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    स्क्रीन टाइम नहीं, पेरेंट्स की चुप्पी बना रही बच्चों को बीमार; कहीं आप भी तो नहीं कर रहे यह गलती?

    Updated: Wed, 11 Feb 2026 04:50 PM (IST)

    माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि अपने बच्चों का टीवी या मोबाइल पर बिताया जाने वाला समय को कैसे कम किया जाए। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि स्क्रीन टाइम से ...और पढ़ें

    स्क्रीन टाइम नहीं, माता-पिता की ये गलती बच्चों को बना रही है मानसिक बीमार (Picture Credit- AI Generated)

    स्क्रीन टाइम नहीं, माता-पिता की ये गलती बच्चों को बना रही है मानसिक बीमार (Picture Credit- AI Generated)

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों के मोबाइल और टीवी देखने को लेकर परेशान रहते हैं। उन्हें लगता है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम ही बच्चों के बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह है, लेकिन एक और समस्या है, जो चुपचाप बच्चों को नुकसान पहुंचा रही है। इसे कहा जाता है ‘नो टॉक टाइम’।

    क्या आप जानते हैं कि स्क्रीन टाइम से ज्यादा खतरनाक नो टॉक टाइम है, जो बच्चों पर मेंटली और इमोशनली रूप से प्रभाव डाल सकता है। आइए जानते हैं इसके बारे में।

    क्या है नो टॉक टाइम?

    जब माता-पिता और बच्चे एक ही घर में हों, लेकिन आपस में बातचीत बहुत कम हो जाए या बिल्कुल न हो, तो उसे नो टॉक टाइम कहते हैं। कई पेरेंट्स खाना खाते समय या सोने से पहले भी फोन, लैपटॉप,  काम या टीवी में बिजी रहते हैं और बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते, जिससे बच्चे अपने इमोशन्स शेयर नहीं कर पाते और न ही उनके सवालों का जवाब मिलता है।

    इसलिए वह अकेलेपन में मोबाइल का सहारा लेने लगते हैं। इसका असर धीरे-धीरे उनके मन, व्यवहार और पढ़ाई पर दिखने लगता है। चलिए जानते हैं नो टॉक टाइम के कुछ नुकसानों के बारे में।

    1. रिश्तों पर असर

    बच्चों को बातचीत और प्यार की जरूरत होती है। जब बच्चों के साथ बातचीत नहीं होती, तो उन्हें लगता है कि उनके इमोशन्स और जरूरतों की कोई परवाह नहीं करता और वह खुद को अकेला महसूस करने लगता है, जिससे बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

    वहीं, रिश्ता कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, पेरेंट्स को बच्चे के लाइफ में क्या चल रहा है क्या नहीं, इसके बारे में भी उन्हें कुछ नहीं पता चल पाता, जिससे बच्चे को नए दोस्त बनाने या पुराने रिश्ते निभाने में भी परेशानी आती है।  

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    2. इमोशन्स पर असर

    नो टॉक टाइम के कारण बच्चे लंबे समय तक माता-पिता से कट हुए रहते हैं, जिससे उनमें कॉन्फिडेंस धीरे-धीरे कम होने लगता है। वह अपने पेरेंट्स से सवाल पूछने, सलाह लेने या अपने विचार शेयर करने से भी डरने लगते हैं। इसका सीधा असर उनके जीवन पर काफी पड़ता है, जिससे स्कूल में पढ़ाई और दोस्तों से बातचीत में उन्हें परेशानी महसूस हो सकती है।

    साथ ही, अपने इमोशन्स को शेयर न कर पाने के कारण बच्चे अपने अंदर ही अंदर गुस्सा जमा कर लेते हैं। यह छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, झगड़े या नेगेटिव बिहेवियर के तौर पर बाहर निकलता है।

    3. सोचने और सीखने पर असर

    बच्चे बढ़ती उम्र के साथ-साथ नई चीजें सीखते हैं, लेकिन अगर माता-पिता अपने बच्चे से कटकर रहते हैं, तो उन्हें सही सलाह दे नहीं पाते, जिससे बच्चे में नई चीज को सीखने और समझने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

    साथ ही, उनका थिंकिंग प्रोसेस भी स्लो हो सकता है, जिससे वह अपनी बात किसी के सामने ठीक से नहीं रखना सीख पाते हैं और सही और गलत की भी पहचान करने में भी परेशानी आती है।

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    (Picture Credit- AI Generated)

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