स्कूल से ShakthiSAT प्रोग्राम में शामिल होने तक का प्रेरणादायक सफर, इन बेटियों की कहानी अलग लेकिन मिशन एक
अंडमान-निकोबार, इंदौर, नगालैंड और मेरठ की बेटियां शक्ति-सैट कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष विज्ञान में नई संभावनाएं तलाश रही हैं। यह ...और पढ़ें

ShakthiSAT: यहां पढ़ें पूरी खबर।
HighLights
भारत की बेटियां शक्ति सैट कार्यक्रम में शामिल।
सभी की कहानी अलग लेकिन लक्ष्य एक।
एन.नवराही, नई दिल्ली। अंडमान-निकोबार की सुजाता, इंदौर की दर्शना, नगालैंड की तेजसनो और मेरठ की रिया व लावण्या के शहर, परिवार और सपने भले अलग हों, लेकिन इनके सामने अब संभावनाओं का आसमान एक है। इन बेटियों के लिए चल रहा शक्ति सैट शायद अभी एक प्रशिक्षण कार्यक्रम है, लेकिन उनके सपनों के लिए यह उससे कहीं बड़ी शुरुआत है। आज वे अंतरिक्ष विज्ञान, सैटेलाइट, प्लानिंग और कम्युनिकेशन सिस्टम सीख रही हैं, कल इन्हीं में से कोई किसी मिशन की कमान संभाल सकती है।
शक्ति सैट ने खोली विज्ञान की अलग दुनिया
अंडमान-निकोबार की सुजाता ने जब मिशन शक्ति सैट के माड्यूल पूरे करने शुरू किए थे, तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि विज्ञान की इन कक्षाओं के जरिये वह एक दिन अंतरिक्ष की दुनिया तक पहुंच जाएंगी। शुरुआत में उन्होंने अपनी मां को भी इस कार्यक्रम के बारे में नहीं बताया। डर था कि अगर चयन नहीं हुआ तो मां को दुख होगा, लेकिन जब देशभर से चुनी गई छात्राओं में उनका नाम आया और दिल्ली जाने का मौका मिला तो मां की पहली चिंता यही थी कि उनकी इकलौती बेटी इतनी दूर अकेले कैसे जाएगी। शिक्षिकाओं के समझाने पर मां की भी हिम्मत बढ़ी और सुजाता अंडमान से दिल्ली पहुंचीं।

आज उन्हें सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि उनकी मेहनत से उनकी मां को उन पर गर्व हुआ।
सुजाता का सपना शुरुआत में पत्रकार बनना था। वह बताती हैं, मुझे पत्रकारिता का बहुत शौक था। एक पत्रकार से मैं बहुत प्रभावित थी और तभी से सोचती थी कि मैं पत्रकार बनूंगी, लेकिन शक्ति सैट के माड्यूल ने उनके सामने विज्ञान की एक नई दुनिया खोल दी। फिजिक्स, मैथमेटिक्स, एस्ट्रोडायनामिक्स और सेटेलाइट से जुड़े विषयों को पढ़ते-पढ़ते उनकी रुचि बढ़ती गई यानी जिस कार्यक्रम में वह एक अवसर के तौर पर शामिल हुई थीं, उसने उनके सामने भविष्य की एक नई दिशा खोल दी।
शहर अलग पर आसमान एक
देश के अलग-अलग हिस्सों से चुनी गई 20 प्रतिभाशाली छात्राएं मिशन शक्ति-सैट की ‘टीम इंडिया’ का हिस्सा हैं। देशभर से करीब 3,000 छात्राओं के आवेदन के बाद इनका चयन हुआ। कार्यक्रम में 108 देशों की छात्राएं हिस्सा ले रही हैं। इसका उद्देश्य केवल सेटेलाइट बनाना सिखाना नहीं, बल्कि छात्राओं को अंतरिक्ष क्षेत्र की अलग-अलग संभावनाओं से परिचित कराना, वैज्ञानिक सोच, नवाचार, टीमवर्क, समस्या समाधान और नेतृत्व क्षमता विकसित करना भी है। यही वजह है कि यहां पहुंचने वाली हर बेटी की कहानी एक जैसी नहीं है। किसी ने अंतरिक्ष को बचपन से अपने सपने में रखा है तो किसी के लिए यह रुचि रास्ते में पैदा हुई। किसी को परिवार से प्रेरणा मिली तो किसी को अपने शिक्षकों और मेंटर्स से आगे बढ़ने का अवसर। इन अलग-अलग रास्तों का मिलना ही इस टीम को खास बना रहा है।
रिया पंवार और लावण्या राणा भी शामिल
इन बेटियों में मेरठ की रिया पंवार और लावण्या राणा भी शामिल हैं। दोनों के पिता भारतीय सेना में जेसीओ हैं और माताएं गृहिणी। सेना की वर्दी और अनुशासन को करीब से देखते हुए बड़ी हुई इन दोनों बेटियों ने अपने लिए अलग-अलग सपने देखे हैं।

