यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 21, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्वाद हो जाता है दोगुना जब व्यंजनों में लगता है इससे छौंक, काली हो पीली हर एक दाना है खास
स्वाद को दोगुना बना देता है व्यंजन में लगा छौंक। तो वहीं इस छौंक से स्वाद बढ़ाने में मदद करते ...और पढ़ें

पुष्पेश पंत
सरसों का तेल, जिसे कड़वा तेल भी कहा जाता है, तीखा और चरपरा होता है। यह मूंगफली-तिल या नारियल के तेल जैसा मीठा नहीं होता। राई का बघार लगाने से भी मिर्च जैसे तीखेपन का एहसास होता है और शायद इसीलिए बुरी नजर उतारने के लिए या किसी टोटके में राई परखी जाती रही है। बहरहाल हम राई और सरसों के मसाले के रूप में इस्तेमाल पर जिक्र कर रहे हैं।
हिसाब में हिस्सेदारी
राई-सरसों के अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों में भी मिले हैं जिनसे पता चलता है कि इसका उपयोग ईसा के जन्म से अठारह सौ वर्ष पहले भारत में होता था। वनस्पतिशास्त्रियों के अनुसार, सरसों और राई एक ही परिवार के सदस्य हैं हालांकि इनकी प्रजातियों में थोड़ा फर्क होता है। सरसों काली और पीली दो प्रकार की होती है, राई का दाना सरसों की तुलना में और छोटा होता है। गुजरे जमाने में जब एक रुपए में सोलह आने, एक आने में चार पैसे और एक पैसे में तीन पाई होती थी तो पाई से कम दाम का हिसाब कौड़ी और राई-रत्ती में होता था।
हर तड़के की जान
उत्तर भारत में आमतौर पर राई का पेड़ मुख्यत: अचारी मसालों की पंचायत के एक सदस्य के रूप में होता है। तड़के या बघार में इसका इस्तेमाल दक्षिण भारत में कही अधिक होता है। उपमा हो या रसम, नारियल की चटनी या सांभर, तड़का/बघार घी या तेल किसी को भी गर्म कर लगाया जाए, करी पत्ते और हींग की तरह राई की उपस्थिति अनिवार्य है। हाल के सालों में उपमा, पोहा आदि गंगा-जमुना के दोआब में और पूर्वांचल में भी लोकप्रिय हो चुके हैं। उत्तराखंड के गांव में राई को हरी मिर्च के साथ पीसकर जो रायता बनाया जाता है वह जापानी वसाबी की तरह सीधे नाक के जरिए सिर में चढ़ जाता है और परिणामस्वरूप आंख-नाक से पानी की धारा बहाने लगता है। पहाड़ी रायता राई के नाम को सार्थक करता नजर आता है!

पाक कौशल की कसौटी
बंगाल में राई को पीसकर कासूंदी की सॉसनुमा चटनी बनाई जाती है जिसका प्रयोग मसाले के रूप में होता है। दो पीढ़ी पहले तक नववधू का पाक कौशल इसी कसौटी पर कसा जाता था कि वह कासूंदी कैसे पीसती है। सुनने में यह काम आसान लगता है पर यदि एहतियात न बरती जाए तो कासूंदी कड़वी हो जाती है या राई का तेल निकल आता है। पूर्वी और पश्चिम बंगाल की रसोई में अलग-अलग किस्म की कासूंदी पीसी जाती रही है। दोनों ही प्रदेशों के निवासी अपनी कासूंदी को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। दिलचस्प बात यह है कि लुधियाना में रेडीमेड भारतीय शाकाहारी म्योनीस या सालसा बनाने वाली क्रीमिका कंपनी जो कासूंदी बना रही है वह सबसे अधिक नजर आती है।
स्वाद ऐसा जो हर मन भाए
बंगाल में कई ऐसे व्यंजन हैं जिन्हें सरसों के मसाले के ही साथ पकाया जाता है। सोरसे इलिच या सोरसे रूई इनमें प्रमुख हैं। पड़ोसी राज्य उड़ीसा में सरसों-राई को ही मुख्य मसाला मानकर जो व्यंजन बनाए जाते हैं उन्हें बेसार का नाम दिया जाता है। कभी बंगाल का ही हिस्सा रहा असम भी अपने खान-पान में सरसों का प्रयोग खुले हाथ से करता है। दक्षिण भारत में केरल में जो केले के पत्ते में लपेटकर बंगाल की पतूरी की याद दिलाने वाली कारीमीन पोली चट्टू बनाई जाती है उस पर जिन मसालों को लपेटा जाता है उसमें भी सरसों की प्रधानता रहती है। पारसियों के खान-पान में भी केलों के पत्तों में लपेटकर बनाई जाने वाली पतूरी में भी सरसों का ही मजा आता है।
सरसों का विदेशी स्वाद
विदेशी खान-पान में मस्टर्ड सॉस के अनेक प्रकार चखने को मिलते हैं जिनमें फ्रेंच मस्टर्ड, इंग्लिश मस्टर्ड और अमेरिकन डूजोन मस्टर्ड अधिक प्रचलित हैं। हैम बर्गर और हॉटडॉग भी या फिर सबवे के खुले सैंडविच में सबसे ऊपरी परत मस्टर्ड सॉस की ही होती है। फिरंगियों की जुबान सरसों का तीखापन बर्दाश्त नहीं कर पाती अर्थात इनका मिजाज कासूंदी की तुलना में ज्यादा नरम होता है।
(लेखक प्रख्यात खान-पान विशेषज्ञ हैं)
