सिर पर 108 जलते दीये और पैरों में थिरकन! ब्रज का चरकुला नृत्य देख रह जाएंगे दंग
हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के लोकनृत्य प्रचलित है। ऐसा ही एक नृत्य ब्रज का चरकुला नृत्य ...और पढ़ें

ब्रज का खास चरकुला लोकनृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत पूरी दुनिया में अपनी लोक संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां हर एक राज्य की अपनी एक खास लोककला है। ऐसी ही एक लोककला ब्रज की भूमि से जुड़ी हुई है, जिसे चरकुला नृत्य कहा जाता है। यह सिर्फ एक लोक नृत्य नहीं है, बल्कि इसमें भक्ति और संस्कृति के साथ-साथ कला का अद्भुत संगम भी देखने को मिलता है।
ब्रज का खास चरकुला लोकनृत्य
चरकुला मथुरा वृंदावन की ब्रज भूमि का बेहद लोकप्रिय लोकनृत्य है जिसे महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसकी शुरुआत ब्रज में गोवर्धन के पास स्थित मुखराई गांव से मानी जाती है। यह वही स्थान है जो राधा रानी के ननिहाल के नाम से लोगों के बीच लोकप्रिय है।
क्या है 108 दीयों वाले चरकुला के नाम का रहस्य
चरकुला शब्द चक्र से आया है जिसका मतलब है पहिया या गोल दिखने वाली आकृति। इसमें सबसे निचला हिस्सा गोल आकार का होता है, यही सिर के ऊपर बेस की तरह काम करता है। फिर इसके ऊपर पिरामिड के आकार में 108 दीयों की एक पूरी श्रृंखला रखी जाती है।
राधा रानी के जन्म से जुड़ी है पौराणिक कहानी
ऐसी मान्यता है कि जब राजा वृषभानु और माता कीर्तिदा के घर में राधा रानी का जन्म हुआ तो उनकी नानी मुखरा ने खुशी के मारे अपने सिर पर रथ का पहिया रख लिया और उसमें दीपों को जलाकर फिर नृत्य भी किया। तभी से चरकुला लोकनृत्य की परंपरा यहां शुरू हुई।
गोवर्धन लीला से भी सबंध
एक किंवदंती भगवान श्री कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने से जुड़ी हुई है, इसे गोवर्धन लीला भी कहते हैं। भगवान कृष्ण ने गांव वालों को इंद्र देव के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। चरकुला को इसी पर्वत का प्रतीक भी बताया जाता है, जिसे नर्तकियां प्रतीक के तौर पर दिखाती हैं।
कैसे किया जाता है यह लोकनृत्य?
यह नृत्य घूंघट ओढ़े महिलाओं द्वारा किया जाता है। जिसमें वो अपने सिर पर एक बड़ा सा गोल आधार रखकर पिरामिड की आकार की लकड़ी का संतुलन बनाती हैं। इसके बाद रसिया की लय पर राधा कृष्ण की भक्ति में यह नृत्य किया जाता है।
ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते हैं सभी
गांव में सभी लोग विशेष मौकों पर भक्ति रस में डूबते हुए ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते हैं। इसमें कई और वाद्य यंत्र भी उपयोग में लाए जाते हैं, इनमें अलगोजा, पीतल की थाली, बांसुरी, हारमोनियम, करताल और मंजीरा शामिल है।
