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कुमारडुंगी में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के तोड़ा स्कूल, पेड़ के नीचे लग रही कक्षाएं; ग्रामीणों में आक्रोश

By Sudhir PandeyEdited By: Sanjeev Kumar
Published: Thu, 22 Oct 2026 12:54 PM (GMT+05:30)

पश्चिम सिंहभूम के कुमारडुंगी में प्राथमिक विद्यालय पुतकरसाई का भवन बिना वैकल्पिक व्यवस्था के तोड़े जाने से 54 बच्चों की पढ़ाई संकट में है।

प्राथमिक विद्यालय पुतकरसाई का जर्जर भवन तोड़े जाने के बाद बच्चों के बैठने और पठन-पाठन की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं किए जाने से ग्रामीणों में भारी रोष है।

प्राथमिक विद्यालय पुतकरसाई का जर्जर भवन तोड़े जाने के बाद बच्चों के बैठने और पठन-पाठन की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं किए जाने से ग्रामीणों में भारी रोष है।

HighLights

  1. स्कूल भवन तोड़ने से 54 बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई।

  2. बच्चे अब पेड़ों के नीचे या ग्रामीणों के घरों में पढ़ रहे हैं।

  3. ग्रामीणों ने वैकल्पिक व्यवस्था और नए भवन की मांग की है।

संवाद सूत्र, कुमारडुंगी (पश्चिम सिंहभूम)। पश्चिम सिंहभूम जिले के कुमारडुंगी प्रखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय पुतकरसाई का जर्जर भवन तोड़े जाने के बाद वहां अध्ययनरत 54 बच्चों की पढ़ाई पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। 
 
भवन गिराने से पूर्व बच्चों के बैठने और पठन-पाठन की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं किए जाने से ग्रामीणों में भारी रोष है। स्थिति यह है कि विद्यालय में कक्षाएं संचालित करने के लिए जगह नहीं बची है। 
 
इस कारण शिक्षक कभी आम के पेड़ के नीचे तो कभी ग्रामीणों के घरों में बच्चों को पढ़ाने को विवश हैं। इस गंभीर समस्या को लेकर बुधवार शाम ग्रामीण मुंडा त्रिभुवन हेम्ब्रम की अध्यक्षता में एक विशेष बैठक आयोजित की गई। 
 
बैठक में ग्रामीणों ने बिना योजना के विद्यालय भवन तोड़े जाने पर नाराजगी जताते हुए प्रशासन की कार्यशैली के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। 
 
उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करने और युद्धस्तर पर नए विद्यालय भवन का निर्माण कराने की मांग की है।
 
cbs
 
ग्रामीणों के अनुसार, भवन ध्वस्त होने के बाद विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति में भारी गिरावट दर्ज की गई है। जहां पहले प्रतिदिन 40 से 45 बच्चे स्कूल आते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर महज 8 से 10 रह गई है। 
 
बैठने की उचित व्यवस्था के अभाव में अभिभावक भी अपने नौनिहालों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि यह समस्या वर्षों पुरानी है। 
 
पूर्व में भी भवन के एक हिस्से को जर्जर बताकर तोड़ दिया गया था, लेकिन उसके स्थान पर आज तक नए भवन का निर्माण नहीं हुआ। इसके बावजूद बच्चे शेष बचे सीमित हिस्से में पढ़ाई कर रहे थे। 
 
अब इस बची हुई इमारत को भी ध्वस्त कर दिए जाने से विद्यालय पूरी तरह भवनविहीन हो गया है। ग्रामीण मुंडा त्रिभुवन हेम्ब्रम ने आरोप लगाया कि भवन तोड़ने के आदेश या प्रक्रिया की कोई भी जानकारी ग्रामीणों को नहीं दी गई। 
 
प्रशासन ने मनमाने तरीके से कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि भवन गिराने में तो पूरी तत्परता दिखाई गई, लेकिन बच्चों के भविष्य और उनकी पढ़ाई पर पड़ने वाले असर की बिल्कुल चिंता नहीं की गई।
 
विद्यालय प्रबंधन समिति की अध्यक्ष यसमती पुरती ने बताया कि भवन जर्जर था इसलिए इसे तोड़ा जाना स्वाभाविक था, परंतु बिना वैकल्पिक व्यवस्था के शिक्षक भी इसके पक्ष में नहीं थे। 
 
उन्होंने आरोप लगाया कि विभागीय दबाव के कारण यह कार्रवाई की गई, जबकि उन्होंने ऐसा करने से मना किया था। समाजसेवी नंदलाल हेम्ब्रम और ग्रामीण अमित गोप ने भी विभाग की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया है। 
 
उन्होंने कहा कि अचानक भवन गिराए जाने से बच्चों के सामने बड़ा असमंजस पैदा हो गया है कि वे आखिर कहां बैठकर पढ़ाई करें। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पठन-पाठन की सुचारू व्यवस्था और नए भवन निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो वे आंदोलन तेज करने के लिए बाध्य होंगे।