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MP में OBC आरक्षण पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 14% ही रहेगा कोटा; 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर 3 माह में नियुक्ति के निर्देश

Published: Fri, 09 Oct 2026 04:51 PM (IST)Updated: Fri, 09 Oct 2026 08:05 PM (IST)

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत पर बरकरार रखने का बड़ा फैसला सुनाया है, 27 प्रतिशत ...और पढ़ें

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HighLights

  1. हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत पर बरकरार रखा।

  2. 27 प्रतिशत आरक्षण संबंधी 2019 का कानून असंवैधानिक घोषित।

  3. 13 प्रतिशत रोके गए पदों पर अनारक्षितों को नियुक्ति मिलेगी।

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने पर करीब सात वर्ष पहले शुरू हुई कानूनी लड़ाई पर शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया। कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत करने संबंधी वर्ष 2019 के अध्यादेश और संशोधन कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। कांग्रेस की कमल नाथ सरकार ने यह कानून बनाया था।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत ही रहेगा। न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ ने इस मामले के लंबित रहने के कारण भर्ती प्रक्रियाओं में रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को तीन महीने के भीतर नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। इनकी प्रतीक्षा सूची पहले से तैयार है।

50 प्रतिशत की सीमा पार करने का मजबूत आधार नहीं

हाई कोर्ट ने विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल प्रकरणों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण की कुल 50 प्रतिशत सीमा का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में इसे पार करने वाली कोई असाधारण परिस्थिति स्थापित नहीं हुई। यह विवाद ओबीसी को आरक्षण देने का नहीं, बल्कि आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का है। कोर्ट ने माना कि ओबीसी वर्ग 14 प्रतिशत आरक्षण पाने का हकदार है, लेकिन इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

पर्याप्त प्रतिनिधित्व और आंकड़ों पर भी विचार

हाई कोर्ट ने उपलब्ध आंकड़ों और संबंधित सामग्री का परीक्षण करते हुए लोक सेवाओं में ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व को संविधान के अनुच्छेद 16(4) के संदर्भ में पर्याप्त माना। इसमें ओबीसी आरक्षण का प्रावधान है। कोर्ट ने आरक्षण बढ़ाने के समर्थन में प्रस्तुत आधारों पर भी विचार किया। वर्ष 2019 में लिए निर्णय के लिए वर्ष 1983 की महाजन आयोग रिपोर्ट पर निर्भरता और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श नहीं किए जाने जैसे बिंदु भी महत्वपूर्ण रहे। बाद में प्रस्तुत विस्तृत रिपोर्ट को भी आरक्षण बढ़ाने के लिए पर्याप्त ठोस आधार नहीं माना गया।

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पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों को राहत

निर्णय में उन ओबीसी अभ्यर्थियों की नियुक्तियां सुरक्षित रखी गई हैं, जिन्हें आठ मार्च, 2019 से 29 सितंबर, 2022 के बीच 14 प्रतिशत से अधिक आरक्षण के आधार पर नियुक्ति मिल चुकी है। ऐसी नियुक्तियों को केवल इस फैसले के कारण प्रभावित नहीं किया जाएगा। अतिरिक्त नियुक्तियों के समायोजन के लिए आगामी तीन भर्ती अभियानों में व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं।

87:13 व्यवस्था पर भी विराम

आरक्षण विवाद के कारण 87 प्रतिशत पदों पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी, जबकि शेष 13 प्रतिशत पदों पर अंतिम निर्णय लंबित था। कोर्ट ने 29 सितंबर, 2022 के बाद की भर्ती प्रक्रियाओं में रोके गए पदों को अनारक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों से भरकर कुल पदों को 100 प्रतिशत पूरा करने का निर्देश दिया है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन मंडल और अन्य भर्ती एजेंसियों को तीन महीने में आवश्यक कार्रवाई करनी होगी।

बता दें, कमल नाथ सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध अक्षिता दुबे ने जनहित याचिका लगाई थी। बाद में अन्य याचिकाएं भी इसमें शामिल होती गईं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से ही सुनवाई करने को कहा था।