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बिना ईयरफोन्स के नहीं सुन सकते बिहार के ये 'गारी गीत', हंसी-खुशी के बीच दूल्हे को दी जाती है भर-भरकर गालियां

Published: Wed, 16 Sep 2026 05:07 PM (IST)Updated: Fri, 18 Sep 2026 01:16 PM (IST)

बिहार में गारी गीत गाने की खास परंपरा है। इन गीतों में दूल्हे और उसके रिश्तेदारों को महिलाएं गाली देती हैं।

कैसे हुई गारी गीतों की शुरुआत? (AI Generated Image)

कैसे हुई गारी गीतों की शुरुआत? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार में हर मौके के लिए लोकगीत हैं, जिनमें गारी गीत भी शामिल हैं। इन गीतों के नाम से आप समझ सकते हैं कि इनमें गारी यानी गाली दी जाती है। शादी के मौके पर दुल्हन के घर की महिलाएं इन गीतों को गाती हैं।

अगर आप बिहार से नहीं हैं, तो गारी गीतों के बारे में सुनकर आपको हैरानी महसूस हो सकती है। लेकिन ये गीत बिहार की संस्कृति का हिस्सा हैं। इन गीतों में दी जाने वाली गालियों के पीछे अपमान की भावना नहीं, बल्कि प्रेम और हास्य छिपा होता है। आइए जानें कैसे हुई गारी गीत गाने की शुरुआत और समय के साथ ये गीत कैसे बदले। 

गारी गीत होते क्या हैं?

गारी गीत दुल्हन पक्ष की महिलाएं बारात के स्वागत और खाने के समय गाती हैं। ये किसी का अपमान करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि इनमें मीठी नोंक-झोंक होती है और व्यंग्य छिपा होता है, जैसे- देखे में पातर, खाए भर थारी, बता द बबुआ…। इन गीतों में महिलाएं समधी यानी दूल्हे के पिता, चाचा, फूफा और खुद दुल्हे पर मजाकिया तंज कसती हैं। 

गारी गीत गाने के रिवाज की कहानी

बिहार में शादी में गारी गीत जरूर गाए जाते हैं। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भी गारी गीत गाए जाते हैं। बारात जब दुल्हन के घर पहुंचती है, तब स्वागत के लिए महिलाएं गारी गीत गाती हैं और दूल्हे के रंग-रूप या कद-काठी का मजाक उड़ाती हैं। 

इसके अलावा, वर पक्ष जब खाना खाने बैठता है, तब मुख्य रूप से गारी गीत गाया जाता है। महिलाएं दूर बैठकर या पर्दे के पीछे से समधी को निशाना बनाते हुए गारी गीत गाती हैं, जैसे-

राजा दशरथ जी कईलन होशियारी

एकटा मरद पर तीन-तीन गो नारी

बता द बबुआ…।

कैसे गाया जाता है गारी गीत?

गारी गीत कभी भी अकेले नहीं गाया जाता। इसे महिलाएं हमेशा समूह में गाती हैं। ढोलक या थाली की थाप पर महिलाएं एक साथ एक सुर में गारी गीत गाना शुरू करती हैं और दूल्हे के संबंधियों पर बारी-बारी से तंज कसती हैं या उनका मजाक उड़ाती हैं। इन गीतों में दुल्हे की मां और बहन का भी मजाक उड़ाया जाता है।  

कैसे हुई गारी गीतों की शुरुआत?

गारी गीतों की परंपरा काफी पुरानी है और इसे सीता विवाह से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम जब माता सीता से विवाह करने मिथिला पहुंचे, तो वहां की महिलाओं ने समधी दशरथ और वर पक्ष के लोगों का स्वागत ऐसे ही तंज भरे गीतों को गाकर किया था, जैसे-

राम जी से पूछे, जनकपुर के नारी

बता द बबुआ, लोगवा देत काहे गारी

बता द बबुआ...।

माना जाता है कि भगवान राम ने इन गीतों का आनंद लिया था और तभी से गारी गीत गाने की परंपरा शुरू हुई। धीरे-धीरे मिथिला से शुरू होकर ये परंपरा पूरे बिहार में पहुंच गई। 

समय के साथ कैसे बदला गारी गीत?

गारी गीतों की शुरुआत शादी-ब्याह के मौके में माहौल को हंसी-मजाक से हल्का बनाने के लिए की गई थी। हालांकि, समय के साथ इन गीतों में काफी बदलाव भी आए हैं। कई जगहों पर गारी गीतों में महिलाएं वर पक्ष के लिए काफी अपशब्द और असली गालियों का भी इस्तेमाल करती हैं। जबकि शुरुआत में ऐसा नहीं था।

इन गीतों को शुरुआत में सिर्फ मजाक उड़ाने या तंज कसने के लिए बनाया जाता था। अपशब्दों के इस्तेमाल के कारण अब दूसरे क्षेत्रों में गारी गीतों को बुरा माना जाने लगा है, लेकिन पुराने गारी गीत काफी मजेदार और मीठी तकरार से भरे होते थे।  


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