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'भारत को अराजकता से बचाएं', MIT और ऑक्सफोर्ड के भारतीय मूल के 400 शिक्षाविदों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की

Published: Mon, 19 Oct 2026 11:07 PM (IST)Updated: Tue, 20 Oct 2026 02:14 AM (IST)

400 से अधिक भारतीय मूल के शिक्षाविदों ने 'भारत को अराजकता से बचाएं' शीर्षक से एक बयान पर हस्ताक्षर किए हैं।

भारतीय मूल के 400 शिक्षाविदों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की। (एएनआई)

भारतीय मूल के 400 शिक्षाविदों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की। (एएनआई)

HighLights

  1. 400+ भारतीय मूल के शिक्षाविदों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की।

  2. लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने पर चिंता जताई।

  3. संवैधानिक तरीकों से समस्याओं का समाधान खोजने का आग्रह किया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय मूल के 400 से अधिक छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने इस बात पर चिंता जताई है कि कैसे सड़क पर होने वाले उपद्रवी विरोध प्रदर्शनों के जरिए भारत के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को करने की कोशिश की जा रही है।

27 देशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों से जुड़े इन लोगों ने 'भारत को अराजकता से बचाएं' शीर्षक से एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि उनके बयान में किसी खास विरोध प्रदर्शन या समूह का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन यह बयान चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच आया है।

भारतीय मूल के 400 शिक्षाविदों ने विरोध प्रदर्शनों की निंदा की

हस्ताक्षर करने वाले लोग अमेरिका, ब्रिटेन, कानाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पौलैंड, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई अन्य देशों में रहते हैं। ये लोग MIT, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, प्रिंसटन, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, कोलंबिया, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो जैसे संस्थानों से जुड़े हुए हैं।

बयान में कहा गया है, 'आजादी के बाद के सात दशकों में, भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार अपनी मजबूती साबित की है। यहां संस्थाएं फली-फूली हैं, 'चेक एंड बैलेंस' व्यवस्था ने बेहतरीन ढंग से काम किया है और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हमेशा से इसकी एक बड़ी खूबी रही है।'

हस्ताक्षरकर्ताओं ने चुनाव नतीजों को नकारने पर चिंता जताई

हस्ताक्षरकर्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई है कि चुनाव नतीजों को नकारने, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़क को प्राथमिकता देने का चलन बढ़ता जा रहा है।

बयान के अनुसार, जब चुनाव के नतीजे मनमुताबिक नहीं आते, तो अक्सर चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ही सवाल उठाए जाने लगते हैं। इसमें कहा गया है कि अदालती फैसलों के मामले में भी ऐसा ही होता है, जहां ऐसी टिप्पणियां की जाती हैं जो न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करती हैं। बयान में यह भी आरोप लगाया गया है कि सशस्त्र बलों को भी बेवजह राजनीतिक विवादों में घसीटा जा रहा है।

अदालत में विचाराधीन मामले की राजनीतिकरण सही नहीं

हस्ताक्षरकर्ताओं का यह भी तर्क है कि जो मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं, उनका राजनीतिकरण करके भारतीय लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा किया जा रहा है। उनका कहना है कि ऐसे मुद्दों को सड़क पर उन अराजक तत्वों द्वारा और हवा दी जाती है, जिनका कभी भी संवैधानिक शासन व्यवस्था में भरोसा नहीं रहा है। बयान में कहा गया है कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर ऐसा करना पूरी तरह विरोधाभासी और चिंताजनक है।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की उस चेतावनी का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारत को एक संवैधानिक गणतंत्र के रूप में बचाए रखना है, तो नागरिकों को संवैधानिक तरीकों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहना होगा और क्रांति के हिंसक तरीकों को त्यागना होगा, जिसे उन्होंने 'अराजकता का व्याकरण' कहा था।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत के सभी सामाजिक और राजनीतिक समूहों से आग्रह किया कि वे अपनी चिंताओं को बहस, चर्चा, बातचीत और लोकतांत्रिक विरोध के जरिए सामने रखें। उन्होंने कहा कि समाधान देश के संस्थापकों द्वारा बनाई गई संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में ही तलाशा जाना चाहिए।