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    दक्षिण भारत के मंदिरों में 'केसरी' प्रसाद का है खास महत्व, क्यों मानते हैं शांति और शुद्धता का प्रतीक

    Updated: Thu, 13 Nov 2025 09:26 AM (IST)

    दक्षिण भारत के मंदिरों में केसरी प्रसाद का बेहद खास महत्व होता है। पूजा के बाद भक्तों में केसरी प्रसाद (Kesari Prasad) का वितरण होता है। लेकिन क्या आप ...और पढ़ें

    केसरी प्रसाद का है बेहद खास महत्व (Picture Courtesy: Instagram)

    केसरी प्रसाद का है बेहद खास महत्व (Picture Courtesy: Instagram)

    HighLights

    1. दक्षिण भारत के मंदिरों में केसरी प्रसाद का काफी महत्व है

    2. केसरी शब्द केसर से आया है

    3. इसे शुद्धता और आंतरिक शांति का प्रतीक माना जाता है

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दक्षिण भारत के मंदिरों में पूजा के बाद भक्तों को जो मीठा प्रसाद दिया जाता है, वह केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि भक्ति और परंपरा का प्रतीक होता है। इसमें सबसे प्रमुख प्रसाद है ‘केसरी प्रसाद’, जिसे श्रद्धा से भगवान को अर्पित किया जाता है और फिर भक्तों में बांटा जाता है। 

    यह प्रसाद न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि अपने रंग, सुगंध और महत्व (Kesari Prasad Spiritual Meaning) से भी लिए जाना जाता है। आइए जानते हैं कि क्यों इस प्रसाद को केसरी कहा जाता है और इसका महत्व क्या है? 

    Kesari Prasad

    (Picture Courtesy: Instagram)

    ‘केसरी’ नाम के पीछे की कहानी

    ‘केसरी’ शब्द ‘केसर’ से निकला है, जिसका अर्थ है सुनहरा या नारंगी रंग। इस रंग का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है। केसर या कभी-कभी हल्दी से इसे पीला-नारंगी रंग दिया जाता है, जो ऊर्जा, शुद्धता और शुभता का प्रतीक है। दक्षिण भारत के मंदिरों में यह रंग भक्ति और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस प्रसाद को केसरी कहा जाता है।

    आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर में इसे केसरी पोंगल या सूजी केसरी के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा तमिलनाडु के वेंकटेश्वर मंदिर, मुरुगन मंदिर, अय्यप्पा मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर और कर्नाटक के महालक्ष्मी मंदिरों में भी यह प्रमुख प्रसाद के रूप में तैयार किया जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है, जो आज भी वैसी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

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    कैसे बनता है केसरी प्रसाद?

    इस प्रसाद को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री का अपना धार्मिक महत्व है। इसे बनाने के लिए सूजी, घी, चीनी, केसर या हल्दी, इलायची पाउडर और काजू-किशमिश का इस्तेमाल किया जाता है।

    • सूजी और घी शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक हैं।
    • केसर या हल्दी रंग और सुगंध के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं।
    • इलायची मिठास और ताजगी का प्रतीक मानी जाती है।
    • काजू और किशमिश समृद्धि और शुभ फल का संकेत देते हैं।

    घी में सूजी को सुनहरा भूनकर जब उसमें केसर या हल्दी घोला हुआ पानी और चीनी मिलाई जाती है, तो इसकी सुगंध मंदिर के वातावरण को भक्ति में सराबोर कर देती है। यह प्रसाद स्वाद के साथ-साथ श्रद्धा का अनुभव भी कराता है।

    Kesari Prasad (1)

    (Picture Courtesy: Instagram)

    केसरिया खीर

    दक्षिण भारत के कई मंदिरों में केसरिया खीर भी भोग के रूप में बनाई जाती है। इसमें दूध, चावल, केसर और मेवों का इस्तेमाल होता है। इसका सुनहरा रंग और स्वाद भक्तों के लिए आंतरिक शांति और प्रसन्नता का प्रतीक बन जाता है।

    • हर घटक में छिपा है आध्यात्मिक अर्थ
    • केसरी प्रसाद सिर्फ खाना नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रतीक है।
    • केसर का रंग आध्यात्मिक चेतना और ऊर्जा का प्रतीक है।
    • घी और सूजी संयम, शुद्धता और सादगी का संदेश देते हैं।
    • मीठा स्वाद भक्ति की मधुरता और आंतरिक शांति को दर्शाता है।

    माना जाता है कि केसरी प्रसाद भगवान को प्रसन्न करता है और घर में सौभाग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। शायद यही कारण है कि दक्षिण भारत के हर मंदिर में पूजा का केसरी प्रसाद बांटने के साथ ही पूरी मानी जाती है।