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    जब संगीत के सुरों ने लिया रंगों का रूप! जानें भारतीय इतिहास की इस दुर्लभ 'रागमाला' कला के बारे में

    Updated: Sat, 30 May 2026 08:03 PM (IST)

    अगर आप किसी राग की तान को देख पाते, तो वह कैसी दिखती? रागमाला चित्रकला भारतीय इतिहास का ऐसा ही जादुई पन्ना है, जहां रंगों व रेखाओं के जरिए कैनवस पर उत ...और पढ़ें

    रागमाला चित्रकला: भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला का अद्भुत संगम (Picture Credit- Map Academy)

    रागमाला चित्रकला: भारतीय शास्त्रीय संगीत और कला का अद्भुत संगम (Picture Credit- Map Academy)

    HighLights

    1. रागमाला चित्रकला संगीत के सुरों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करती है

    2. इसे राजपूत और दक्कनी दरबारों का महत्वपूर्ण संरक्षण प्राप्त था

    3. राग-रागिनियां प्रेम, भक्ति और मानवीय भावों को दर्शाती हैं

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली।  लघुचित्रों के एक क्रम के रूप में रागमाला भारतीय शास्त्रीय संगीत के छह रागों तथा उनसे निकली रागिनियों के दृश्य रूप को प्रस्तुत करती है। रागमाला का शाब्दिक अर्थ है- रागों की माला, जो रागों और रागिनियों के संगीतात्मक और चित्रात्मक, दोनों रूपों की ओर संकेत करता है। 

    सुरों और रंगों का मिलन  

    रागमाला चित्रों का निर्माण 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ, जबकि स्वयं रागों का प्रयोग भारतीय शास्त्रीय संगीत में  पांचवीं शताब्दी ईस्वी से होता आ रहा है। इन चित्रों के प्रमुख संरक्षक वर्तमान राजस्थान के राजपूत दरबार थे, जहां रागमाला-समूह लघुचित्र परंपरा के भीतर संरक्षण का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गए। ऐतिहासिक रूप से रागमाला चित्र प्रायः 36 या उससे अधिक फोलियो के एक सेट के रूप में बनाए जाते थे और प्रत्येक के साथ एक संस्कृत पद्य या उससे जुड़े राग का उल्लेख होता था।

    राग, जिसे रागम् भी कहा जाता है, स्वरों की विशिष्ट शृंखला होती है, जो आरोह और अवरोह के निश्चित क्रम में व्यवस्थित होती है और जिसमें प्रत्येक स्वर पर बल देने का एक निर्धारित ढंग होता है, जिसे चलन कहा जाता है। प्रत्येक राग का उद्देश्य विशेष भाव या वातावरण जगाना होता है। इसी कारण उसकी संगीतात्मक संरचना का विस्तार दृश्य कलाओं सहित अन्य कला रूपों में भी किया जा सकता है।  

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    राग-रागिनियां बने नायक-नायिका  

    रागमाला में राग प्रायः ऋतुओं, मौसम के बदलावों या दिन के अलग-अलग समय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा, प्रत्येक राग का मानवीकरण एक पुरुष के रूप में किया जाता है, जिसके साथ उसकी सहचरियां (रागिनियां), पुत्रियां (रागपुत्रियां) और पुत्र (रागपुत्र) जुड़े होते हैं। ये सभी भारतीय शास्त्रीय संगीत में पाए जाने वाले रागों की आगे की व्युत्पत्तियां माने जाते हैं। अधिकांश रागमाला चित्रों में रागों और रागिनियों की सूची एक मानक रूप का पालन करती है, फिर भी कई विशिष्ट सेटों में कलात्मक स्वतंत्रता या संरक्षक की पसंद के कारण कुछ भिन्नताएं और प्रतिस्थापन भी दिखाई देते हैं।

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    जहां रागों का उद्देश्य ऋतुओं और समय के बदलाव के सार को व्यक्त करना था, वहीं रागिनियां ऐसी नायिकाएं थीं, जिनकी अलग-अलग कथाएं उन ऋतुओं या दिन के विशेष समयों में एक प्रकार का मानवीय आयाम जोड़ती थीं। यद्यपि आवश्यक नहीं कि राग और रागिनियां एक ही चित्र में साथ दिखाए जाएं, फिर भी किसी रागिनी-चित्र में किसी न किसी रूप में उस राग की उपस्थिति अनिवार्य रूप से बनी रहती थी। 

