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    श्रीनाथजी की हवेली से लेकर आधुनिक सजावट तक, पढ़िए पिछवाई कला का अनोखा सफर

    Updated: Sun, 22 Feb 2026 01:12 PM (IST)

    17वीं शताब्दी में राजस्थान में आरंभ हुई भक्ति कला पिछवाई में मेवाड़ शैली और दक्षिण भारतीय ‘दक्खिनी’ शैली का मिश्रण देखने को मिलता है। ...और पढ़ें

    राजस्थानी और मेवाड़ शैली से प्रभावित है यह कला

    राजस्थानी और मेवाड़ शैली से प्रभावित है यह कला

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पिछवाई एक भक्ति परंपरा की विधा है। इस कला में कपड़े पर पूजन हेतु चित्र बनाकर देवताओं के विग्रह के पीछे लटकाया जाता है। पिछवाई का अर्थ होता है ‘जो पीछे लटकाई जाए’। इसका प्रारंभ सत्रहवीं शताब्दी में तत्कालीन उदयपुर राज्य स्थित नाथद्वारा नामक नगर के नाथद्वारा मंदिर से हुआ।

    इस मंदिर में भगवान कृष्ण की एक मूर्ति स्थापित है, जिसे मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में मथुरा से यहां लाया गया था। तत्पश्चात मेवाड़ के महाराजा राज सिंह के संरक्षण में यह मंदिर ‘श्रीनाथजी की हवेली’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समय बीतने पर श्रीनाथजी मंदिर पुष्टिमार्ग नामक वैष्णव संप्रदाय के मानने वालों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन गया, जिसके अनुयायी भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की उपासना करते हैं। 

    Pacchai Art

    कलाकारों ने दिखाई कला

    मंदिर के लोकार्पण के बाद कोटा एवं किशनगढ़ के कई कलाकार इसकी चित्रशाला में काम करने आए। इसी कारण पिछवाई चित्रों में राजस्थानी चित्रकला शैली, विशेषकर मेवाड़ कला परंपरा की झलक मिलती है। इसकी चित्रशाला में एक संरचित प्रणाली थी, जिसमें मुख्य कलाकार के अधीनस्थ सहायक कलाकार एवं उनके शिष्य सामूहिक रूप से कार्यरत थे।

    मुख्यत: आदि गौर, जांगिड और मेवाड़ा नामक उपजातियों के लोग इसके निर्माण से जुड़े थे। इन चित्रों पर 19वीं शताब्दी के कलाकारों के नाम भी अंकित मिले हैं। दक्षिण भारत में जब पुष्टिमार्ग के अनुयायी बसे, तो वहां ‘दक्खिनी पिछवाई’ की विशिष्ट शैली भी विकसित हुई। इसमें प्रिंटिंग, चित्रांकन, सुनहरी कारीगरी और कलमकारी- ये सभी तत्व एक साथ दिखाई देते हैं।

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    धागों की चमक देती भव्यता

    आमतौर पर पिछवाई को सूती कपड़े पर कढ़ाई, चित्रण, रंगाई या टिनसेल प्रिंटिंग जैसी विधियों से तैयार किया जाता था। कभी-कभी इसे भारी रेशमी कपड़ों एवं ब्रोकेड पर भी रचा जाता था। चित्रित पिछवाइयों में खनिज आधारित रंगों का खूब उपयोग होता था- जैसे शुद्ध सोना व चांदी से निर्मित धात्विक रंग।

    प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कार्बनिक रंगों का भी इस्तेमाल किया जाता था, जैसे कि पेड़ों से निकला लाल लाख और गाय के मूत्र से तैयार किया गया गहरा पीला रंग, जिसे ‘गोगुली’ कहते थे। हाथ से काढ़ी गई पिछवाइयां रेशमी धागों और जरी के काम से बनती थीं। सर्दी के मौसम में ठाकुरजी के विग्रह को ऊष्मा प्रदान करने हेतु ब्रोकेड की भारी पिछवाइयों का उपयोग होता था। इससे आरती के समय दृश्य को और भव्य बनाया जाता था। जब आरती की लौ इन रेशमी और धात्विक धागों पर चमक डालती, तब विग्रह का सौंदर्य और बढ़ जाता था। 

    Pacchai Art (1)

