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जब पुरुष पहनते हैं घुंघरू और धोती-गमछे में जमकर करते हैं डांस, पूर्वांचल के अन्य नृत्यों से ऐसे अलग है फरुआ नाच

Published: Sun, 27 Sep 2026 04:45 PM (IST)Updated: Mon, 28 Sep 2026 04:07 PM (IST)

पूर्वांचल भले ही भोजपुरी भाषी हो पर इसकी अपनी अलग संस्कृति है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है फरुआ नाच।

पूर्वांचल की मिट्टी से निकला है फरुआ नाच (Image Source: AI Generated)

पूर्वांचल की मिट्टी से निकला है फरुआ नाच (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश और बिहार की संस्कृति का जहां मेल होता है, वह पूर्वांचल क्षेत्र है। जहां भोजपुरी और अवधि के संगम से जन्मी अनोखी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। इसी का हिस्सा है पूर्वांचल में किया जाने वाला फरुआ नाच। आइए आपको इस खास लोकनृत्य के बारे में बताते हैं। 

पूर्वांचल की मिट्टी से निकला है फरुआ नाच 

पूर्वी उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाला फरुआ नाच यहां के जीवंत नृत्यों में गिना जाता है। इसे यूपी में कहीं-कहीं फरुवाही नाच के नाम से भी जाता है। कहते हैं कि यह डांस क्षेत्र के लोगों की दिनचर्या में गहराई से बसा हुआ है, जो सामूहिक खुशी और पूर्वी संस्कृति की सदियों पुरानी झलक दिखाता है। बताते चलें कि यह नाच पश्चिमी बिहार की संस्कृति का भी अहम हिस्सा है। 

कैसे किया जाता है यह नृत्य? 

इस डांस को बेहद ही ऊर्जावान तरीके से तेज कदमों के साथ थिरकते हुए किया जाता है, जिसमें अच्छे खासे शारीरिक संतुलन की आवश्यकता पड़ती है। जान लेने वाली बात यह है कि इस नृत्य को केवल पुरुष ही करते हैं। वहीं, बात करें इसमें शामिल होने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्रों की, तो इसमें खड़ताल, घुंघरू, नक्कड़ और झाल का इस्तेमाल होता है। इन्हीं की लुक धुनों पर नर्तक नाचते-गाते नजर आते हैं। 

साधारण पर पारंपरिक वेशभूषा है खास पहचान 

दूसरे नृत्यों में आपने नर्तकों को वहां की पारंपरिक वेशभूषा पहने देखा होगा, इस नृत्य में भी ऐसा ही पहनावा है पर वो बहुत ही साधारण है। दरअसल, नर्तक भारी-भरकम पहनावे के बजाय यूपी की आम पोशाक पहने दिखते हैं। उनके तन पर बनियान, कंधे या सिर पर गमछा तो देसी ठाठ के रूप में धोती होती है। वहीं, कभी-कभी नाच में गमछे का इस्तेमाल नाचते हुए प्रॉप यानी साधन की तरह भी होता है।  

शादी-त्योहारों में जान डालता है यह नाच 

पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस नाच के शुरू होने की जड़ें ही पुराने समय की शादियों और त्योहारों से जुड़ी हुई हैं। पहले के समय में खास आयोजनों में लोग लोकगीतों और नाच के माध्यम से ही अपना मनोरंजन किया करते थे। आज भी सदियों पुराने पूर्वांचल का यह डांस हर कदम पर एक कहानी कहता है।