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    मजदूरों के खाने से कैसे बनी दम बिरयानी? पढ़ें उत्तर भारत के शाही खानपान की दिलचस्प कहानी

    Updated: Sun, 15 Mar 2026 08:19 PM (IST)

    उत्तर भारत का खानपान सदियों के इतिहास, संस्कृतियों के मिलन और शाही रसोइयों का सफरनामा है। सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू होकर, मध्य एशियाई और मुगल प्रभावों ...और पढ़ें

    उत्तर भारत के शाही खानपान का दिलचस्प इतिहास (Picture Credit- AI Generated)

    उत्तर भारत के शाही खानपान का दिलचस्प इतिहास (Picture Credit- AI Generated)

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर भारत का खानपान महज दाल-चावल की थाली नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराने इतिहास, संस्कृतियों के मिलन और शाही रसोइयों का एक लजीज सफरनामा है। आइए, इतिहास के पन्नों को पलटें और देखें कि हमारे रोज के खाने में शामिल व्यंजन कहां से आए और कैसे बन गए हमारी संस्कृति का हिस्सा।

    भारतीय खानपान की नींव

    उत्तर भारतीय खानपान की नींव बहुत गहरी है। हमारे खानपान का इतिहास सिंधू घाटी सभ्यता के समय से शुरू होता है। पुरातात्विक सबूतों से पता चलता है कि उस समय के लोग गेहूं और चावल खाते थे। वहीं, ऋग्वेद में ज्वार का जिक्र मिलता है, जो बताता है कि मोटे अनाज हमेशा से हमारे भोजन का हिस्सा रहे हैं।

    शाही रसोइयों की विरासत

    मध्यकाल में उत्तर भारत के खानपान में एक बड़ा बदलाव आया। यह वह दौर था जब विदेशी संस्कृतियों का भारत में आगमन हुआ और उनके साथ उनके अनूठे व्यंजन भी यहां आ गए।

    • मध्य एशियाई और ईरानी प्रभाव: मध्य एशिया और ईरान से आए व्यापारियों ने भारतीय रसोई में नए स्वाद और तकनीकें शामिल कीं। कश्मीर में आज भी शादियों में परोसा जाने वाला 'वाजवान' इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जिस पर फारसी प्रभाव साफ नजर आता है।
    • दिल्ली सल्तनत की नींव: उत्तर भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही कई ऐसे व्यंजन अस्तित्व में आए जो आज हमारी पहचान बन गए हैं। इनमें जलेबी, शामी कबाब, बर्रा कबाब और खमीरी रोटी शामिल हैं।
    • मुगलिया खानपान की समृद्धि: मुगलों ने भारतीय भोजन को शाही भव्यता दी। उन्होंने मसालों के संतुलित इस्तेमाल, धीमी आंच पर पकाने की तकनीक 'दम पुख्त' शैली और मेवों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। मुगलिया खाने की इस समृद्ध विरासत को बाद में बंगाल और अवध के नवाबों और हैदराबाद के निजामों ने आगे बढ़ाया।

    कैसे हुआ दम बिरयानी का जन्म

    लखनऊ के बड़ा इमामबाड़ा के निर्माण से दम बिरयानी के जन्म की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि हजारों मजदूरों के लिए गोश्त, चावल, सब्जी और मसाले को बड़े-बड़े बर्तनों (देग) में डालकर धीमी आंच पर पकने के लिए रख दिया जाता था। 

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    (Picture Credit- AI Generated)

    एक बार नवाब असफ-उद-दौला इमामबाड़ा का मुआयना करने गए और इस  व्यंजन की खुशबू से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने रसोइयों को इस डिश को शाही रसोई में बनाने की हिदायत दी। इस तरह जन्म हुआ 'दम पुख्त' पाक शैली का और इस व्यंजन को नाम मिला दम बिरयानी। इसमें 'दम' का मतलब हवा देना और 'पुख्त' का मतलब पकाना होता है।

    खबरें और भी

    गिलावटी कबाब की कहानी

    लखनऊ के मशहूर गिलावटी कबाब के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। कहा जाता है कि नवाब वाजिद अली शाह के दांत उम्र से पहले ही टूट गए थे, लेकिन कबाब खाने का उनका शौक कम नहीं हुआ था। उन्होंने अपने रसोइए से ऐसे कबाब बनाने को कहा, जो मुंह में रखते ही घुल जाएं और उन्हें चबाने की जरूरत भी न पड़े। बड़ी मशक्कत के बाद तैयार हुए गिलावटी कबाब, जो आज अवधि क्वीजीन का एक अहम हिस्सा हैं।

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    (Picture Credit- AI Generated)

    ब्रज के छप्पन भोग का इतिहास

    ब्रज क्षेत्र में ही छप्पन भोग की परंपरा शुरू हुई। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। इसी का शुक्रिया करने के लिए लोगों ने उन्हें सातों दिन के आठों पहर का भोग लगाया, जिससे 7 गुणा 8 बना 56 और इसी से कृष्ण को 56 भोग चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

    आधुनिक बदलाव और ढाबों की शुरुआत

    धीरे-धीरे भारत से राजाओं और नवाबों का राज खत्म हुआ और अंग्रेजों ने यहां अपने पांव जमा लिए। 1947 में देश के बंटवारे के बाद एक बड़ा बदलाव आया। बंटवारे के कारण हुए विस्थापन ने खानपान को भी प्रभावित किया। पैसे कमाने और राह चलते मुसाफिरों का पेट भरने के लिए कुछ लोगों ने सड़क किनारे खाना परोसना शुरू किया। इस तरह जन्म हुआ पंजाबी ढाबों का, जो आज भी उत्तर भारत के हाईवे पर बिछे हुए हैं और हमें घर जैसा स्वाद देते हैं।

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