रांची में टीबी इलाज की हकीकत: 12 महीनों में 155 मौतें, सिर्फ 89% मरीज हुए ठीक, कैसे पहचानें बीमारी
Jharkhand रांची जिले में TB उन्मूलन एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पिछले 12 महीनों में 155 मरीजों की मौत हुई और केवल 89% मरीज ही ठीक हो पाए। नामकुम प्रखंड ...और पढ़ें

रांची जिले में टीबी इलाज की सफलता दर 89 प्रतिशत रही।
HighLights
नामकुम प्रखंड में टीबी इलाज की सफलता दर मात्र 71 प्रतिशत है।
पब्लिक हेल्थ में 87 प्रतिशत तो प्राइवेट सेक्टर में 92 प्रतिशत इलाज
जागरण संवाददाता, रांची। राजधानी रांची जिले में राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (टीबी) के तहत किए जा रहे प्रयासों के बावजूद टीबी मरीजों का शत-प्रतिशत इलाज अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
जिला स्वास्थ्य समिति और जिला टीबी केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार बीते 12 महीनों में जिले में टीबी से पीड़ित मरीजों में से केवल 89 प्रतिशत ही पूरी तरह स्वस्थ हो सके, जबकि इलाज के दौरान 155 मरीजों की मौत हो गई। जिले के विभिन्न प्रखंडों में इलाज की सफलता दर में भारी असमानता देखने को मिली है।
नामकुम प्रखंड की स्थिति सबसे खराब पाई गई, जहां टीबी इलाज की सफलता दर महज 71 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार नामकुम में इस समय 752 टीबी मरीज इलाज पर हैं, जिनमें से 639 मरीजों ने इलाज व पोषण सहायता दी गई है, जबकि 46 मरीज इससे दूर हैं।
दूरी रहने से इन मरीजों को पोषण सहायता और नियमित सामाजिक सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जिसका असर इलाज की निरंतरता पर पड़ रहा है। डाक्टरों का कहना है कि केवल दवा से टीबी का उन्मूलन संभव नहीं है।
इलाज के साथ पोषण, नियमित काउंसलिंग और सामाजिक सहयोग बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार इलाज बीच में छोड़ने की प्रवृत्ति और सहमति प्रक्रिया में देरी से दवा प्रतिरोधी टीबी का खतरा भी बढ़ रहा है।
पब्लिक बनाम प्राइवेट हेल्थ सिस्टम
जिला टीबी केंद्र के आंकड़ों के अनुसार पब्लिक हेल्थ सिस्टम में इलाज की सफलता दर 87 प्रतिशत दर्ज की गई है, जबकि प्राइवेट हेल्थ सेक्टर में यह दर 92 प्रतिशत रही। हालांकि कुल टीबी मरीजों का बड़ा बोझ पब्लिक हेल्थ सिस्टम पर ही है।
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रांची के सिविल सर्जन डा. प्रभात कुमार का मानना है कि प्राइवेट सेक्टर में इलाज का प्रतिशत अधिक दिखने के पीछे सीमित संख्या में मरीज, बेहतर फालोअप और आर्थिक क्षमता जैसे कारण हैं।
वहीं, प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान (निक्षय मित्र योजना) के तहत जिले में इस समय कुल 4569 टीबी मरीज इलाज पर हैं। इनमें से 3317 मरीजों ने योजना के तहत अपने इलाज की सहमति दी है, जबकि 549 मरीजों की सहमति अब भी लंबित है।
सहमति न होने के कारण इन मरीजों को नियमित पोषण किट और सामाजिक सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जिससे इलाज की सफलता दर प्रभावित हो रही है। जिले में अब तक कुल 6073 पोषण किट वितरित किए गए हैं, लेकिन वितरण में भी असमानता सामने आई है।
