युवा कौशल के उचित प्रयोग से देश को हो सकता है भारी लाभ: भागवत भागवत
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि युवाओं के कौशल का उचित उपयोग देश को 'विश्वगुरु' बना सकता है, अन्यथा वे बोझ बन जाएंगे।

युवा कौशल के उचित प्रयोग से देश को हो सकता है भारी लाभ।
HighLights
युवा कौशल का उचित उपयोग देश को 'विश्वगुरु' बनाएगा।
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक, पर संविधान का सम्मान जरूरी।
युवाओं को देश के भविष्य के लिए काम करना चाहिए।
डिजिटल डेस्क, नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि यदि युवा कौशल का उचित प्रयोग किया जाए तो इससे देश को भारी लाभ होगा। यदि उनकी क्षमता का सही उपयोग किया जाए तो देश 'विश्वगुरु' बन जाएगा। वरना वे एक भारी बोझ बन जाएंगे, क्योंकि 30 साल बाद यह पीढ़ी बूढ़ी हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि जब जनहित के मुद्दे उठाए जा रहे हों तो विरोध और आंदोलन लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा होते हैं। संविधान या देश के कानूनों को नुकसान पहुंचाए बिना बातचीत और बहस जारी रहनी चाहिए। नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में आयोजित एक कार्यक्रम में वह युवाओं को संबोधित कर रहे थे।
भागवत ने कहा कि 30 साल बाद युवा बूढ़े हो जाएंगे। उन्हें सलाह दी कि वे केवल अपने बारे में न सोचें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों के प्रति भी संवेदनशील रहें। उन्होंने युवाओं से हिम्मत रखने और आत्मविश्वास के साथ भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना करने का आग्रह किया।
कहा कि उन्हें अपनी किस्मत के साथ ही देश की किस्मत संवारने के लिए भी काम करना चाहिए। उन्होंने कस्तूरचंद पार्क में नगर निगम के सहयोग से लगाए गए 200 फीट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को भी फहराया।
उन्होंने कहा कि युवा एक 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) हैं। यदि इन्हें सही ढंग से संभाला जाए तो हमें बहुत लाभ होगा। युवा आगे चलकर कमाने वाले बनेंगे। रोजगार का मतलब केवल नौकरी ही नहीं है, बल्कि इसमें मजदूरी का काम करने वाले लोग भी शामिल हैं। उनके काम का सम्मान किया जाना चाहिए। अब युवा पीढ़ी को देश के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।
भागवत ने कहा कि भारत एक विशाल देश है, जिसमें भाषा, क्षेत्र, जाति और सोच के स्तर पर बहुत विविधता है। राष्ट्रीय ध्वज पर बने धर्म चक्र का जिक्र करते हुए उन्होंने युवाओं से इसके अर्थ पर विचार करने को कहा। धर्म चक्र का उदाहरण देते हुए कहा कि देश के कानून और संविधान को कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
हमारी प्राचीन और पवित्र संस्कृति को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। हमारे अच्छे गुणों और परवरिश को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। हमारी नैतिक शक्ति को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तीलियों के चारों ओर बना घेरा संयम का प्रतीक है और यह सुनिश्चित करता है कि मतभेद एक निश्चित दायरे में रहें। इसीलिए इसे धर्म चक्र कहा जाता है। धर्म का अर्थ रीति-रिवाज और पूजा-पाठ नहीं है। धर्म का अर्थ है वे नियम, जो समाज के आचरण को आकार देते हैं और हमें उन नियमों के दायरे में रहकर ही सब कुछ करना चाहिए।
मतभेदों से संविधान या एकता कमजोर नहीं होनी चाहिए
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हमेशा अलग-अलग विचार और उन्हें व्यक्त करने के अलग-अलग तरीके होंगे। यह एक लोकतंत्र है, इसलिए यहां बातचीत होती है और बहस होती है। इसके साथ ही समर्थन व विरोध करने वाले पक्ष होते हैं। एक-दूसरे के विपरीत विचार भी होंगे। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसे मतभेदों से संविधान या एकता कमजोर नहीं होनी चाहिए।
संविधान पर डॉ. बीआर आंबेडकर के भाषणों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि इसे बनाने वालों द्वारा तय किए गए सिद्धांत देश का मार्गदर्शन करते रहने चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने मतभेदों के बावजूद राष्ट्र निर्माण के लिए मिलकर काम करें।
राष्ट्रीय ध्वज के रंगों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि केसरिया, सफेद और हरा रंग उन महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें नागरिकों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। धर्म चक्र का संदेश यह है कि भारत में विविधता के बावजूद लोगों को मिलकर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