रिया आगे चलकर स्पेस मेडिसिन के क्षेत्र में काम करना चाहती हैं, जबकि लावण्या का सपना भारतीय वायुसेना में जाने का है। रिया ने चयन के लिए 21 माड्यूल पूरे किए और इसके बाद साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरीं। इसमें अंतरिक्ष के प्रति उनकी रुचि, भविष्य के लक्ष्य, माड्यूल में किए गए कार्यों के साथ तकनीकी और भौतिकी से जुड़े सवाल पूछे गए। पिता की वर्दी से मिली प्रेरणा और इस अनुभव ने उनके सामने अपने सपने को और स्पष्ट किया।

किताबों से निकला अंतरिक्ष
इंदौर की दर्शना के लिए अंतरिक्ष का सपना बहुत पहले का है। वह कहती हैं, मैं चौथी-पांचवीं कक्षा से ही स्पेस साइंस में रुचि रखने लगी थी। कामर्स पृष्ठभूमि वाले परिवार में गणित चुनना उनके लिए अपने आप में एक अलग कदम था। परिवार में सभी का जुड़ाव कामर्स से रहा, लेकिन उन्होंने अपनी रुचि के अनुसार गणित को चुना। उन्होंने एमपी सुपर 100 जैसी परीक्षा क्वालीफाई की और स्टेम गतिविधियों में भी हिस्सा लिया। शक्ति सैट के तहत फिजिक्स, मैथमेटिक्स, एस्ट्रोडायनामिक्स और सेटेलाइट जैसे विषयों के माड्यूल पूरे करने के बाद उन्हें साक्षात्कार का अवसर मिला। अब वह 2047 में खुद को स्पेस साइंटिस्ट और मैकेनिकल इंजीनियर के रूप में देखना चाहती हैं।

शिक्षक से मिली शक्ति सैट की जानकारी
नगालैंड की तेजसनो एल केहो के लिए इस अनुभव का सबसे बड़ा हिस्सा आत्मविश्वास रहा। जवाहर नवोदय विद्यालय, कोहिमा की कक्षा 11 की छात्रा तेजसनो को अपनी मेंटर के जरिये शक्ति सैट की जानकारी मिली। वह कहती हैं, नगालैंड से, खासकर एक लड़की के रूप में इतने बड़े स्पेस प्रोग्राम का हिस्सा बनना मेरे लिए बहुत खास और गर्व का पल है। उन्हें स्पेसक्राफ्ट मिशन प्लानिंग, आपरेशन, अर्थ आब्जर्वेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे विषयों को समझने का अवसर मिला। शुरुआत में कुछ चीजें चुनौतीपूर्ण लगीं, लेकिन सत्रों को इंटरैक्टिव तरीके से समझाया गया, तो रुचि बढ़ती गई। अलग-अलग देशों के विद्यार्थियों से मिलना, नए दोस्त बनाना और विचार साझा करना भी उनके लिए यादगार अनुभव रहा। वह मानती हैं कि कार्यक्रम ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें यह समझने में मदद की कि स्पेस सेक्टर में सिर्फ एक ही क्षेत्र नहीं है।

