बंगाल में 6 'M' फैक्टर ने किया खेला, बीजेपी की बंपर जीत की Inside Story
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी बंपर जीत की ओर बढ़ रही है, जिससे ममता बनर्जी का 15 साल का शासन समाप्त होता दिख रहा है।

एम फैक्टर ने बदला बंगाल का गेम।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए वोटों की गिनती जारी है। रुझानों में बीजेपी बंपर जीत की ओर बढ़ रही है और पिछले 15 सालों से सत्ता की कुर्सी पर काबिज ममता बनर्जी का किला ध्वस्त होता दिख रहा है। बंगाल के ताजा रुझानों में बीजेपी दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है और टीएमसी डबल डिजिट पर अटकती नजर आ रही है।
रुझानों के बाद बीजेपी ने जश्न मनाना शुरू कर दिया है और कार्यकर्ता झालमुड़ी बांटते और खाते हुए दिख रहे हैं। खबर ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम साढ़े छह बजे के आसपास बीजेपी मुख्यालय जा सकते हैं। बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनती दिख रही है। रुझानों में दिख रही इस जीत के पीछे 6 एम फैक्टर हैं, जिन्होंने विनिंग स्टोरी लिखी। आइए जानते हैं वो कौन से 6 एम फैक्टर हैं...
पहला एम- मोदी
बीजेपी की इस बंपर जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुआंधार चुनाव प्रचार का भी हाथ रहा है। चुनावी रैलियों के दौरान उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर तृणमूल पर हमला किया और विकास पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "ये बदलाव की लहर है और इस बार बदलाव होकर रहेगा।"
पीएम मोदी ने कई रैलियां कीं, जिनमें उन्होंने सत्ताधारी टीएमसी पर हिंसा और कुशासन का आरोप लगाया और युवाओं तथा महिलाओं से बीजेपी को वोट देने की अपील की थी।
अप्रैल 2026 में झाड़ग्राम के चुनावी दौरे के दौरान पीएम मोदी ने अपना काफिला रोककर एक स्थानीय रेहड़ी वाले से झालमुड़ी खरीदी और खाई। इस पल को एक सहज और आम लोगों से जुड़ाव महसूस कराने वाले भाव के तौर पर बड़े पैमाने पर साझा किया गया।
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पीएम मोदी ने पश्चिम बंगाल के लिए छह प्रमुख 'गारंटियों' की शुरुआत की, जिसमें बेहतर बुनियादी ढांचे पर जोर दिया गया और टीएमसी सरकार पर केंद्र का विरोध करके राज्य के विकास में बाधा डालने का आरोप लगाया गया।
मार्च 2026 में प्रधानमंत्री ने रेल परियोजनाओं का उद्घाटन करने के लिए दौरा किया, जिनमें पुनर्विकसित स्टेशन (कामाख्यागुड़ी, अनारा, हल्दिया, आदि) और पुरुलिया-आनंद विहार टर्मिनल एक्सप्रेस शामिल थे।
दूसरा एम- ममता
अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए टीएमसी चीफ ममता बनर्जी ने कई तरह के आरोप लगाए लेकिन उन्हें सफलता मिलती नहीं दिख रही है। फिर वह चाहे एसआईआर का मुद्दा हो या आरजी कर गैंगरेप मामला। सभी मामलों को लेकर वह घिरती नजर आईं।
2024 का आरजी कर रेप और मर्डर के मामले ने महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए और इसके विरोध में पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। साथ ही पश्चिम बंगाल एसएससी (स्कूल सेवा आयोग) भर्ती के मामले को लेकर भी हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे।
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टीएमसी सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाएं जैसे कि 'कन्याश्री' और 'लक्ष्मी भंडार' भी अपनी सीमाओं के कारण सवालों के घेरे में आ गईं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नौकरियों और विकास की कमी के चलते ये योजनाएं कोई ठोस और मापने योग्य परिणाम देने में नाकाम रहीं।
इसके अलावा, टीएमसी सरकार को तब भी एक झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने 77 समुदायों को दिए गए एबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) दर्जे को रद कर दिया, जिससे लगभग 5 लाख लोग प्रभावित हुए। मुस्लिम वोट, जिसे टीएमसी के पक्ष में एकजुट माना जाता था वह बिखरता हुआ दिखाई दिया।
तीसरा एम- माइग्रेंट्स
जहां एक तरफ बीजेपी ने राज्य से कथित अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए एसआईआर के मुद्दे पर अपना अभियान चलाया वहीं ममता बनर्जी ने तुरंत ही मतदाताओं के मताधिकार छीनने के मुद्दे को उठाया।
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उन्होंने इस मुद्दे को बीजेपी-शासित राज्यों में बंगाली बोलने वाले प्रवासी मजदूरों पर हो रहे हमलों और उन्हें बांग्लादेश तक खदेड़े जाने की घटनाओं से जोड़ दिया। इसके बाद चुनावी अभियान का स्वरूप 15 साल की सत्ता-विरोधी लहर और टीएमसी की नाकामियों में तब्दील हो गया।
चौथा एम- मतुआ समुदाय
बंगाल में मतुआ समुदाय एक महत्वपूर्ण और अलग ही जगह रखता है। मुख्य रूप से नामाशूद्र (अनुसूचित जाति) बंगाली हिंदू धार्मिक संप्रदाय और जनसंख्या समूह है, जो पश्चिम बंगाल की आबादी का लगभग 17% हिस्सा है।
19वीं सदी के पूर्वी बंगाल में हरिचंद ठाकुर द्वारा स्थापित, यह समुदाय समानता और शिक्षा की वकालत करता है। बांग्लादेश से आए प्रवासियों के तौर पर इनकी प्रमुख समस्याओं में नागरिकता के अधिकार (CAA का कार्यान्वयन) और राजनीतिक सशक्तिकरण शामिल हैं।
