रवींद्रनाथ टैगोर ने दिलाया भारत को साहित्य में इकलौता नोबेल, पढ़ें गुरुदेव का रोचक सफर
रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्हें 'गुरुदेव' के नाम से जाना जाता है, ने अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य को विश्वभर में पहचान ...और पढ़ें

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर: साहित्य में भारत का इकलौता नोबेल पुरस्कार विजेता (Picture Credit- Instagram)
HighLights
रवींद्रनाथ टैगोर ने साहित्य में भारत को पहला नोबेल दिलाया
उनकी कालजयी कृति 'गीतांजलि' के लिए सम्मान मिला
उन्होंने प्रकृति के बीच शिक्षा के लिए शांतिनिकेतन स्थापित किया
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के इतिहास में कई ऐसे व्यक्तियों का नाम दर्ज हैं, जिन्होंने इस देश की नींव को मजबूत बनाने में अहम योगदान दिया है। रवींद्रनाथ टैगोर इन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से साहित्य की दुनिया में एक अलग आयाम हासिल किया।
वह सिर्फ एक कवि या लेखक नहीं, बल्कि संगीत, दर्शन, चित्रकला और मानवता का एक ऐसा संगम थे, जिन्होंने भारतीय साहित्य को दुनियाभर एक नई पहचान दी। आज देश के इस अमूल्य रत्न का जन्मदिवस है और इस मौके पर आज जानेंगे कैसे गुरुदेव के नाम से मशहूर टैगोर ने भारत को साहित्य में इकलौता नोबेल प्राइज दिलाया था।
बचपन से था कविता का शौक
7 मई, 1861 को कोलकाता के प्रसिद्ध जोरासांको टैगोर बाड़ी में जन्मे रवीन्द्रनाथ का मन कभी स्कूल की बंद दीवारों में लगा ही नहीं। इसलिए वे अक्सर स्कूल से बोर होने पर घर की छत या बगीचे में वक्त बिताना पसंद करते थे और यहीं से प्रकृति उनकी पहली गुरु बनी।
उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर के साथ उन्होंने अपना ज्यादातर समय हिमालय की गोद में बिताया। यही कारण था कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण बंगाल की नदियां, हरे-भरे खेत और आम इंसान का सरल जीवन साफ नजर आता था।
शिक्षा और साहित्य का सफर
टैगोर की शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई, जहां उन्होंने बंगाली, संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य को समझा। बाद में वकालत पढ़ने के लिए वह लंदन गए और भारत लौटने के बाद उन्होंने साहित्य पर ही फोकस किया। महज 16 साल की उम्र में उन्होंने 'भानुसिंह' उपनाम से कविताएं लिखीं, जिन्हें पढ़कर लोगों को लगा कि ये किसी प्राचीन सिद्ध कवि की रचनाएं हैं।
साहित्य में भारत का पहला नोबेल पुरस्कार
रवीन्द्रनाथ टैगोर एशिया के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार (1913) मिला। यह सम्मान उन्हें उनकी कालजयी कृति 'गीतांजलि' के लिए दिया गया था। टैगोर का मानना था कि शिक्षा बंद कमरों में नहीं, बल्कि प्रकृति के खुले वातावरण में होनी चाहिए।
इसी सोच के साथ उन्होंने 1901 में बीरभूम (पश्चिम बंगाल) में 'शांति निकेतन' की नींव रखी। यहां बच्चे पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ते थे। यही छोटा-सा स्कूल बाद में 'विश्व भारती विश्वविद्यालय' बना, जो आज भी भारतीय संस्कृति और शिक्षा का एक महान केंद्र है।
टैगोर आज हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे 2000 से ज्यादा गीत, उपन्यास और हमारा राष्ट्रगान हमेशा हमें यह एहसास दिलाते रहेंगे कि मानवता और कला की कोई सीमा नहीं होती।
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