नाम बदला पर नहीं बदले हालात:'ट्रेनमैनेजर' बने रेलवे गार्ड आज भी अंग्रेजों के जमाने की बोगी में ड्यूटी करने को मजबूर
मालगाड़ियों के गार्ड, जिन्हें अब ट्रेन मैनेजर कहा जाता है, आज भी अंग्रेजों के जमाने की सुविधाओं में काम करने को मजबूर हैं। ब्रेकवैन में शौचालय और मौसम ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
ट्रेन मैनेजरों को बिना शौचालय वाली बोगी में करना पड़ता है सफर।
कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी में लोहे के केबिन में ड्यूटी।
निर्जन स्थानों पर सुरक्षा का अभाव, लूटपाट और हमले का खतरा।
लोहे का कटघरा: न शौचालय, न मौसम से बचाव
मालगाड़ी का गार्ड जिस बोगी (ब्रेकवैन) में सफर करता है, वह महज लोहे का एक कटघरा बनकर रह गई है। इस बोगी की सबसे बड़ीविडंबनाएं निम्नलिखित हैं:
- शौचालय का न होना: पूरी ट्रेन के संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले ट्रेन मैनेजर के लिए बोगी में एक बेसिक शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है।
- मौसम का कहर: कड़ाके की ठंड की रातें हों या जून की झुलसाने वाली गर्मी की दोपहरी, लोहे का यह केबिन मौसम की मार को कई गुना बढ़ा देता है। लू के थपेड़ों और धूल भरी हवाओं के बीच गार्ड्स को घंटों सफर करना पड़ता है।
जिम्मेदारियां अनेक, पर सुरक्षा के नाम पर शून्य
प्रबंधन के अपने तर्क, पर मानवता की गुहार जारी
इस गंभीर समस्या पर रेलवे प्रबंधन और गार्ड्स के अपने-अपने तर्क हैं। एक तरफ जहां एसोसिएशन लगातार बेहतर गार्ड बोगी, शौचालय, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रबंधन उनकी ड्यूटी की अति महत्वपूर्ण प्रकृति की दुहाई देकर पल्ला झाड़ लेता है।