झारखंड सिकिदरी हाइडेल घोटाला: 20 करोड़ के बदले 134 करोड़ पेमेंट की तैयारी, वित्त विभाग को दोबारा भेजी जाएगी फाइल
लगभग 13 साल पुराने सिकिदरी हाइडेल पावर प्लांट मरम्मत घोटाले में 20 करोड़ का दावा अब ब्याज और लापरवाही के कारण 134 करोड़ हो गया है। ...और पढ़ें

20 करोड़ के बदले 134 करोड़ भुगतान की फाइल वित्त को दोबारा भेजने की तैयारी (AI Generated Image)

समय कम है?
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राज्य ब्यूरो, रांची। लगभग 13 वर्ष पुराने सिकिदरी हाइडेल पावर प्लांट मरम्मत घोटाले की फाइल एक बार फिर चर्चा में है। मामले में भारी वित्तीय अनियमितता, बिना काम कराए भुगतान और फर्जी सत्यापन के आरोप पहले से जांच के दायरे में हैं।
कमर्शियल कोर्ट के आदेश के बाद भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) को करीब 134 करोड़ रुपये भुगतान की तैयारी ने पूरे मामले को फिर से गरमा दिया है।
खास बात यह है कि मूल दावा लगभग 20 करोड़ रुपये का था, लेकिन वर्षों तक चली प्रक्रिया, ब्याज और मुकदमे में विभागीय लापरवाही के कारण राशि कई गुना बढ़ गई।
ऊर्जा विभाग की ओर से पूर्व में बढ़ी हुई राशि के भुगतान संबंधी फाइल आगे बढ़ाई गई थी, लेकिन वित्त विभाग ने कई बिंदुओं पर आपत्ति जताते हुए इसे लौटा दिया था। अब दोबारा संशोधित प्रस्ताव तैयार कर वित्त विभाग को भेजने की तैयारी चल रही है।
इस बीच विभाग के भीतर भी इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि जिस मामले की जांच में सीबीआई के द्वारा आरोप पत्र दाखिल है, उसमें कामर्शियल कोर्ट के मुकदमे में लापरवाही और गलत तरीके से विपत्र सत्यापित करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं कर राशि के भुगतान की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
कोर्ट में पैरवी नहीं होने से आया एकतरफा फैसला
13 वर्ष पूर्व तत्कालीन झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड के चेयरमैन एसएन वर्मा के कार्यकाल में सिकिदरी हाइडेल परियोजना की मरम्मत और मशीनों के रखरखाव के नाम पर करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया, जबकि कई कार्य धरातल पर पूरे ही नहीं हुए थे।
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इसके बावजूद कार्य पूर्ण होने का सत्यापन उन्हीं पदाधिकारियों ने कर दिया, जिन्होंने यह स्वीकार किया था। इसी मामले में भेल ने भुगतान को लेकर कामर्शियल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और प्रमाण स्वरूप सत्यापित विपत्र और कम पूरा करने का सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया, जिस पर विभागीय अधिकारियों ने कोर्ट में चुप्पी रखी और भेल का प्रतिपरीक्षण भी नहीं किया।
विभाग की ओर से समय पर प्रभावी पैरवी नहीं की गई। कई तिथियों पर जवाब दाखिल नहीं हुआ। निगम की ओर से गवाह प्रस्तुत नहीं किए गए और भेल के गवाहों का प्रतिपरीक्षण भी नहीं किया गया, जिसके कारण कोर्ट ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए भुगतान का आदेश दे दिया। अब ब्याज सहित यह राशि करीब 134 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
जांच समिति द्वारा चिह्नित एक पदाधिकारी को क्लीनचिट
इस मामले में सीबीआई द्वारा पहले से चार्जशीट दायर है। जांच एजेंसियों के स्तर पर कई दस्तावेजों और भुगतान प्रक्रियाओं की पड़ताल हुई है। इस मामले में लापरवाही के जांच के लिए बनी समिति ने छह पदाधिकारियों को सीधे तौर पर दोषी पाया पर दोषी पाए गए।
इसमें एक पदाधिकारी को क्लीनचिट देने की तैयारी है। इस वजह से दोषियों पर कार्रवाई की संचिका दबी हुई है। यदि बिना पूर्ण तकनीकी परीक्षण और जिम्मेदारी तय किए भुगतान किया जाता है तो भविष्य में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि वित्त विभाग ने फाइल लौटाते समय कई स्पष्टीकरण मांगे हैं।
अभी तक मेरे ध्यानार्थ फाइल नहीं आई है। फाइल जब आएगी तो मैं स्वयं इसका समुचित अध्ययन करूंगा। फाइल के अध्ययन के पश्चात इस पर विधिसम्मत निर्णय किया जाएगा। - राधाकृष्ण किशोर, वित्त मंत्री