परिवार का भरोसा बना ताकत
इन बेटियों की कहानियों में परिवार का भरोसा भी दिखाई देता है। सुजाता के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी मां ने नौकरी करते हुए उनकी परवरिश की और नानी ने भी उन्हें बड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुजाता कहती हैं कि उनकी मां ने कभी किसी काम के लिए उन्हें रोका-टोका नहीं। उनका हमेशा यही कहना था, जो भी होता है, तुम जाओ, तुम करो। नहीं भी होता तो तुम ट्राई करो और अपना बेस्ट दो। यही भरोसा दिल्ली जाने के समय भी काम आया। शुरुआत में मां ने अकेली बेटी को इतनी दूर भेजने को लेकर चिंता जताई, लेकिन स्कूल की शिक्षिकाओं ने कार्यक्रम के बारे में समझाया तो उनका डर कम हुआ। सुजाता के चचेरे भाई विशाल ने भी इस दौरान उनका साथ दिया।
दर्शना के परिवार में भी उन्हें अपनी अलग राह चुनने की आजादी मिली। जहां घर में कामर्स का माहौल था, वहीं उन्होंने गणित और अंतरिक्ष विज्ञान को चुना। रिया और लावण्या के लिए पिता की सैन्य पृष्ठभूमि प्रेरणा का स्रोत बनी। इस तरह परिवारों ने भले बेटियों के लिए अलग-अलग रास्ते देखे हों, लेकिन उन्हें अपने सपने चुनने की जगह दी।
पूर्व विंग कमांडर जया तारे
इन बेटियों को दिशा देने वाली भारतीय वायुसेना की पूर्व विंग कमांडर जया तारे की अपनी कहानी भी उड़ान से शुरू होती है। एयरफोर्स स्टेशन के करीब पली-बढ़ीं जया बचपन में घर की छत के ऊपर से उड़ते विमानों को देखकर हाथ हिलाया करती थीं। 3 यूपी एयर एनसीसी में शामिल होने और पहली बार ग्लाइडर के काकपिट में बैठकर उड़ान भरने के बाद उनका पायलट बनने का सपना साकार हुआ। एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पूरे भारत में दूसरा स्थान हासिल करने के बाद वह वायुसेना में पहुंचीं। जया के परिवार ने उनके सपने का पूरा साथ दिया। हालांकि, रिश्तेदारों की ओर से कम उम्र में शादी की बातें होती थीं, लेकिन माता-पिता ने कभी उनके सपने को विकल्प नहीं माना। जया अपनी मां को अपने जीवन की पहली और सबसे मजबूत लीडर मानती हैं।

वह कहती हैं कि मेरी मां ने खुद काम करने का अवसर न मिलने के बावजूद अपने अनुभवों और मूल्यों से मुझे आत्मविश्वासी, स्वतंत्र और मजबूत बनना सिखाया। वायुसेना में फ्लाइंग करियर के बाद जया ने अंतरिक्ष की ओर रुख किया। उनके लिए यह आसमान से आगे की स्वाभाविक यात्रा थी। अब वह अपनी उपलब्धि को केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं मानतीं, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाने की जिम्मेदारी के रूप में देखती हैं। उनके लिए नेतृत्व का अर्थ केवल खुद आगे बढ़ना नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और अनुभव को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। जया कहती हैं, जब मैं छोटी थी, तब मेरे पास सवाल पूछने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसे मैं अपना रोल माडल या मेंटर मान सकूं। शायद मैं आज वही व्यक्ति बनने की कोशिश कर रही हूं जिसकी मुझे बचपन में तलाश थी।
