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    'काम करने को तैयार कर्मचारी पर ‘नो वर्क नो पे’ लागू नहीं'; MP हाईकोर्ट का कर्मचारियों के हक में बड़ा फैसला

    Updated: Fri, 06 Mar 2026 10:45 PM (IST)

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि यदि कर्मचारी काम करने को तैयार है, लेकिन प्रशासनिक कारणों से उसे रोका जाता है, तो 'नो वर्क नो प ...और पढ़ें

    न्यायाधीश ने सुनाया अहम फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

    न्यायाधीश ने सुनाया अहम फैसला (प्रतीकात्मक चित्र)

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    डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी काम करने के लिए तैयार है, लेकिन प्रशासनिक कारणों से उसे काम नहीं करने दिया जाता, तो उस पर ‘नो वर्क नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।

    प्रशासनिक न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को बैक वेज (बकाया वेतन) सहित सेवा से जुड़े अन्य लाभ देने का आदेश दिया है।

    मामले में रीवा निवासी फॉरेस्ट गार्ड राजेश कुमार पांडे समेत अन्य कर्मचारियों ने याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 1980 में वन विभाग में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में हुई थी और उन्होंने 20 साल से अधिक समय तक सेवा दी थी।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने योग्य दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को फॉरेस्ट गार्ड के पद पर स्थायी नियुक्ति देने का निर्णय लिया था। इसके तहत चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट ने सितंबर 2008 में फॉरेस्ट गार्ड के 1500 रिक्त पदों के लिए अधिसूचना जारी की थी, जिनमें से 1006 पद योग्य अभ्यर्थियों से भरे जाने थे।

    अपीलकर्ताओं ने नियमानुसार आवेदन किया और लिखित परीक्षा, साक्षात्कार तथा फिजिकल टेस्ट में सफल भी रहे। दस्तावेज सत्यापन के लिए निर्देश मिलने के बावजूद लंबे समय तक नियुक्ति आदेश जारी नहीं किए गए। बाद में अगस्त 2010 में उन्हें नियुक्ति पत्र दिए गए और मेडिकल व शारीरिक परीक्षण में फिट पाए जाने के बाद उन्होंने ड्यूटी जॉइन कर ली।

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    हालांकि, मात्र एक माह बाद सितंबर 2010 में उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई। इसके खिलाफ कर्मचारियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    हाई कोर्ट ने जुलाई 2011 में आदेश देते हुए कहा था कि जिला स्तर पर मेरिट सूची बनाना गलत था और राज्य स्तर पर मेरिट सूची बनाकर नियुक्ति देने के निर्देश दिए थे। बाद में युगलपीठ ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को भी सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2015 में खारिज कर दिया था।

    ताजा आदेश में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों को काम करने से रोका गया था, इसलिए ‘नो वर्क नो पे’ का सिद्धांत लागू नहीं होगा और उन्हें बैक वेज समेत सभी सेवा लाभ दिए जाएंगे।