    दरबारों ने दिया सहारा 

    ऐसे रागमाला चित्रों को उन छवियों के समूह के रूप में देखा जाता था जो मानव और दैवी सत्ता के बीच प्रेम का वर्णन करते हैं और जिनसे चंचल, विषादपूर्ण, शांत या गोपनीय जैसे अनेक भाव उत्पन्न होते हैं। हरे-भरे प्राकृतिक परिवेश की पृष्ठभूमि में देव और नश्वर, प्रेम और भक्ति, इन दोनों का सम्मिलन भक्ति आंदोलन से प्रेरित उपासना-संबंधी उभरते विचारों का परिणाम था। राजपूत राज्यों के अलावा, रागमाला चित्र 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अहमदनगर और बीजापुर के दक्खिनी दरबारों के लिए भी बनाए गए। यह वह समय था जब इस क्षेत्र में सचित्र पांडुलिपियों को उदार संरक्षण मिल रहा था। विद्वानों का अनुमान है कि उत्तरी दक्खिन के हिंदू सामंतों ने भी इसी दौर में रागमाला के कुछ सेट तैयार करवाए होंगे, लेकिन 1650 तक दक्खिन में रागमाला के बहुत कम सेट बनाए जा रहे थे और उनमें से भी अनेक को राजपूत दरबारों का संरक्षण प्राप्त था।

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    इसके परिणामस्वरूप एक संकर शैली विकसित हुई, जो खास राजस्थानी दरबारों की रुचियों के अनुरूप थी, लेकिन उसमें दक्खिनी कलाकारों की कारीगरी भी बनी रही। कुछ मामलों में, रागों और रागिनियों के चेहरे, वेशभूषा और आभूषण स्पष्ट रूप से मुगल शैली के दिखाई देते हैं, जबकि वे मुगल दरबार के लिए नहीं बनाए गए थे। संभव है कि राजस्थान के आश्रित राज्यों ने मुगलों की शैली का अनुकरण करके या इन आकृतियों को मुगल शाही परिवार के सदस्यों से मिलती-जुलती शक्ल देकर, उनका अनुग्रह पाने की कोशिश की हो। 

    19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से पांडुलिपि-चित्रण एक दरबारी कला के रूप में पतन की ओर बढ़ने लगा और आज रागमाला के अधिकांश सेट दुनिया भर में बिखर चुके हैं। इनके कुछ उदाहरण न्यू यार्क, अमेरिका के मेट्रोपालिटन म्यूजियम आफ आर्ट, यूनाइटेड किंगडम के ब्रिटिश म्यूजियम और हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम सहित कई संग्रहों में मिलते हैं। 

    प्रेम और विरह के रंग

    रागमाला चित्रों में राग और रागिनी का संबंध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं रोमानी, शृंगारिक और भक्तिपरक प्रेम की पड़ताल की जाती है। 16वीं शताब्दी में पूरे उपमहाद्वीप में पांडुलिपि-चित्रण को संरक्षण मिला। यही समय भक्ति आंदोलन के उभार का भी था। परिणामस्वरूप, राजपूत चित्रकला में प्रेम व ईश्वर-भक्ति को लगभग एक-दूसरे का पर्याय मानकर चित्रित किया जाने लगा। रागमाला चित्रों का सबसे प्राचीन उपलब्ध उदाहरण 10 छवियों का समूह है, जिसमें पांच राग और पांच रागिनियां दर्शाई गई हैं।

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    ये चित्र 1475 में तैयार की गई ऐसी पांडुलिपि के हाशियों में बनाए गए थे। इनमें राग स्पष्ट रूप से दैवी आकृतियों के रूप में दिखाई देते हैं, जिनमें से दो की पहचान शिव और विष्णु के रूप में हुई है, लेकिन लगभग एक शताब्दी बाद मिलने वाले रागमाला चित्रों में राग और रागिनियां मानवीय रूपों में दिखने लगते हैं, विशेषकर ऐसे दृश्यों में जहां रागिनियां अनुपस्थित प्रियतम की प्रतीक्षा या विरह में दिखाई देती हैं।

    (सौजन्य - https://mapacademy.io