजिक सहयोग से भी जुड़ती दिखाई देती है।

हर दिन औसतन छह से सात मौतें 

2,181 मामलों को साल के 365 दिनों के हिसाब से देखें तो झारखंड में औसतन करीब छह आत्महत्याएं प्रतिदिन दर्ज होती हैं। यही आंकड़ा बताता है कि यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का विषय है।

आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के साथ परिवार और समाज के स्तर पर भी सहयोगी वातावरण बनाना जरूरी है। रांची में भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी को लेकर अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों की संख्या चिंता बढ़ाने वाली है।

रिनपास में अवसाद और तनाव से जुड़ी समस्याओं को लेकर हर सप्ताह बड़ी संख्या में नए मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें युवाओं की संख्या उल्लेखनीय है। पढ़ाई, रोजगार, पारिवारिक संबंध और प्रेम संबंध से जुड़ी परेशानियां कई युवाओं के मानसिक तनाव का कारण बन रही हैं।

व्यस्त जिंदगी में रिश्ते हो रहे कमजोर

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक जीवनशैली में लोग काम और व्यक्तिगत दबाव में इतने व्यस्त होते जा रहे हैं कि परिवार के साथ बातचीत और भावनात्मक जुड़ाव कम हो रहा है। कई बार व्यक्ति अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं करता और समस्या भीतर ही भीतर बढ़ती जाती है। ऐसे में परिवार के सदस्यों को केवल उपलब्धियों या व्यवहार पर ध्यान देने के बजाय व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति को भी समझना होगा।

आत्महत्या रोकने में कानून भी इलाज पर देता है जोर

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 115 के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को गंभीर तनाव में माना जाता है और उसे दंडित करने के बजाय देखभाल, उपचार और पुनर्वास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार पर रखी गई है।

कानून का उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराकर दोबारा आत्महत्या के प्रयास का जोखिम कम करना है। इसलिए आत्महत्या के विचार को छिपाने या शर्म की बात मानने के बजाय इसे मदद लेने का संकेत समझना जरूरी है।

मदद के लिए रिनपास हेल्पलाइन

  • 9471136697 (24 घंटे)
  • 18003454060, 1449918003454060 (सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक)

 

किसी व्यक्ति का बार-बार निराशा व्यक्त करना, खुद को बोझ बताना, अचानक लोगों से दूरी बनाना या जीवन को लेकर बेहद नकारात्मक बातें करना गंभीर संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में बहस या डांटने के बजाय शांतिपूर्वक बातचीत करनी चाहिए और विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए। परिवार के सदस्य भी ऐसे व्यक्ति की बात को हल्के में न लें।

-डॉ. अमूल रंजन, वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक, रिनपास