खंभे की चोटी पर पेट के बल घूमकर होता है ये गढ़वाली डांस, देवभूमि के इस हैरतअंगेज नृत्य को देखकर थम जाएंगी सांसें
देवभूमि उत्तराखंड का एक बेहद अनोखा नृत्य है, जिसमें कलाकार खंभे पर पेट के बल घूमकर डांस करते हैं।

उत्तराखंड का करतब दिखाने वाला लांगवीर नृत्य (Image Source: AI Generated)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड का एक गढ़वाली डांस ऐसा भी है, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं। हम अक्सर देवभूमि के बर्फीले पहाड़ों की बात करते हैं, जबकि यहां की संस्कृति के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आइए आपको उत्तराखंड के इसी अनोखे लांगवीर लोकनृत्य के बारे में विस्तार से बताते हैं।
उत्तराखंड का करतब दिखाने वाला लांगवीर नृत्य
लांगवीर उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र का पारंपरिक लोकनृत्य है, जो सामान्य नाचने की शैली से बहुत अलग है। यहां की स्थानीय भाषा में लांग का मतलब बांस या लकड़ी से बना खंभा है, तो वहीं वीर इसके नाम के आगे इस नृत्य के साहसी करतब की वजह से जुड़ा है। दरअसल, यह नृत्य जामीन पर न करके ऊंचे बांस के खंभे पर चढ़कर किया जाता है।
कैसे किया जाता है नृत्य?
यह पारंपरिक नृत्य केवल पुरुष नर्तक ही करते हैं। इसके लिए पुरुषों का एक समूह खंभे के पोल पर खड़े होता है। फिर पेट के संतुलन बनाते हुए साहसी कलाबाजियां दिखाई जाती हैं। इन जोखिम भरे स्टंट्स को देखकर माहौल एकदम रोमांचक हो जाता है, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे तक खड़े हो सकते हैं।
बैलेंस बनाकर घूमने की कला सबसे आकर्षक
आप जिस दृश्य की कल्पना भी नहीं कर सकते, उसे नर्तक इस लांगवीर नृत्य में करके दिखा देते हैं। इस नृत्य का सबसे आकर्षक क्षण वो हिस्सा होता है, जब कलाकार खंभे के शीर्ष पर पेट के बाल लगातार घूमना शुरू करते हैं। इस दौरान उनके दोनों हाथ और पैर का कोई सहारा नहीं होता, वो हवा में होते हैं।
फिर जैसे-जैसे ढोल-दमाऊ की थाप तेज होती जाती है, रोटेशन की गति भी बढ़ती जाती है। यहां जान लेने वाली बात यह है कि नर्तक जिस खंभे पर घूमते हैं, उसका सबसे ऊपरी सिरा चिकना और गोल आकार का होता है।
देवताओं को खुश करने के लिए करते हैं करतब
लांगवीर नृत्य का संबंध देवभूमि के त्योहारों से है, इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि साहसी करतब से देवता प्रसन्न होते हैं और बुरी शक्तियों से उनकी रक्षा करते हैं। दरअसल, यहां नर्तक की मार्शल आर्ट उसकी शारीरिक तपस्या और आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी हुई है। यही वजह है सदियों से टिहरी गढ़वाल क्षेत्र के पुरुष इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।
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