क्या आपका बच्चा भी हर वक्त फोन में लगा रहता है? हो सकता है ऑटिज्म का शुरुआती संकेत
एम्स, दिल्ली के ताजा अध्ययन के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार का खतरा भी बढ़ सकता है। ...और पढ़ें
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बच्चों का बढ़ता 'स्क्रीन टाइम' और ऑटिज्म का खतरा (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बच्चों के लिए सबसे जरूरी इंसानी जुड़ाव, प्यार, बातचीत की जगह स्क्रीन लेती जा रही है। उनके जीवन से कहानियां, परिवार के साथ अधिक से वक्त बिताना, खेलना, छूकर किसी चीज को देखना, उन अनुभवों से सीखना आदि कम होता जा रहा है।
डॉ. शेफाली गुलाटी (प्रभारी, बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग, एम्स, दिल्ली) बताती हैं कि स्क्रीन टाइम बढ़ता जाना उनमें आटिज्म के लक्षण उभरने का एक कारण हो सकता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण है कि आटिज्म का कोई एक कारण नहीं होता।
यह एक जटिल चीज है जिसमें आनुवंशिक, पर्यावरणीय और जीवनशैली संबंधी कारक शामिल हैं। पर जिस तरह से आटिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं वहां एम्स में इस बाबत हुए अध्ययन सचेत करते हैं। इससे पता चलता है कि कम उम्र में अधिक स्क्रीन टाइम बिताने वाले बच्चों में बाद में आटिज्म से संबंधित लक्षण दिखने की संभावना अधिक हो सकती है।
क्या है आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार?
आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार एक तंत्रिका विकास संबंधी स्थिति है जो बच्चे के सामाजिक मेलजोल और बातचीत को प्रभावित करती है। ऐसे में यदि जन्म के पहले वर्ष में बच्चे के साथ मानवीय स्पर्श व संवाद के बजाय मशीनी संवाद यानी मोबाइल के साथ जुड़ाव हो जाए तो उनके व्यवहार पैटर्न में बदलाव होने की संभावना प्रबल हो सकती है। एम्स में हुआ हालिया यह अध्ययन इस बात को पुष्ट करता है कि शुरुआती वर्षों में बच्चों को स्क्रीन से कहीं अधिक मानवीय जुड़ाव की आवश्यकता होती है।
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आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार के शिकार बच्चे खिलौने से सामान्य तरीके से नहीं खेलते बल्कि वे उनके कुछ हिस्सों पर गहराई से ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। यहां 'स्पेक्ट्रम' शब्द पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि हर बच्चा अलग है। उनमें एक जैसे लक्षण नहीं दिखते हैं, और उनकी गंभीरता भी एकदम भिन्न होती है।
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(Picture Courtesy: Freepik
पहले हजार दिन महत्वपूर्ण
एम्स के ताजा अध्ययन के अनुसार, छोटे बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है। इस समय स्क्रीन टाइम से जुड़ाव उन्हें गंभीरता से प्रभावित कर सकता है। हालांकि स्क्रीन टाइम आटिज्म का कोई एक कारण नहीं है पर यह इस विकार एक अहम कारक जरूर बन सकता है।
आज बच्चों को शुरू से ही स्वाभाविक परिवेश से दूर कर दिया जाता है, वे ही सहज ही स्क्रीन की दुनिया से जोड़ दिए जा रहे हैं। यह उनके मस्तिष्कीय विकास में बड़ी बाधा बन रही है। दरअसल, बच्चे जीवन के पहले कुछ वर्ष, विशेषकर पहले 1,000 दिन, वे समय होते हैं जब उनका मस्तिष्क कोई चीज आसानी से ग्रहण कर लेता है। इसी उम्र में उनमें कुछ लक्षण उभर सकते हैं।
इस समय आटिज्म के लक्षण भी पहचाने जा सकते हैं। यदि उस समय आटिज्म की पहचान हो जाए तो उसका समाधान भी जल्द शुरू हो सकता है। अध्ययन के अनुसार, 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना अच्छा रहता है।
इन संकेतों पर गौर करें
तीन वर्ष की आयु के बाद, मस्तिष्क में पैटर्न अधिक स्थिर हो जाते हैं, जिससे परिवर्तन करना कठिन हो जाता है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चे के कुछ शुरुआती संकेत पर ध्यान देना चाहिए।
आंखों से संपर्क न करना, नाम पुकारने में प्रतिक्रिया न देना, बोलने में देरी हो या जो कौशल सीखा है उन्हे भूल जाना आदि। ये कुछ ऐसे संकेत हैं जो आटिज्म को पहचाने में सहायक हो सकते हैं।