महायुति-महाविकास अघाड़ी के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई, महाराष्ट्र में गोकुल डेयरी चुनाव में सियासी घमासान
महाराष्ट्र में कोल्हापुर की गोकुल डेयरी का चुनाव अब महज एक सहकारी संस्था का अध्यक्ष चयन नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ महायुति ...और पढ़ें

महायुति और MVA के बीच सियासी घमासान (फाइल फोटो)
HighLights
गोकुल डेयरी चुनाव बना महायुति-महाविकास आघाड़ी के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई।
सरकार के मनोनीत सदस्य नियुक्ति फैसले पर विपक्ष ने जनादेश चोरी का आरोप।
पश्चिमी महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति में गोकुल डेयरी का गहरा प्रभाव।
ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में कोल्हापुर की गोकुल डेयरी का चुनाव अब महज एक सहकारी संस्था के अध्यक्ष के चयन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बहाने राज्य में सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी महाविकास अघाड़ी के बीच राजनीतिक वर्चस्व की नई लड़ाई छिड़ गई है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे तक के इस विवाद में कूदने और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का जवाब देना इसकी राजनीतिक अहमियत बताता है।
पांच नवंबर को राज्य मंत्रिमंडल द्वारा सहकारी संस्थाओं में सरकारी मनोनीत संचालकों की नियुक्ति का रास्ता खोलने के फैसले ने इस टकराव को नया मोड़ दे दिया है।
गोकुल डेयरी चुनाव पर राजनीतिक घमासान तेज
गोकुल डेयरी यानी कोल्हापुर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ के संचालक मंडल के चुनाव में कांग्रेस नेता सतेज पाटिल समर्थित पैनल को 13 और महायुति समर्थित पैनल को 12 सीटें मिली हैं।
इस तरह विपक्षी खेमे को एक सीट की बढ़त मिली, लेकिन अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया बहुमत और अनुपस्थिति के विवाद में उलझ गई। अब 10 नवंबर को अध्यक्ष पद का चुनाव होना है। मुंबई उच्चन्यायालय की कोल्हापुर पीठ के निर्देश के बाद 25 निर्वाचित संचालकों को बैठक के लिए नोटिस जारी किए गए हैं।
इस बीच राज्य सरकार ने 500 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक कारोबार वाली पात्र सहकारी संस्थाओं में पांच सरकारी मनोनीत सदस्य नियुक्त करने के लिए कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी है। इनमें चार विशेषज्ञ सदस्यों को मतदान का अधिकार देने का प्रस्ताव है। राजनीतिक विवाद की असली वजह यही है।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में मिले जनादेश को बदलने के लिए सरकार कानूनी रास्ता तलाश रही है। सतेज पाटिल ने इसे दूध उत्पादकों के मताधिकार और सहकारिता की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।
राहुल गांधी ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे जनादेश की चोरी करार दिया है। इसके बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पलटवार करते हुए कहा कि चुनाव में किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।
मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी के इस मामले में हस्तक्षेप करने पर भी सवाल उठाए। उधर, राज ठाकरे ने भाजपा के लोकतंत्र बचाओ मार्च पर कटाक्ष करते हुए गोकुल प्रकरण में उसके रवैये को दोहरा बताया है।
गोकुल डेयरी पर वर्चस्व वजह केवल डेयरी का आर्थिक कारोबार नहीं, बल्कि पश्चिमी महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति में उसका प्रभाव है। गोकुल हजारों दुग्ध उत्पादकों, सहकारी समितियों और ग्रामीण परिवारों से जुड़ा है। दूध खरीद, भुगतान, रोजगार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के कारण इसके संचालक मंडल का प्रभाव गांवों से लेकर जिला राजनीति तक महसूस किया जाता है।
कोल्हापुर और आसपास के इलाकों में सहकारी संस्थाएं लंबे समय से राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने और जनाधार मजबूत करने का माध्यम रही हैं। यही कारण है कि गोकुल पर नियंत्रण को महायुति और महाविकास अघाड़ी दोनों अपने राजनीतिक प्रभाव के विस्तार से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए यह पश्चिमी महाराष्ट्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए सतेज पाटिल के नेतृत्व में अपनी पारंपरिक सहकारी राजनीति बचाए रखने की चुनौती है।
गोकुल का विवाद शरद पवार की राजनीति से लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच सहकारिता क्षेत्र में चल रही पुरानी प्रतिस्पर्धा की भी याद दिलाता है।
महाराष्ट्र में चीनी मिलों, जिला बैंकों और दुग्ध संघों का नियंत्रण लंबे समय से विधानसभा और लोकसभा चुनावों के समीकरण प्रभावित करता रहा है।
ऐसे में 10 नवंबर का चुनाव केवल अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति में निर्वाचित स्थानीय नेतृत्व का दबदबा कायम रहेगा या सरकारी हस्तक्षेप के जरिए सत्ता पक्ष अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करेगा। गोकुल की लड़ाई का असर आने वाले चुनावों में पश्चिमी महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
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