दीवाली पर दिखना है सबसे अलग? आउटफिट से मेकअप और हेयरस्टाइल तक अपनाएं ये ट्रेंड
गृहलक्ष्मी की पहचान केवल त्योहार की तैयारियों को पूरा करने में नहीं, बल्कि उनसे जुड़े भाव, संस्कार और परंपराओं को ...और पढ़ें

पारंपरिक परिधानों, मेकअप और हेयरस्टाइल के आधुनिक ट्रेंड (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
पारंपरिक परिधानों को आधुनिक अंदाज में अपनाएं
नेचुरल मेकअप और सलीकेदार हेयरस्टाइल से निखारें खूबसूरती
पुरानी साड़ियों को नया रूप देकर विरासत सहेजें
एन नवराही, नई दिल्ली। दीवाली आते ही घर के हर कोने में रौनक दिखाई देने लगती है। इस सबके बीच घर की गृहलक्ष्मी हर छोटी-बड़ी तैयारी को सहेजते हुए त्योहार को खास बनाने में जुटी रहती है। ग्रेटर नोएडा की प्रिया वर्मा के लिए दीवाली केवल घर सजाने और पूजा करने का अवसर नहीं, बल्कि परिवार की परंपराओं और यादों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी जरिया है। वह कहती हैं कि मां की दी हुई बनारसी साड़ी मेरे लिए बहुत खास है। उसे संभालकर रखना और खास अवसरों पर पहनना मां और परिवार से जुड़े रहने का एहसास कराता है। उनका मानना है कि पारंपरिक परिधानों की खूबसूरती कभी पुरानी नहीं होती। उन्हें नए अंदाज में अपनाकर भी अपनी विरासत को सहेजा जा सकता है।
वहीं, सारिका अग्रवाल के लिए त्योहार की रौनक घर के माहौल के साथ परिवार के हर सदस्य के चेहरे पर दिखने वाली खुशी में है। वह घर की तैयारियों और पारिवारिक परंपराओं को निभाने के साथ अपने पहनावे और सजने-संवरने का भी ध्यान रखती हैं। उनका कहना है कि त्योहार पर तैयार होना उनके लिए स्वयं को समय देने और भीतर से उत्साहित महसूस करने का अवसर है। उन्हें पारंपरिक परिधान के साथ हल्की ज्वेलरी, सटल मेकअप और सलीकेदार हेयरस्टाइल पसंद है। वह मानती हैं कि सादगी के साथ भी खूबसूरत और आकर्षक दिखा जा सकता है।
उनका यह सोच बताता है कि गृहलक्ष्मी की भूमिका केवल घर की जिम्मेदारियां निभाने तक सीमित नहीं है। वो अपनी पसंद, परंपराओं और सौंदर्यबोध के जरिये त्योहारों की गरिमा को भी नया अर्थ दे रही हैं। दीवाली जैसे पारंपरिक त्योहारों को सहेजने और उनकी रौनक बनाए रखने में महिलाओं की अहम भूमिका है। घर की सजावट, पूजा की तैयारियों और पारिवारिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ वे अपने पहनावे और व्यक्तित्व में भी परंपरा व आधुनिकता का सुंदर मेल बिठा रही हैं।
परंपरा में जुड़े आधुनिक रंग
दीवाली पर घर की सजावट से लेकर पूजा की थाली और पारिवारिक मिलन तक, हर चीज में परंपरा की अपनी अहमियत होती है। यही बात पहनावे पर भी लागू होती है। त्योहार के अवसर पर महिलाएं ऐसे परिधान पसंद करती हैं, जिनमें पारंपरिक गरिमा के साथ उनका अपना अंदाज भी झलके। फैशन डिजाइनर संजुक्ता दत्ता के अनुसार, आज महिलाएं साड़ी, सूट और लहंगे जैसे पारंपरिक परिधानों को नए अंदाज में अपनाना पसंद कर रही हैं। साड़ी के साथ डिजाइनर ब्लाउज, खास स्लीव्स या जैकेट, वहीं सूट में नए कट और लेयरिंग के प्रयोग पारंपरिक पहनावे को समकालीन रूप देते हैं। हल्के और आरामदायक लहंगे भी पसंद किए जा रहे हैं। इस बार दीवाली के परिधानों में भी इस ट्रेंड की झलक देखने को मिल रही है।
