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SBI जनरल इंश्योरेंस पर कंज्यूमर कोर्ट का बड़ा फैसला, इलाज का क्लेम रोका तो लगेगा ₹1.32 लाख का जुर्माना

Published: Wed, 02 Sep 2026 03:15 PM (IST)

पश्चिमी सिंहभूम उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस को महेंद्र रजक की पत्नी के इलाज के 82,572 रुपये के दावे का भुगतान करने का आदेश दिया है।

उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस को पत्नी के इलाज का बीमा दावा चुकाने का दिया आदेश (AI Generated Image)

उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस को पत्नी के इलाज का बीमा दावा चुकाने का दिया आदेश (AI Generated Image)

HighLights

  1. उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी को भुगतान का आदेश दिया।

  2. पत्नी के इलाज के 82,572 रुपये का दावा था।

  3. कुल 1,32,572 रुपये 45 दिन में चुकाने होंगे।

जागरण संवाददाता, चाईबासा। पत्नी के इलाज में खर्च हुए स्वास्थ्य बीमा के 82,572 रुपये के भुगतान से जुड़े मामले में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, पश्चिमी सिंहभूम ने एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।

आयोग ने बीमा कंपनी को 82,572 रुपये की दावा राशि, 40,000 रुपये मानसिक पीड़ा एवं परेशानी तथा 10,000 रुपये वाद व्यय के रूप में भुगतान करने का आदेश दिया है। इस तरह कंपनी को कुल 1,32,572 रुपये का भुगतान करना होगा।

यह फैसला सी.सी. केस संख्या 28/2025 में 2 सितंबर 2026 को घोषित किया गया। मामले की संस्थापन तिथि 16 जुलाई 2025 तथा अंतिम सुनवाई 22 अगस्त 2026 को हुई थी।

शिकायतकर्ता महेंद्र रजक, निवासी ब्रहमणी घाट, डाकघर बिष्णुपुर, जिला गया (बिहार), वर्तमान में पुलिस लाइन, चाईबासा में रहते हैं। शिकायतकर्ता ने स्वयं एवं अपने परिवार के लिए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस की आरोग्य प्लस स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी।

पॉलिसी 13 फरवरी 2024 से 12 फरवरी 2025 तक प्रभावी थी। इसी अवधि में उनकी पत्नी कलावती देवी को बीमारी के उपचार के लिए 16 अक्टूबर से 22 अक्टूबर 2024 तक गुरुनानक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान कुल 82,572 रुपये खर्च हुए।

शिकायतकर्ता के अनुसार उन्होंने बीमा कंपनी को आवश्यक दस्तावेज और मेडिकल बिल उपलब्ध कराए, लेकिन कंपनी की ओर से दावे का भुगतान नहीं किया गया। इसके अलावा 18 अक्टूबर 2024 को बीमा कंपनी की ओर से अस्पताल को भेजे गए पत्र को भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसमें कैशलेस सुविधा देने में असमर्थता जताई गई थी।

कंपनी ने कहा- दावा दर्ज ही नहीं कराया गया। बीमा कंपनी ने आयोग के समक्ष अपने बचाव में कहा कि शिकायतकर्ता की ओर से उसके पास कोई दावा दर्ज नहीं कराया गया था। कंपनी ने शिकायत को समय से पहले दाखिल किया गया बताते हुए कहा कि पहले निर्धारित दावा प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए थी।

आयोग ने बीमा कंपनी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने माना कि अस्पताल से कैशलेस सुविधा के संबंध में कंपनी को जानकारी थी और मामले में दावा संख्या का भी उल्लेख सामने आया था। ऐसी स्थिति में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कंपनी के पास कोई दावा प्राप्त नहीं हुआ।

आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी अपने पास उपलब्ध दावा रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक हिस्ट्री और संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत कर अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकती थी। शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के बावजूद कंपनी ने दावे का उचित परीक्षण कर स्पष्ट एवं कारणयुक्त निर्णय नहीं दिया।

आयोग ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी माना। हालांकि आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल का पूरा बिल बिना किसी जांच के स्वतः देय नहीं माना जा सकता, लेकिन बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है कि दावा प्राप्त होने के बाद उसका निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप मूल्यांकन करे तथा उपभोक्ता को अपने निर्णय से अवगत कराए।

आयोग ने सभी विपक्षी पक्षों को संयुक्त अथवा पृथक रूप से शिकायतकर्ता को 82,572 रुपये दावा राशि, 40,000 रुपये मानसिक पीड़ा एवं परेशानी और 10,000 रुपये वाद व्यय, कुल 1,32,572 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।

आदेश के अनुसार यह भुगतान 45 दिनों के भीतर करना होगा। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किए जाने पर आदेशानुसार 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।