    चित्रों में दिखते नंदकिशोर

    पिछवाई चित्रों का केंद्रीय बिंदु काले पत्थर से निर्मित श्रीनाथजी होते हैं, जिनके चरणों में फूलों की माला और बाएं हाथ में गोवर्धन पर्वत उठा हुआ दिखता है। चित्रों की पृष्ठभूमि और किनारों में गोपियां (रंग-बिरंगे घाघरे पहने), हाथों की लाल छापों से सजी गायें और विमानों में उड़ते देवता जैसे अलंकरणों का प्रयोग होता है। इन चित्रों में हरियाली से भरा, ग्रामीण जीवन का दृश्य रचा जाता है, क्योंकि ये कृष्ण के बचपन को मथुरा, ब्रज और वृंदावन की पृष्ठभूमि में दर्शाते हैं।

    चित्रों में नाचते मोर, खिले कमल, केले और आम के झूमते पेड़, चरती हुई गायें और ग्वाले आम तौर पर मौजूद रहते हैं। हालांकि ये चित्र श्रीकृष्ण के बाल-स्वरूप से अपनी मूल भक्ति भावना बनाए रखते हैं और शैलीगत रूप से उसी से प्रेरित हैं, फिर भी आगे चलकर इस परंपरा पर राजा रवि वर्मा जैसे कलाकारों द्वारा अपनाई गई यथार्थवादी दृश्य शैली और फोटोग्राफी जैसी नई तकनीकों का भी प्रभाव पड़ा।

    इसके अलावा पिछवाइयों में जिन दृश्यों का सबसे अधिक चित्रण किया गया है, उनमें श्रीकृष्ण को उनकी मां यशोदा द्वारा झूले में झुलाया जाना, रासलीला के दृश्य- जहां कृष्ण गोपियों से घिरे होते हैं- और शरद पूर्णिमा के उत्सव प्रमुख हैं, जिसमें पूर्णिमा का चंद्रमा ऊपर धूसर रंग के गोल घेरे के रूप में दर्शाया जाता है। मानसून के महीनों में मोरकुटी और वर्षा/वृक्षाचारी पिछवाइयां प्रदर्शित की जाती हैं। मोरकुटी में नाचते हुए मोरों को चित्रित किया जाता है, जो कृष्ण की रासलीला की छवि प्रतीत होती हैं। वृक्षाचारी पिछवाइयों में कृष्ण को प्रतीकात्मक रूप से वृक्षवासी के रूप में दर्शाया जाता है- जहां वे कदंब के पेड़ के रूप में प्रकट होते हैं। गोपियां उस वृक्ष के दोनों ओर खड़ी होती हैं और उनके स्वागत के लिए हार, पंखा और चामरों के साथ प्रतीक्षा करती हैं।

    Pichhvai Art (1)

    चित्रसेवा से बढ़ी लोकप्रियता

    बहुत ही कम पिछवाइयों पर तिथि अंकित होती है। अब तक ज्ञात शुरुआती उदाहरणों में से नाथद्वारा की एक पिछवाई है, जो लगभग 1846 ईसवीं की मानी जाती है और जिसमें आरती का दृश्य चित्रित है। प्रारंभिक दौर में जो चित्र पीछे दीवार पर टांगे जाते, उनके केंद्र में एक जगह खाली छोड़ी जाती थी, ताकि वहां श्रीनाथजी की मूर्ति को स्थापित किया जा सके।

    बाद में जब चित्रसेवा की धारणा प्रमुख हुई, तो उपासना हेतु, चित्रों में श्रीनाथजी को भी शामिल किया जाने लगा। श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के बाद ऐसे चित्रों को अपने घर ले जाकर पूजन हेतु स्मृति-चिन्ह के रूप में रखना चाहते थे। इसी कारण से बाजार के लिए बनाए गए पिछवाइयों में भी अब भगवान की छवि को चित्रित किया जाने लगा।

    इन्हें एक जीवंत चित्र माना जाने लगा, जो श्रीकृष्ण की कथा को पुनः मंचित करता है, और इनका उपयोग न केवल व्यक्तिगत पूजा में, बल्कि त्योहारों- विशेषकर जन्माष्टमी जैसे पर्वों में भी होने लगा।आज, जहां एक ओर पिछवाई परंपरा अपने धार्मिक और अनुष्ठानिक संदर्भ में अब भी जारी है, वहीं यह पूजा-पद्धति की सीमाओं से बाहर निकलकर सजावटी चित्रों और वाल हैंगिंग्स के रूप में भी बनाई और खरीदी जाने लगी है। अब पिछवाइयों का उपयोग केवल उपासना के लिए नहीं, बल्कि सौंदर्य और सजावट के लिए भी किया जा रहा है।

    एमएपी अकादमी से साभार