साल सूरज से इश्क लड़ाता तो अर्जुन दर्द पर मरहम; सतपुड़ा भूल जाओगे, कभी आओ तो सारंडा के जंगल
Jharkhand कोल्हान रेंज के सारंडा जंगल में नक्सलियों के सफाये से पर्यटन की नई उम्मीदें जगी हैं। 'सात सौ पहाड़ियों की भूमि' और एशिया के सबसे बड़े साल के ...और पढ़ें

कोल्हान रेंज का सारंडा का जंगल प्रकृति का अनुपम तोहफा।
HighLights
नक्सलियों के सफाये से सारंडा में पर्यटन की नई उम्मीदें।
'सात सौ पहाड़ियों की भूमि', एशिया का सबसे बड़ा साल जंगल।
डिजिटल डेस्क, रांची। कोल्हान रेंज के जंगलों से नक्सलियों के सफाया से पर्यटन की नई उम्मीदें जगी है। सारंडा में जैव विविधता प्रकृति का अनुपम तोहफा है। सारंडा जंगलों की सुंदरता अद्भुत है। यहां अर्जुन के पेड़ मानो प्राचीन प्रेम कथाएं सुना रहे हों, और साल के वृक्ष सूरज की तीखी किरणों से इश्क की जंग लड़ते हुए अपनी हरी-भरी छांव को बनाए रखते हैं।
सतपुड़ा से कहीं ज्यादा घना जंगल सारंडा में है। आप कभी आएं, तो इसकी जादुई दुनिया में खो जाएंगे। घने साल के जंगल, विविध वन्यजीव और आदिवासी संस्कृति का अनोखा मिश्रण। सारंडा, जो 'सात सौ पहाड़ियों की भूमि' के रूप में जाना जाता है, एशिया के सबसे बड़े साल के जंगलों का घर है। सरकार के ध्यान देने पर पर्यटन का यह बड़ा केंद्र हो सकता है।
कोल्हान रेंज, झारखंड के पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिलों में फैला यह क्षेत्र, विविध जैव-विविधता, प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक महत्व से भरपूर है। नक्सली और अराजक खनन ने इसे हमेशा नुकसान पहुंचाया है।
सारंडा: सात सौ पहाड़ियों की भूमि
सारंडा जंगल कोल्हान रेंज का अभिन्न अंग है, जो छोटानागपुर पठार पर स्थित है। कुल क्षेत्रफल लगभग 820 से 856 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 816 वर्ग किमी आरक्षित वन क्षेत्र है।
यह जंगल मुख्य रूप से पश्चिम सिंहभूम जिले में फैला हुआ है, जो ओडिशा की सीमा से सटा हुआ है। 'सारंडा' नाम हो आदिवासी भाषा में 'सात सौ पहाड़ियों' का अर्थ रखता है, और वाकई यहां की पहाड़ियां इसकी पहचान हैं।
ऊंचाई 200 से 927 मीटर तक है, जो इसे एक विविध भू-आकृति प्रदान करती है। करो और कोइना जैसी सदाबहार नदियां यहां बहती हैं, जो जंगल की जैव-विविधता को पोषित करती हैं।
इन नदियों के किनारे लौह अयस्क से भरपूर हैं, जो जंगल की मिट्टी को लाल रंग देते हैं और इसे 'ग्रीन स्टील' के ऊपर 'ग्रे स्टील' (लौह अयस्क) का अनोखा मिश्रण बनाते हैं।
जंगल के दिल में थालकोबाद गांव स्थित है, जो 550 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। यहां से जंगल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। घने साल के पेड़, पहाड़ियां और नीचे बहती नदियां।
यहां पहुंचने के लिए जमशेदपुर या रांची से चाईबासा होते हुए किरिबुरु या मेघाहातुबुरु पहुंचा जा सकता है। घुमावदार सड़कें साइकिलिंग, हाइकिंग और ड्राइविंग के लिए आदर्श हैं।
कोल्हान डिवीजन का कुल क्षेत्र 13,440 वर्ग किलोमीटर है, सारंडा इसका सबसे आकर्षक हिस्सा है। यहां का मौसम साल भर सुहावना रहता है, सर्दियों में ठंडक और मानसून में बहार।
यह क्षेत्र छोटानागपुर पठार का हिस्सा है, जहां लेटराइट मिट्टी और पहाड़ी ढलान जंगल को एक अनोखा रूप देते हैं।
सारंडा की भौगोलिक विशेषताएं इसे एक महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र बनाती हैं, जो आसपास के इलाकों को पानी प्रदान करती हैं। सारंडा की घनी हरियाली और पहाड़ियों का दृश्य देखने लायक है।
जैव-विविधता: प्रकृति का अनमोल खजाना