फैशन एक्सपर्ट निलेश पराशर बताते हैं कि प्री-ड्रेप्ड साड़ी, हल्के लहंगे, को-आर्ड सेट और खास डिजाइन वाले ब्लाउज त्योहारों के परिधानों में अपनी जगह बना रहे हैं। वाइन, एमरल्ड ग्रीन, रस्ट और आइवरी जैसे रंग भी आकर्षक लगते हैं। उनके अनुसार, दीवाली जैसे अवसर पर परिधान ऐसा होना चाहिए, जो पूजा और पारिवारिक आयोजन की गरिमा के साथ-साथ पहनने वाली की सहजता और व्यक्तित्व को भी उभारे।
पहनावे में विरासत का रंग

दीवाली पर पहने जाने वाले परिधान केवल सजने-संवरने का माध्यम नहीं होते, कई बार वे परिवार की यादों और विरासत को भी अपने साथ समेटे होते हैं। मां या दादी की साड़ी, पारंपरिक कढ़ाई वाला दुपट्टा या परिवार में पीढ़ियों से संभालकर रखे गए वस्त्र त्योहार के अवसर पर खास भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं। संजुक्ता दत्ता के अनुसार, पारंपरिक परिधानों में नए प्रयोग करते समय उनकी मूल पहचान और कारीगरी को बनाए रखना जरूरी है।
साड़ी को कार्सेट शैली के ब्लाउज या लंबी डिजाइनर जैकेट के साथ नया रूप दिया जा सकता है। पारंपरिक कपड़ों से स्कर्ट, ड्रेस और फ्यूजन परिधान भी तैयार किए जा सकते हैं। असम के मेखला चादर और सिल्क को भी नए रूप में अपनाया जा सकता है। संजुक्ता बताती हैं कि उन्होंने इन पारंपरिक परिधानों से प्रेरित होकर ड्रेस, स्कर्ट और फ्यूजन वियर तैयार किए हैं। उनका मानना है कि नए प्रयोगों का उद्देश्य परंपरा को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि उसे आज के समय में भी प्रासंगिक बनाए रखना होना चाहिए।
हैंडलूम में बसी है सांस्कृतिक पहचान
दीवाली जैसे त्योहारों पर पारंपरिक कपड़ों और हैंडलूम की खूबसूरती अलग ही दिखाई देती है। इन परिधानों में केवल रंग और डिजाइन नहीं, बल्कि बुनकरों की मेहनत और पीढ़ियों से चली आ रही कला भी शामिल होती है। संजुक्ता दत्ता के अनुसार, अब महिलाएं कपड़े के साथ उसकी बुनाई, कारीगरी और उससे जुड़ी कहानी जानने में भी रुचि लेती हैं। असम का मूंगा, मुलबेरी और पाट सिल्क अपनी अलग पहचान रखते हैं। मूंगा सिल्क की प्राकृतिक सुनहरी चमक उसे खास बनाती है। ऐसे परिधानों को अपनाना बुनकरों की कला और उनकी आजीविका को सम्मान देने का भी माध्यम है। त्योहार पर पारंपरिक वस्त्रों को महत्व देना उस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने जैसा है, जिसे परिवार और समाज पीढ़ियों से सहेजते आए हैं।
गरिमा के साथ निखरे चेहरे की रौनक

दीवाली पर घर की सजावट और पूजा की तैयारियों के बीच गृहलक्ष्मी का सजना-संवरना भी त्योहार की रौनक का हिस्सा है। पूजा के समय पारंपरिक परिधान, बिंदी और सलीकेदार मेकअप उसके व्यक्तित्व को एक खास गरिमा देते हैं। हालांकि, इसके लिए बहुत भारी मेकअप जरूरी नहीं है। ब्यूटी एक्सपर्ट भारती तनेजा के अनुसार, इन दिनों नेचुरल और साफ्ट ग्लैम मेकअप पसंद किया जा रहा है। इसमें चेहरे की स्वाभाविक खूबसूरती को बनाए रखते हुए हल्का निखार दिया जाता है। ड्यूई बेस, हल्का ब्लश, थोड़ी हाइलाइटिंग और न्यूड, रोज या पीच रंग की लिपस्टिक से आकर्षक लुक पाया जा सकता है।
