यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 08, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
Holi 2025: एमपी के इस गांव में नहीं खेली जाती होली, बच्चे हों या बूढ़े; हर कोई बांटता है दुख-दर्द
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होली (Holi 2025) की शुरुआत हो जाती है। होली से एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंग वाली ...और पढ़ें

HighLights
- दुनिया भर में होली धूमधाम से मनाई जाती है।
- इस साल 14 मार्च को होली मनाई जाएगी।
- इस त्योहार की तैयारियां जोरों से चल रहीं है।
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। होली का नाम सुनते ही रंग, गुजिया, तरह-तरह के पकवान का ख्याल ही दिमाग में आता है। इन दिनाें होली की तैयारियां जोरों से चल रही हैं। बाजार भी सज गए हैं। हर तरफ रंग-गुलाल, पिचकारी और होली पर पहने जाने वाले परिधान ही नजर आ रहे हैं। इस बार 14 फरवरी को होली मनाई जाएगी।
आपको बता दें कि होली का त्योहार खुशियों का प्रतीक माना जाता है। क्या आपने कभी सोचा है कि कोई ऐसी जगह भी हो सकती है जहां होली नहीं खेली जाती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में स्थित चोली गांव (Choli village Holi tradition) की। यहां होली बाकी जगहों से बिल्कुल अलग होती है।
सदियों से चली आ रही परंपरा
यहां होली पर रंग न खेलने की परंपरा है। ये परंपरा सदियों से चली आ रही एक खास रीति-रिवाज (Madhya Pradesh Holi customs) से जुड़ी है, जिसके चलते यहां होली का उत्सव नहीं मनाया जाता है। गौरतलब हाे कि चोली गांव को देवगढ़ के नाम से भी जाना जाता है, जो विंध्याचल पर्वत की तलहटी में बसा है।
ऐतिहासिक धरोहरों के लिए मशहूर है ये जगह
यह क्षेत्र अपने प्राचीन सिद्ध मंदिरों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए मशहूर है। गांव के बुजुर्गों ने होली पर रंग न खेलने की परंपरा शुरू की थी। यहां होली पर कोई भी व्यक्ति रंगों में नहीं डूबता। पूरे गांव में शांति बनी रहती है। लोग किसी तरह के उत्सव में शामिल नहीं होते हैं।
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अगले दिन खेली जाती होली
हालांकि, अगले दिन पूरे उल्लास के साथ होली खेली जाती है और लोग एक दूसरे को जमकर रंग लगाते हैं। चोली गांव के ग्रामीणों के अनुसार, होली सिर्फ खुशियां मनाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के साथ खड़े होने का अवसर भी है जिन्होंने अपने परिवार में किसी प्रियजन को खो दिया है।
यहीं कारण है कि होली के दिन गांव के लोग पहले उन परिवारों के घर जाते हैं, जहां किसी की मृत्यु हो गई हो। उन्हें गुलाल लगाकर सांत्वना देते हैं और उनके दुख में सहभागी बनते हैं। यह परंपरा समाज में आपसी भाईचारे और सहानुभूति को मजबूत करती है।
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इस परंपरा के जरिए ग्रामीण यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी परिवार त्योहार की खुशी से वंचित न रह पाए। उनके जीवन में फिर से सकारात्मकता लौट सके। जब ये परिवार सांत्वना पाकर अपने दुख से उबर जाते हैं, तो अगले दिन पूरे गांव में धूमधाम से होली खेली जाती है।
क्या है होली का इतिहास
खुशियों के इस त्योहार का संबंध भगवान श्री कृष्ण और भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद से जुड़ा हुआ है। होली पर्व के दिन देशभर में गुलाल और अबीर से रंगो की होली खेली जाती है और रंगोत्सव को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। रंगो के इस पवित्र त्योहार को वसंत ऋतू का संदेशवाहक भी माना जाता है।