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पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय का 30-45 विधानसभा सीटों पर जबरदस्त राजनीतिक प्रभाव है। खासकर उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में। बांग्लादेश से आए शरणार्थी होने के नाते उनकी मुख्य मांगें सीएए के जरिए नागरिकता और वोटर लिस्ट में नाम शामिल होने का अधिकार हैं।
नागरिकता देने के वादों के चलते इस समुदाय के कई लोग बीजेपी ओर झुकते नजर आए। मतुआ समुदाय भारत में आधिकारिक नागरिकता को लेकर बेहद चिंतित है। बीजेपी ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लागू करने के लिए जोरदार प्रचार किया और इस समुदाय को औपचारिक मान्यता देने का वादा किया। हाल के चुनावों में उनके वोट हासिल करने में यह वादा निर्णायक साबित हुआ है।
पांचवां एम- महिला मतदाता
पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में अब तक की सबसे ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई और इसमें महिला मतदाताओं ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। 2011 से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संख्या में महिलाओं ने वोट डाला।
महिलाओं का मतदान बढ़कर 93.24% रहा, जबकि पुरुषों का मतदान 91.74% रहा। पीएम मोदी ने पुरबा बर्धमान और मुर्शिदाबाद में रैलियों को संबोधित किया और उनका संदेश खास तौर पर महिला मतदाताओं पर केंद्रित था। उन्होंने कहा, “मैं विशेष रूप से बंगाल की सभी बहनों और बेटियों को भरोसा दिलाने आया हूं। बीजेपी ने महिलाओं के लिए हर महीने 3,000 रुपये देने की घोषणा की है।”
बीरभूम में एक रैली में मोदी ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए बंगाल चुनाव को महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा की लड़ाई बताया। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए दुष्कर्म और हत्या की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "यह चुनाव हमारी बेटियों और महिलाओं की गरिमा और सम्मान के लिए है।"
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पानीहाटी में बीजेपी ने आरजी कर पीड़ित की मां रत्ना देबनाथ को मैदान में उतारा और इसने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बीजेपी ने जो संदेश दिया उसको अधिक मजबूती मिली। कूच बिहार में पीएम मोदी ने इसके अलावा 2029 से संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का भी वादा किया।
यह समझने के लिए कि यह क्यों मायने रखता है हमें मतदाताओं पर नजर डालनी होगी। पश्चिम बंगाल में 6.75 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं, जिनमें से 3.44 करोड़ महिलाएं और 3.60 करोड़ पुरुष हैं। महिलाएं कुल मतदाताओं का लगभग आधा हिस्सा हैं, जिससे कड़े मुकाबले वाले चुनावों में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाती है।
छठा एम- मुस्लिम
बंगाल चुनावों में 27% मुस्लिम आबादी ने हमेशा एक निर्णायक भूमिका निभाई है और ममता बनर्जी के पीछे एकजुट होकर खड़ी रही है। 2021 में टीएमसी ने उन 146 सीटों में से 131 सीटें जीतीं, जहां मुसलमानों की आबादी 30% से 90% के बीच है। इसकी मुख्य वजह नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और संभावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर लोगों में डर था।
इस बार एसआईआर फैक्टर और बीजेपी का 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' (यूसीसी) लागू करने का वादा, मुसलमानों को एक बार फिर बड़ी संख्या में बांट दिया। क्योंकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने भी बड़े इरादों के साथ 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कदम रखा।
कड़े मुकाबले वाली उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है, मतदाताओं की पसंद में आया छोटा-सा बदलाव भी बहुत बड़ा असर डाल सकता है। पश्चिम बंगाल के मामले में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी नया समीकरण लेकर आई, जिसका असर ममता बनर्जी के जनाधार पर पड़ा।
अगर 23 अप्रैल को हुआ पहला चरण इस बात की परीक्षा थी कि क्या बीजेपी उत्तरी बंगाल और आस-पास के इलाकों में अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी तो आखिरी चरण में लड़ाई सीधे टीएमसी के गढ़ कोलकाता, हावड़ा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया, हुगली और पूर्वी बर्धमान में चली गई।
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इन इलाकों की सीटों में से 12 सीटें अहम मानी जा रही हैं। इन 12 सीटों में से नौ पर पहले चरण में वोटिंग हुई और बाकी तीन पर दूसरे चरण (29 अप्रैल) में वोट पड़े। इन सीटों पर एआईएमआईएम भी मैदान में थी।
इसके अलावा, पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, एसआईआर भी एक कारण रहा, जिससे मतदाताओं की संख्या में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई। हालांकि चुनाव आयोग ने हटाए गए नामों का धर्म के आधार पर कोई ब्योरा जारी नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए अनुमानों से पता चलता है कि हटाए गए लोगों में से लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम थे।
इसका मतलब है कि लगभग 31 लाख मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हो सकते हैं। यह एक बहुत बड़ी संख्या है, खासकर ऐसे राज्य में जहां इस समुदाय की आबादी लगभग 27 प्रतिशत है और वोटरों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है।
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