सारंडा एशिया का सबसे बड़ा सतत साल (शोरिया रोबस्टा) वन क्षेत्र है, जो भारत के सबसे बड़े साल जंगलों में से एक है। यहां साल के अलावा कुसुम, महुआ, पलाश, बांस, आम, जामुन, जैकफ्रूट, तिलाई, हरिन हरा, गुलर और आसन जैसे पेड़-पौधे पाए जाते हैं।
खबरें और भी
थालकोबाद क्षेत्र में दुर्लभ ऑर्किड्स की 11 प्रजातियां हैं, जैसे डेंड्रोबियम जीनस की सभी 11 स्पीशीज और दुर्लभ बुलबोफिलम क्रासिपेस तथा पेक्टेलिसट्रिफ्लोरा।
जंगल में 79 से अधिक पौधों की प्रजातियां दर्ज हैं, जिनमें औषधीय पौधे और दुर्लभ झाड़ियां शामिल हैं। यह क्षेत्र मशरूम और अन्य वन उत्पादों से भी समृद्ध है।
जीव जंतुओं की सैकड़ों प्रजातियां
जीव-जंतुओं की दुनिया यहां और भी रोचक है। 28 स्तनधारी प्रजातियां, जिसमें हाथी, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, फोर-हॉर्न्ड एंटीलोप, सांबर हिरण, चीतल, बाइसन, टाइगर (हाल ही में देखे गए), एशियन पाम सिवेट और माउस डियर शामिल हैं।
यहां 138 पक्षी प्रजातियां, 27 सरीसृप, 32 तितली प्रजातियां और 20 उभयचर प्रजातियां हैं। सारंडा सिंहभूम एलीफैंट रिजर्व का कोर क्षेत्र है, जहां 150 से 375 हाथी विचरण करते हैं।तीन हाथी गलियारे यहां से गुजरते हैं, जो वन्यजीवों के प्रवास के लिए महत्वपूर्ण हैं। दुर्लभ प्रजातियां जैसे साल फॉरेस्ट टॉर्टोइज और फ्लाइंग लिजर्ड भी यहां पाई जाती हैं।
यहां की जैव-विविधता इसे एक कार्बन सिंक बनाती है, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करती है। आदिवासी समुदाय- हो, मुंडा, ओरांव और बिरहोर जंगल से जुड़े हैं, और उनकी संस्कृति वन संरक्षण में योगदान देती है।
वे महुआ के फूलों से शराब बनाते हैं, साल के पत्तों से प्लेटें, और जड़ी-बूटियों से दवाइयां। यह जंगल एक इकोलॉजिकल हॉटस्पॉट है, जहां 60% से अधिक एंडेमिक ट्री स्पीशीज हैं।
हाल के अध्ययनों में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) ने 79 पौधे प्रजातियां, 23 स्तनधारी, 138 पक्षी, 27 सरीसृप और 32 तितली प्रजातियां दर्ज की हैं।
सारंडा की जैव-विविधता न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी को संतुलित रखती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए एक उदाहरण है।
सारंडा का संघर्ष इतिहास के झरोखे से
सारंडा का इतिहास 1882 से शुरू होता है, जब इसे रिजर्व फॉरेस्ट घोषित किया गया। 1906 में यहां लौह अयस्क खनन शुरू हुआ, जो आज तक जारी है।
ब्रिटिश काल में यह क्षेत्र लौह अयस्क के लिए जाना जाता था, और स्वतंत्रता के बाद स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एसएआईएल) जैसे संगठनों ने यहां खनन को बढ़ावा दिया।
किरिबुरु और मेघाहातुबुरु जैसे खनन शहर यहां विकसित हुए। 1960-70 के दशक में नक्सलवाद और माओवादी प्रभाव ने क्षेत्र को प्रभावित किया, लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति सुधरी है।
आदिवासी समुदायों का इतिहास यहां हजारों वर्ष पुराना है। हो जनजाति की भाषा में 'सारंडा' का अर्थ ही सात सौ पहाड़ियां है। वे जंगल को अपनी मां मानते हैं और इसकी रक्षा में सदियों से योगदान दे रहे हैं।
1990 तक यह प्रमुख हाथी गलियारा था, लेकिन खनन ने इसे बाधित किया। इतिहास में सारंडा को 'ग्रीन स्टील' कहा जाता है, जो इसके साल जंगलों को दर्शाता है।
साल की लकड़ियां सबसे मजबूत होती है। जबकि हकीकत में लौह अयस्क 'ग्रे स्टील' का लालच इसे बर्बाद कर रहा है। यह द्वंद्व सारंडा के इतिहास की कुंजी है।
सारंडा की चुनौतियां: खनन से पर्यावरणीय खतरा