जहां नामकुम में सबसे अधिक 2105 पोषण किट वितरित हुए हैं, वहीं रातू (53), लापुंग (32) और बुढ़मू (55) जैसे प्रखंडों में किट की संख्या बेहद कम रही। जिले में टीबी उन्मूलन की दिशा में प्रयास तो किया जा रहा हैं, लेकिन इलाज, पोषण और सामाजिक सहयोग इन तीनों के समन्वय के बिना शत-प्रतिशत सफलता हासिल करना अब भी दूर की चुनौती बना हुआ है।
आगे की रणनीति
जिला स्वास्थ्य समिति ने वर्ष 2026 के लिए नई रणनीति तैयार की है, जिसमें नामकुम जैसे कमजोर प्रखंडों पर विशेष फोकस, सहमति लंबित मरीजों को योजना से जोड़ना, हाई रिस्क क्षेत्रों में सक्रिय मरीज खोज अभियान और इलाज छोड़ने वाले मरीजों की सख्त मानिटरिंग शामिल है।
रांची जिले में टीबी इलाज की स्थिति
- कुल इलाज सफलता दर: 89 प्रतिशत
- पब्लिक हेल्थ सिस्टम: 87 प्रतिशत
- प्राइवेट हेल्थ सिस्टम: 92 प्रतिशत
- नामकुम प्रखंड में सफलता दर: 71 प्रतिशत
- कुल मौतें: 155 मरीज
ये हैं चुनौतियां
- सहमति लंबित मरीजों को योजना से जोड़ना
- नामकुम, मांडर और अंगारा जैसे कमजोर प्रखंडों पर विशेष फोकस
- इलाज छोड़ने वाले मरीजों की सख्त निगरानी
सरकारी व निजी स्वास्थ्य केंद्र में इलाज
पब्लिक हेल्थ सिस्टम : इलाज सफलता दर: 87 प्रतिशत
प्राइवेट हेल्थ सिस्टम : इलाज सफलता दर: 92 प्रतिशत
कैसे करें टीबी से बचाव, जरूरी उपाय
टीबी (क्षय रोग) एक संक्रामक बीमारी है, लेकिन सही जानकारी, समय पर जांच और सावधानी से इससे बचाव संभव है। टीबी का इलाज सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह मुफ्त है। जांच, दवा और पोषण सहायता सभी उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नीचे दिए गए उपाय टीबी के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
- लगातार खांसी को न करें नजरअंदाज: दो हफ्ते से अधिक समय तक खांसी, बुखार, वजन कम होना या रात में पसीना आना टीबी के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में तुरंत नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराएं।
- मुंह ढककर खांसें और छींकें: टीबी हवा के जरिए फैलती है। खांसते या छींकते समय रूमाल या मास्क का इस्तेमाल करें और इस्तेमाल किए गए रूमाल को नियमित रूप से धोएं।
- इलाज अधूरा न छोड़ें: टीबी का इलाज 6 से 9 महीने तक चलता है। बीच में दवा छोड़ने से बीमारी गंभीर हो सकती है और दवा-प्रतिरोधी टीबी (DR-TB) का खतरा बढ़ जाता है।
- पोषण का रखें विशेष ध्यान: प्रोटीन युक्त भोजन (दाल, अंडा, दूध), हरी सब्जियां और फल शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। सरकार की निक्षय मित्र योजना के तहत मिलने वाली पोषण सहायता का लाभ जरूर लें।
- घर और कार्यस्थल में रखें हवा और रोशनी का इंतजाम: बंद और भीड़भाड़ वाले स्थानों में टीबी के संक्रमण का खतरा अधिक होता है। घर की खिड़कियां खुली रखें, धूप और ताजी हवा आने दें।
- बीसीजी टीकाकरण जरूरी: नवजात शिशुओं को बीसीजी टीका अवश्य लगवाएं। यह गंभीर टीबी से बचाव में मदद करता है।
- नशे से बनाएं दूरी: धूम्रपान और शराब से फेफड़े कमजोर होते हैं, जिससे टीबी होने का खतरा बढ़ जाता है।
- टीबी मरीज के संपर्क में हैं तो जांच कराएं: अगर घर या आसपास कोई टीबी मरीज है, तो परिवार के सभी सदस्यों की जांच कराना जरूरी है।