वह कहती हैं कि पारंपरिक परिधानों के साथ गोल्डन, ब्रांज और कापर रंगों का आई मेकअप, काजल और बिंदी अच्छा मेल बनाते हैं। लाल, मैरून और बेरी रंग की लिपस्टिक भी पारंपरिक अंदाज को निखारती है। वहीं, हल्के रंग के परिधान के साथ पीच और पिंक जैसे सौम्य रंग अपनाए जा सकते हैं। मेकअप का चयन परिधान, गहनों और अवसर के अनुरूप होना चाहिए। भारती तनेजा के अनुसार, 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को भी अपनी त्वचा के अनुसार हल्का बेस, क्रीम ब्लश और सौम्य रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए। उम्र मेकअप या खूबसूरती की सीमा नहीं है। इसका उद्देश्य चेहरे को बदलना नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक सुंदरता और आत्मविश्वास को उभारना होना चाहिए।
हेयरस्टाइल में झलके पारंपरिक अंदाज
-1793961235550.webp)
दीवाली के अवसर पर परिधान और मेकअप के साथ हेयरस्टाइल भी पूरे रूप को खास बनाता है। बालों में गजरा, फूल या पारंपरिक डोरी का इस्तेमाल त्योहार के माहौल से जुड़ाव को और सुंदर बनाता है। हेयर स्टाइलिस्ट कनिका टंडन के अनुसार, खुले बालों में साफ्ट कर्ल्स, सलीकेदार बन और फूलों से सजे हेयरस्टाइल पारंपरिक परिधानों के साथ अच्छे लगते हैं। साड़ी, सूट या लहंगे के साथ स्लीक बन बनाया जा सकता है। इसमें गजरा या एक छोटा फूल लगाने से पारंपरिक अंदाज उभरता है। वह बताती हैं कि साइड ब्रेड के साथ परिधान से मेल खाती डोरी या लेस लगाना भी अच्छा विकल्प है। सीधे या हल्के वेवी बालों में साफ्ट कर्ल्स और हाफ टाइड हेयरस्टाइल अपनाए जा सकते हैं। उम्रदराज महिलाओं के लिए सलीकेदार बन सहज और आकर्षक विकल्प है। उनका मानना है कि हेयरस्टाइल ऐसा होना चाहिए, जिसमें महिला सहज महसूस करे और त्योहार के अवसर पर उसकी अपनी पसंद भी दिखाई दे।
उम्र नहीं, पसंद और सहजता हो प्राथमिकता
फैशन के मामले में उम्र को सीमा मानने की जरूरत नहीं है। संजुक्ता दत्ता और निलेश पराशर के अनुसार, परिधान का चयन व्यक्ति की पसंद, सहजता और आत्मविश्वास के आधार पर होना चाहिए। किसी खास उम्र में कौन सा रंग या डिजाइन पहनना चाहिए, इसके लिए कोई तय नियम नहीं है। फैब्रिक, उसकी फिटिंग और सिलूएट ऐसे होने चाहिए, जिसमें पहनने वाला सहज महसूस करे। पारंपरिक परिधान के साथ सीमित एक्सेसरीज और हल्का मेकअप भी व्यक्तित्व को आकर्षक बना सकता है। वहीं, आधुनिक कट और फ्यूजन स्टाइल के साथ पारंपरिक गहनों का मेल भी अच्छा लगता है।
पुरानी साड़ी में सहेजें यादें, दें नया रूप
परिवार की पुरानी साड़ियों से भावनात्मक जुड़ाव होता है। मां या दादी की दी हुई साड़ी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी यादों और परंपराओं की निशानी होती है। संजुक्ता दत्ता के अनुसार, ऐसी साड़ियों को अलमारी में संभालकर रखने के साथ उन्हें नए रूप में इस्तेमाल करने के विकल्प भी हैं। उनसे लंबी स्कर्ट, ड्रेस, जैकेट या कुर्ता तैयार कराया जा सकता है। आधुनिक ब्लाउज या नए ड्रेप के साथ भी पुरानी साड़ी को नया अंदाज दिया जा सकता है। इस तरह परिधान का मूल कपड़ा और उससे जुड़ी यादें बनी रहती हैं और उसे दोबारा इस्तेमाल करने का अवसर भी मिलता है।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।