सारंडा की सुंदरता पर खनन का साया मंडरा रहा है। यहां लौह अयस्क की प्रचुरता के कारण 1906 से खनन शुरू हुआ, जिसने जंगल के 1,100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को नष्ट कर दिया।
खनन से नदियों में प्रदूषण बढ़ा, हाथियों के प्रवास मार्ग बाधित हुए, और जैव-विविधता को खतरा पहुंचा। 1990 तक यह प्रमुख हाथी गलियारा था, लेकिन अब हाथियों की संख्या घटकर 375 रह गई है।
अवैध खनन, वनों की कटाई और आदिवासियों का विस्थापन प्रमुख चुनौतियां हैं। माओवादी और नक्सल प्रभाव भी एक समय समस्या था, हालांकि अब स्थिति नियंत्रण में है।
खनन से स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ी हैं, जैसे धूल से सांस की बीमारियां और आदिवासी महिलाओं का शोषण। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट में 2016 में खनन के प्रभाव को उजागर किया गया, जिसमें हाथी मार्गों का त्याग शामिल है।
अवैध खनन माफिया और विकास की होड़ में जंगल का 30% क्षेत्र प्रभावित हो चुका है। जलवायु परिवर्तन से सूखा और बाढ़ भी चुनौतियां बढ़ा रही हैं।
संरक्षण प्रयास: जंगल को बचाने की जंग
संरक्षण के प्रयासों में 1968 में सरंडा गेम सैंक्चुअरी की घोषणा हुई, जो बाद में लैप्स हो गई। 2001 में सिंहभूम एलीफैंट रिजर्व घोषित किया गया।
हाल ही में, 2022 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और 2025 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से 314 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का आदेश दिया गया, साथ ही एक किलोमीटर की इको-सेंसिटिव जोन।
डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट में 30% से अधिक वन कवर वाले क्षेत्रों को 'नो-गो जोन' बनाने की सिफारिश की गई है।
सरकार और एनजीओ के प्रयासों में पुनर्वनीकरण, सामुदायिक भागीदारी और सस्टेनेबल माइनिंग शामिल हैं। एसएआईएल को मौजूदा लीज पर खनन जारी रखने की अनुमति है, लेकिन नए लीज पर रोक है।
पर्यटन संभावनाएं: इको-टूरिज्म का स्वर्ग
सारंडा पर्यटन के लिए आदर्श है। यहां ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग, वाइल्डलाइफ सफारी और आदिवासी संस्कृति अनुभव उपलब्ध हैं। थालकोबाद, मोती झरना और किरिबुरु जैसे स्पॉट आकर्षण हैं।
हाल के वर्षों में नक्सल प्रभाव कम होने से पर्यटक बढ़े हैं। इको-टूरिज्म से स्थानीय रोजगार बढ़ सकता है। जंगल की झरने और पहाड़ियां इसे एडवेंचर टूरिज्म का केंद्र बनाती हैं।
सांस्कृतिक महत्व: आदिवासियों की धरोहर
सारंडा आदिवासी संस्कृति का केंद्र है। हो, मुंडा आदि जनजातियां यहां की लोककथाओं, त्योहारों और रीति-रिवाजों से जुड़ी हैं। जंगल उनके जीवन का हिस्सा है।
सारंडा की पांच प्रमुख विशेषताएं
1. एशिया का सबसे बड़ा साल जंगल: सतत साल वन क्षेत्र, जो जैव-विविधता का खजाना है।
2. सात सौ पहाड़ियां: अनोखी भौगोलिक संरचना, जो ट्रेकिंग के लिए आदर्श।
3. वन्यजीवों का घर: हाथी, तेंदुआ आदि 28 स्तनधारी प्रजातियां।
4. ऑर्किड्स का स्वर्ग: 11 दुर्लभ डेंड्रोबियम प्रजातियां।
5. कार्बन सिंक और जलग्रहण: जलवायु संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका।
सारंडा को बचाएं, भविष्य बचाएं
वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र सिंह कहते हैं- सारंडा कोल्हान रेंज की अनमोल धरोहर है, जो जैव-विविधता का खजाना और पर्यटन की अपार संभावनाएं छिपाए हुए है।
नक्सलियों के डर खत्म होने से यह टूरिज्म का बड़ा केंद्र बन सकता है। अवैध खनन भी इसे खतरे में डाल रही हैं। सरकार, स्थानीय समुदाय और पर्यावरण संगठनों के संयुक्त प्रयास से इसे बचाया जा सकता है।